Vikas Sharma

Abstract


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Vikas Sharma

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जिंदगी कोरोना के साथ भी

जिंदगी कोरोना के साथ भी

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विकास सपने तो देख ही सकता था, ऐसा करने से उसे कोई नहीं रोक सकता था, वो खुद भी नहीं। एक यही तो काम था जो उसे सकूँ देता था, वो सारा दिन समय बेकार करने के बाद भी मुस्करा उठता की ये कल तो चला गया, पर आने वाले कल को वो संवार सकता है, फिर उसकी आंखो में चमक आती और फिर सपनों के पीछे भागने लगता। वैसे तो वो उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर बिजनोर का रहने वाला है पर उसने अपनी आधी जिंदगी बिजनोर के बाहर ही बिताई है, सपनों की ये दौड़ उसे अब दरिया किनारे ले आई है, पर जब गंगा किनारे वाला, दरिया किनारे आता है तब दरिया चाहे कितना विस्तार व गहराई वाला क्यूँ ना हो, गंगा की शीतलता वापिस खींच ही लेती है। काफी दिनों से गंगा की लहरे दरिया की लहरों पर सवार हों रही थी, फिर ज्यादा सोच –विचार करने की गुंजाइश कहाँ बचती है, विकास ने रिजाइन दे दिया, लखनऊ में नोटिस पीरियड सर्व करने के बाद जॉइन करने वाला था। सब कुछ तय योजना के अनुसार ही हो रहा था, पर नदी की धारा कहाँ मोड ले ले, ये तो केवल नदी ही जानती है।

अचानक से एक नया युग शुरू हो गया, वैसे तो वो कलयुग कहता था अपने युग को, उसने सतयुग, त्रेता के बारे में भी पढ़ा –सुना था, पर उसे ये तो भरोसा था की जिंदगी कभी भी पलटती है, नए संजोग ला खड़े करती है, इन्ही सबके भरोसे तो वो कविताएं लिखता, कहानी लिखता, यू ट्यूब व वीडियो बनाता, अपनी वैबसाइट भी बना ली थी, कुछ ना कुछ करता रहता, सपने जंजाल ही ऐसा होते हैं, चैन से जीने कहाँ देते हैं। वो अपनी किस्मत आजमा कर देखता रहता, वेब पोर्टल पर भी लिखता, पर सब उसके सपनों को बड़ा करते, कोई दूरी कम नहीं करता।

इन सबके बीच जो सपनों से भी परे था, हर अनिश्चितता से बढ़कर, वो हर उतार –चढ़ाव के लिए तैयार था पर इस जिंदगी का सामना उससे होने वाला था जो ना जिंदा और ना ही अजिंदा। इन दोनों के बीच मे पलने वाला, जिंदगी मिले तो उसी की सवारी करकर राज करने वाला, उसे चलने के लिए, जिंदा चाहिए तो थे चाहे बाद में वो जिसकी सवारी कर रहा था रहे या ना रहे, उसे तो आगे बढ्ने से मतलब, उसने सवारी चुनी भी तो ऐसी जो खुद को इस कायनात का सबसे बेहतर, इस कायनात का रखवाला समझ बैठा था, सपना देखने में क्या, एक इसी चीज ने तो उसे इस मुकाम तक पहुंचाया, ये ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी जो उसे औरों से अलग करती थी –सपने देखना, पर इस बार इंसान का सामना था कोरोना से, वो आया तो युग बनकर आया, पूरी दुनिया कोरोनामय हो गयी, अचानक से नया काल खंड शुरू हो गया –कोरोना काल।

विकास भी तो सपने देखने वाला इंसान ही था, कोरोना ने सपनों को थामना चाहा, इस पर कब्जा करना चाहा, कोरोना ने मारा, बहुतों को मारा, इतना की दहशत भर गई, इतना की लोग, समाज दशको पीछे चले गए, पर कोरोना सपनों को ना हारा पाया, कुछ देर रोका जरूर, हाँ ठहराव तो आया, सच है, डर गया था इंसान पर जैसे ही उसने अपना सबसे बड़ा हथियार जो डर के मारे वो भूल बैठा था, उठाया मानो चमत्कार हो गया, कोरोना को भी कुछ समझ नहीं आया, अजीब होता है जिंदा होना भी, साँसे, दिल की धड़कन –इससे भी आगे होता है जिंदा होना।

सपनों को जीना, लोग मर रहे हैं, डर है, दहशत है पर अब सपने भी पनपने लगे हैं, सपनों में वो खुद को कोरोना काल से आगे देखने लगा है, कभी –कभी कोरोना के साथ, तो कभी कोरोना के बाद,  उसने कोरोना के साथ रहने की तैयारी शुरू कर दी है, वो तो मेहमान की खुशामद करने को उतारू हो चला है, सपने बचे हुए को समेटने के, सपने जिंदगी को खालीपन से ही बुनने के, सपने .......जिंदगी के।

विकास भी कोरोना काल में कहाँ चुकने वाला था, उसने भी अपने पंखो को नयी उड़ान के लिए तैयार कर लिया था, मानव था एक दूसरे से सीख सकता था, लॉक डाउन बढ़ते ही जा रहे थे, आगे भी ऐसे ही जीना होगा, विकास अपने परिवार से दूर दरिया से अंतिम विदाई नहीं ले पा रहा था, दरिया को उसका साथ इतना भा गया था क्या ? पर वो भी छोरा गंगा किनारे वाला था, उसने भी खुद को कमरे में बंद किया हुआ था, सामान तो पैक कर चुका था, जिस दिन उसकी ट्रेन थी उसी दिन जनता कर्फ़्यू, फिर लॉक डाउन 1, लॉक डाउन 2, अब तीसरे की उसे चिंता नहीं थी, मन को समझा लिया था, कोई जल्दबाज़ी नहीं, क्यूंकी उसके सपने अभी अधूरे थे, और वो उन सपनों के लिए अब ज्यादा समय दे पा रहा था, कोरोना का ख्याल आया भी तो उसके सपने का हमसफर बनकर, वो तो वेंटिलेटर पर व वीडियो बना रहा था, बच्चो के लिए कहानी पढ़ रहा था, ऑन लाइन कोर्स लॉंच करने की तैयारी कर रहा था, कविता –कहानी पढ़ने वालों, लिखने वालों को भी अकेलापन कभी छू सका है क्या भला ?

हाँ, ये सपना है की जल्दी ही सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा, रेले पटरी पर दौड़ेंगी, और वो 2000 किमी दूर अपनी जिंदगी के सबसे हसीन मोड –अपनी 2 साल की बेटी, पत्नी के पास होगा, अपने परिवार के साथ होगा, इस कोरोना काल ने जीने का नया सलीका दिया है, पर कोरोना इंसान के सपनों से हार गया है, केवल विकास ने ही सपनों की सवारी नहीं शुरू की है हर कोई कोरोना के साथ और कोरोना के बाद जीने को तैयार हो चला है – वो जिनके पास सपने हैं, जिएंगे –कोरोना के साथ भी कोरोना के बाद भी।  


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