Husan Ara

Abstract Classics Others


5.0  

Husan Ara

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कर्ज

कर्ज

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कूँए के आसपास खेलते बच्चे, पानी भरती उनकी मांए पेड़ों की छांव में बैठे बुज़ुर्ग सबको देख रहा था दूर से बैठा रमन।

कई दिन से इधर उधर भटकता आज वह इस गाँव में आ पहुँचा था।

पसंद की शादी ना होने के कारण अपने घर से भागा रमन कभी मज़दूरी करके गुज़ारा कर रहा था कभी ईंट पत्थर तोड़कर। अमीर घर का लड़का था इस सबकी आदत नहीं थी।

4-5 महीने बाद ही बड़े बालो और और दाढ़ी मूछो से भरा वह 23-24साल का थका हारा लड़का 40 साल का नज़र आने लगा था।

उस अजनबी को अपने गाँव में देखकर सब बच्चे, बूढ़े, औरते युवक आदि तरह तरह के कयास लगा रहे थे।

खिसियाया हुआ रमन और चिढ़ गया जब एक आदमी ने आकर उससे वहाँ आने का कारण पूछ लिया।

"बारिश में नहाने आया हूँ" रमन ने उसकी तरफ बिना देखे ही जवाब दिया।

आदमी वापिस आकर बुज़ुर्गों को ये बात बताने लगा तो सब हँसने लगे।

रमन वहाँ से उठकर जाने की हिम्मत कर रहा था मगर तीन दिन से भूखा होने के कारण उसमे उठने की भी क्षमता नही थी।वह वहीं बैठा सब की हंसी का पात्र बनता रहा।

तभी बादल घुमड़ने लगे देखते देखते बारिश शुरू हो गई। रमन को अपनी किस्मत पर बहुत रोना भी आ रहा था वह वहीं बैठा भीगता रहा।

रमन इस बात से अनजान था कि उसकी मज़ाक में कही बारिश की बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल चुकी थी।

बारिश रुकते ही गांव के लोग ,उसको कोई ज्योतिष बाबा समझकर उसके चारो ओर बैठ गए थे।तरह तरह की चर्चाएं रमन भी सुन रहा था। कोई उसे सिद्ध ज्ञानी बताता कोई सन्यासी तो कोई ज्योतिष।

रमन के लिए एक खाली पड़ी झोपड़ी को साफ करके महिलाओं ने बिस्तर पानी का इंतेज़ाम किया।

सूखे कपड़ो का बंदोबस्त करके कुछ युवा उसके पैर दबाने लगे और भोजन चढ़ावे की तो कोई कमी ही नहीं थी।

आज कितने दिनों बाद उसने पेटभर खाना खाया था। आज नर्म बिस्तर पर लेटते ही उसकी आंख कब लग गई पता ही नहीं लगा था।आज उसे अपने घर में माँ पापा के पास होने का सुखद एहसास मिल रहा था।

सालो से वीरान पड़ी झोपड़ी के चारों ओर सुबह ही से लोगो का मेंला लगा था। वह लोगों को सच बताना चाहता था मगर अब जाता कहाँ ? उसने कुछ दिन वहीं रहने के विषय में सोचा कि तबीयत ठीक हो जाने पर निकलूंगा घर के लिए । पैरो में गिरकर माँ पापा से माफी मांगूगा। अरे नहीं पिताजी मारेंगे ,माँ डाँटेगी ,पड़ोसी हंसेंगे, नहीं जाऊंगा वापिस।

अंतर्मन में स्वयं से बाते करता वह लोगो के सिर पर हाथ भी रखे जा रहा था जो बड़ी श्रद्धा से उसके लिए भोजन फल मिठाइयां लेकर आए थे।

"इस गाँव के अनाथ बच्चे, गरीब विधवाओं, मांगने वाले बूढ़े और गरीब परिवारों को बुला लाओ" रमन ने युवकों की एक टोली से कहा।

उन सबके आ जाने पर रमन ने वह प्रसाद रूपी भोजन खाना शुरू कर दिया वह भूख का दर्द जान चुका था, इसीलिए उसने उस भोजन को अकेले खाना ठीक नहीं समझा।

लोगों को वह कभी धोखा नहीं देता था बस जो उस पर गुज़री थी वही समझा देता, जैसे कोई पूछता कि बच्चे कहा नहीं मानते तो वह उनके माता पिता को प्यार से बच्चों का दिल रखने की सलाह देता। कोई मालिक आता तो उसे नौकरों से नरम रवैये की बात कहकर फायदा होगा का प्रलोभन देता।

सास बहू, पड़ोसी, रिश्तेदार आदि सबको बस प्रेम का संदेश देता रहा। लोग मनोकामना उसे बता जाते वह रोज़ सोने से पहले यही दुआ करता कि हे ईश्वर जैसे एक बारिश से तूने मेंरे दिन पलट दिए इन सबकी मनोकामनाएं भी सुन ले।

लोगो की कामनाए पूरी भी हो जाती कभी अधूरी भी रह जातीं। मगर ज्योतिष बाबा के प्रति श्रद्धा कम ना हुई।


गरीबो मुसाफिरों के साथ भोजन करना बचा हुआ खाना जानवरों को प्रेम से खिलाना यही उसका जीवन बन चुका था। परंतु माँ पापा की याद आने पर उसे अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता।

वह गांव वालों से अक्सर कहता कि "मेंरे जाने के बाद भी इस झोपड़ी में रोज़ इसी तरह खाना लाना ताकि जिसे भी भूख हो वह तड़पे नहीं"। कई बार वहां से जाने की सोचता घर लौटने की हिम्मत न कर पाता।

उसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई थी। लोग मनोकामना के लिए आज भी बहुत दूर दूर से आए थे।

"मेरा बेटा कब मिलेगा बाबा" एक औरत की रोती हुई आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा।

माँ.. हाँ ये तो वहीं थी। वह उनसे लिपट कर रो देना चाहता था मगर अपने जज़्बात पर काबू पाकर उसने एक कागज पर कुछ लिख कर उन तक पहुँचाया। भीड़ ज़्यादा होने के कारण वह उन्हें ठीक से देख भी नहीं पा रहा था।

दोनों पति पत्नी बाहर आकर वह कागज़ पढ़ने लगे जिस पर लिखा था कि उनका बेटा उन्हें कल एक पास ही शहर के बीचोबीच मिलेगा अगर उसे पाना है तो उसकी पिछली सब गलतियां भुलाकर यह कागज़ फाड़कर कूँए में डाल दो मनोकामना पूरी हो जाएगी।

बिना कोई देर लगाए वे दोनों, वह कागज़ कूँए में डालकर बाबा को भेंट चढ़ाकर चल पड़े शहर की तरफ। महीनों से रोते बिलखते वे दोनों कल तक का इंतज़ार भी कैसे करते।

अगले दिन सुबह ही ज्योतिष बाबा के मानव रूपी अवतार की वापस आकाश में चले जाने की खबरें आम थी।

मगर वह झोपड़ी आज भी कई अनाथों, गरीबों और मुसाफिरों का पेट भरती है। रमन भी अक्सर अपने माता पिता के साथ वहां आकर उन श्रद्धालुओं की भीड़ में बैठ कर मन की शान्ति पाता है। भेंट आदि चढ़ाकर वह उन गाँव वालों का कर्ज पूरा करने की कोशिश आज भी कर रहा है।


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