Dr. Anu Somayajula

Drama


4.7  

Dr. Anu Somayajula

Drama


दसवां ऍपल

दसवां ऍपल

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प्रिय डायरी,

आज दो कहानियों की बात करते हैं। एक हाल ही में पढ़ने मिली, दूसरी सालों पहले चंदामामा में प्रकाशित बाल कथा है। दोनों कहानियों में कुछ समानताएं हैं – दोनों में मुख्य पात्र जंगल में भटक जाता है, दिनों तक भूखा प्यासा राह ढ़ूढ़ने का प्रयास करता है और तब अनायास भोजन पाता है। इसके बाद जो कुछ भी घटता है, सोच और व्यक्तित्व का जो अंतर दिखाई देता है वही इन कहानियों को आमने सामने कटघरे में ला खड़ा करता है।

पहली कहानी देखें। जंगल से हो कर जाते हुए एक आदमी रास्ता भटक जाता है। लाख कोशिशों के बाद भी बाहर निकलने का रास्ता नहीं पाता है। तीन दिन बीतते-बीतते भूख प्यास से निढाल सारी आशा छोड़ देता है। तभी उसे रसीले फलों से लदा एक ऍपल का पेड़ दिखता है। उसकी खुशी का कोई पारावार नहीं; दोनों हाथों से बहुत सारे फल तोड़ लेता है। एक टुकड़ा मुंह भरते ही पागलों की तरह नाच उठता है, ईश्वर का धन्यवाद करता है। एक के बाद एक फल खाए जाता है मानो उसे दोबारा कुछ खाने को न मिलेगा। किंतु जैसे- जैसे भूख घटती गई, पेट भरता गया उन फलों से वह ऊबता गया, सब बेस्वाद लगता गया। दसवां सेब खाते- खाते उसने सेब का तिरस्कार किया, बचे हुए सारे फल भी फेंक दिए, पेड़ को भी स्वादिष्ट फल न देने के लिए भला- बुरा कहने लगा। इस कहानी का शीर्षक है “ टैंथ ऍपल इफ्फेक्ट “ या कहें दसवें ऍपल का हाल या दसवें ऍपल की सी नियति।

अब दूसरी कहानी को देखते हैं। शिकार पर निकला राजा जंगल में राह भटक जाता है, परिजनों को छोड़ दूर निकल आता है। राजा भी थका- हारा, भूखा- प्यासा और घोड़ भी। चलते- चलते एक टूटी फूटी सी झोंपड़ी के आगे रुकता है। बूढ़ी दादी से अपने और घोड़े के लिए कुछ खाने की मांग करता है। घोड़े को तो घास डाल दी गई। दीन बुढ़िया सोच में पड़ गई राजा को क्या खिलाए। जो था उस से मोटी- मोटी रोटियां थापीं, पिछवाड़े से कुछ घास तोड़कर नमक और मिर्च के साथ आनन फानन में चटनी बना कर परोसी। भूखा राजा तृप्त हुआ। बार बार पूछने पर दादी को बताना ही पड़ा कि वह घास की चटनी थी। इतने में ढ़ूंढ़ते हुए सेना भी आ पहुंची। राजा ने तुरंत दो आदेश ज़ारी किए – पहला दादी का आजीवन भरण पोषण राज्य की ओर से किया जाए, दूसरा राज रसोइया इस चटनी को बनाने की विधि सीखे और नियमित रूप से महल में बनाए। यह उस चटनी के प्रति राजा की कृतज्ञता थी।इन दोनों कहानियों का घटनाक्रम एक है किंतु उसकी परिणति एक दूसरे के बिलकुल विपरीत। पहली कहानी में हम देखते हैं कि इच्छा पूरी होते- होते, आवश्यकता के घटते- घटते आदमी 'कृतज्ञ' से 'कृतघ्न' होता जाता है। संतोष की जगह असंतोष से भरने लगता है और प्रशंसा की जगह कमियां ढ़ूढ़ने में लग जाता है। यह एक नितांत ‘अवसरवादी’ वृत्ति है। इसके विपरीत तृपत राजा अपना विवेक और कृतज्ञता बनाए रखता है, मुश्किल घड़ी में काम आने के लिए उचित पुरस्कार भी देता है। यहां तिरस्कार और वंचना नहीं है, है तो सिर्फ आभार प्रदर्शन। कहना चाहो तो आप कह सकते हो कि राजा देने में सक्षम था सो दिया। पथिक कहां से देता! देने के लिए शक्ति, सामर्थ्य नहीं इच्छा का होना आवश्यक है। पथिक ‘और-और’ खाने का लालच नहीं करता, बचे हुए फल बांध लेता कि आगे जाने कब कहां खाने मिले, ईश्वर और उस वृक्ष का मन से धन्यवाद करता तो क्या कम था!!

इन कहानियों को आज के परिप्रेक्ष्य में देखें। हममें से कोई ऐसा नहीं होगा जिसने साप्ताहिक छुट्टी की राह न देखी हो। गृहिणियों को इस दिन का इंतज़ार होता है कि वे हफ्ते भर संचित छोटे मोटे काम निपटा लें, कुछ सफाई कर लें, सबकी पसंद का कुछ खाने को बना दें, या घर बाहर के कुछ काम ही निपटा लें। पुरषों को इंतज़ार है कि देर तक सोते रहें, फुर्सत में चाय पिएं, समाचार पढ़ें, मनपसंद खाएं और दोपहर की नींद लें। बच्चों का अपना अलग हिसाब है। अमूमन उच्चमध्यवर्गीय या उच्चवर्गीय लोग शाम को मॉल जाते हैं, कुछ ज़रूरी या ग़ैरज़रूरी ख़रीदी करते हैं, अकसर बाहर ही खाकर लौटते हैं। बाकी अकेले या परिवार के साथ टहलने निकलते हैं, घर आ कर खा पीकर सो जाते हैं। थोड़ा बहुत अदल बदल कर हर छुट्टी के दिन यही होता है। हर सोमवार को हम कॅलंडर देखते हैं शायद एक अदद छुट्टी लिखी हो इस हफ्ते।

आज हमें बिना मांगे आनगिनत छुट्टियां मिल गई हैं। पहले कुछ दिन सब ख़ुश थे। आराम ही आराम रहा। परंतु जैसे- जैसे बंदिशें बढ़ती गईं, हमारा मन भी उचटने लगा। बिना बाहर जाए कैसे रहेंगे, कितना उबा देता है घर बैठना वग़ैरह- वग़ैरह... हम में से कुछ कोरोना को कोस रहे हैं, कुछ चाइना पर दोष मढ़ रहे हैं या अपनी ही सरकार पर खीझ रहे हैं। ज़रा सोचिए क्या हम भटके हुए पथिक की ही तरह अनायास मिली वस्तु का तिरस्कार नहीं कर रहे, परिस्थिति, प्रशासन की आलोचना, भर्त्सनानहीं कर रहे!

होना तो यह चाहिए था कि अचानक झोली में आ टपकी छुट्टियों का हम स्वागत करते। अनेकानेक छोटे- मोटे घर के काम ढ़ूंढ़ते, पूरा करने का प्रयत्न करते। बच्चों की पढ़ाई - जो अब रुकी हुई है- में उनका साथ देते। माना हम भूल चुके हैं, पर साथ बैठ समझने की कोशिश करते तो उनकी कठिनाइयों को भी समझ सकते। सांप सीढी सी उलझन भरी भाग दौड़ अब नहीं पर घर बैठे सांप सीढ़ी खेलते, गाते- बजाते, या कुछ लिखते- पढ़ते चाहे कॉमिक्स ही सही। ईश्वर का आभार मानते कि अब भी हम अपनों के साथ, अपनों के बीच हैं; स्वस्थ और सुरक्षित हैं, किसी की यथायोग्य सहायता करने में सक्षम हैं और जो हमसे कम भाग्यशाली हैं उनसे सहानुभूति रख सकते हैं।

पहली स्थिति हमें भटके हुए, स्वार्थी, अवसरवादी और कृतघ्न पथिक की श्रेणी में ला खड़ा करती है। दूसरी हमें राजा की तरह परिस्थिति से जूझने, सहायक एवं सहायता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने तथा यथासंभव दूसरों की सहायता करने को प्रेरित करती है। विकल्प हमारे सामने हैं, हमें तय करना है हम क्या बनेंगे !                                   


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