Husan Ara

Children Stories


5.0  

Husan Ara

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ज़रूरतें

ज़रूरतें

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"पापा प्लीज मुझे भी पिकनिक जाने के लिए परमिशन दीजिये ना, मेरे कई दोस्त भी जा रहे हैं।" अपने पिता के पैर के ज़ख़्मी अंगूठे पर दवा लगाते हुए समर उन्हें मनाने के अंदाज़ में बोला।


"लेकिन ये तुम्हारे पढ़ने का वक़्त है , बड़े होकर खुद भी घूमना हमें भी घुमाना" पिताजी ने बहुत प्यार से उसे समझाया।


अब वह अपने 11 -12 वर्ष के लड़के को क्या बताते कि यह मुश्किल समय उन्हें अपनी ज़रूरतें भी पूरी नही करने दे रहा था । इच्छाओं की पूर्ति तो सपने के समान थी।


"बेटा मेरी दवाओं का पर्चा तो सही से रख लिया ना कल मेरी दवाइयां खत्म हो जाएंगी लेते आना" लेटे लेटे ही समर की दादी ने बेटे को याद दिलाया था।


"जी माँ याद है , चश्मा भी कल ले आऊंगा" "चलो समर अब तुम भी जाकर पढ़ाई करो मेरा अंगूठा अब ठीक है। आदेश के स्वर में वह बोल पड़े।


"पापा आपके अंगूठे में ये चोट बार बार क्यों लग जाती है देखिये ना रोज़ दवा लगाता हूँ पर ज़ख्म कम ही नही हो रहा । मुझे लगता है ये सस्ता मरहम इसके लिए काफी नहीं। उठते उठते समर कह रहा था।


"अच्छा पापा सोचना पिकनिक के लिए 600 रुपये की बात है।" कहकर समर तो अपने कमरे में जाकर पढ़ने लगा । मगर वह अपने पिता को गहरी चिंता के साथ छोड़ गया था।


काश! आज इसकी माता ज़िंदा होती तो इसे प्यार से समझा देती। या कोई ऐसा बहाना बना देती कि यह खुद ही मना कर देता। वो तो मेरी इसी कमाई से कितने ही पैसे बचा लेती थी।मगर जब वह बीमार हुई तब सिर्फ कुछ ही महीनों का मेहमान बता दिया था डॉक्टरों ने। जो कुछ जमा पूंजी थी इलाज में खर्च हो गई। फिर कई दिन मेहमानों का आना जाना लगा रहा। ऊपर से माँ बीमार जिसके कारण समर के पिताजी या तो स्वंय आकर खाना बनाते या बाहर ही से लाते।


वे समर को अच्छे स्कूल में पढ़ाने को लेकर दृढ़ रहे मगर अपने बाकी दोस्तों को देखकर समर की दिन प्रतिदिन की इच्छाओं से दुखी हो उठते थे। वे उसे समझाना चाहते थे कि बेटा तुम्हारी मोटी फीस भरना ही मेरे लिए बहुत मेहनत का काम है, हमारे हालात समझो। लेकिन शब्द उनका साथ दे ही नही पाते थे।

समर की माता की तस्वीर को देखकर रोते रोते कब वे सो गए उन्हें पता ही न चला।


अगले दिन सुबह समर को स्कूल जाने से पहले उसके पिताजी ने 600 रुपये निकाल कर दिए। बहुत ही सिकुड़े दबे हुए नोट थे जाने कब से छुपाकर रखे होंगे किस ज़रूरत के लिए।

समर आज बहुत खुश था कभी अपने पिता की शर्ट उन्हें पकड़ाता कभी उनकी बनाई चाय बाहर लाने में में मदद कर रहा था। जब तक उसके पापा उसका टिफिन बना रहे थे वह उनके जूते लेने अंदर गया।

"उफ्फ इतना बड़ा छेद" समर के मुंह से जूतों को देखकर अनायास ही निकल पड़ा था।

तब तो उसने वह जूते चुपचाप लाकर पिता को दे दिए और स्कूल चला गया। लेकिन पूरे समय उसके दिमाग़ में वही छेद घूमता रहा।

तो इसीलिए पापा के अंगूठे में वो ज़ख्म ठीक नहीं हो पाता क्योंकि वे तो रोज़ ही उन जूतों को पहनकर पैदल काम पर जाते हैं। लेकिन मेरी महंगी क़िताबों पैन इत्यादि पर खर्च करते हुए ज़रा भी नहीं सोचते। अगर माँ नही रहीं तो क्या मैं उनका ध्यान नहीं रख सकता था ।


"जो बच्चे पिकनिक जा रहे हैं वे अपने पैसे जमा करा दें।"टीचर ने कक्षा में आकर कहा। टीचर के पास भीड़ थी। जब बाकी बच्चे वहाँ से चले गए तो समर अपनी टीचर के पास पैसे लेकर पहुंचा ।


"टीचर क्या इन पैसों में मेरे पिता के जूते आ जाएंगे" आँखों मे आंसू लिए उस बच्चे के प्रश्न से टीचर उसके मनोभावों को समझ चुकी थी। क्योंकि जो कुछ उनके परिवार में घटित हुआ था सभी लोग इस विषय में जानते थे।

"पिकनिक और जूते दोनो हो जाएंगे , ठीक है कल अपने पिता के जूते का नम्बर पता करके आ जाना मैं खुद लाकर दे दूंगी।" पिकनिक जाने वाले बच्चों में समर का नाम लिखते हुए टीचर मुस्कुरा कर बोली।


समर खुश तो था मगर यह भी समझ चुका था कि अब से वह अपनी इच्छाओं को वह इतना नहीं बढ़ाएगा कि उसके पिता को ज़रूरते पूरी करने के लिए अपने पैरों को ज़ख़्मी करना पड़े।















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