Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

4  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

अपभ्रंश

अपभ्रंश

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मुस्ताक भाई कर्जत के एक रिसोर्ट में हो रहे डेस्टिनेशन बेडिंग में शामिल होने के लिए आए थे। यह शादी उनके दुबई की कंपनी के एक्सबॉस की बेटी की थी।यहाँ पर उनको किसी परिचित से मुलाकात की संभावना नहीं थी। उन्होंने सोचा था बॉस से मिलकर और खाना खाकर निकल जाएंगे। शानदार बुफे की व्यवस्था थी। सभी लोग अपने पसंद के व्यंजन का लुत्फ उठा रहे थे। मुस्ताक भाई भी अपना प्लेट लेकर एक किनारे खा रहे थे ।तभी एक अपरिचित व्यक्ति ने करीब आकर पूछा "आपका नाम मुस्ताक खान है?"

           मुस्ताक भाई ने हाँ में सिर हिलाया और उस व्यक्ति को पहचानने की कोशिश करने लगे।वो आदमी उनको देखकर मुस्करा रहा था और उनकी उलझन को देखते हुए बोला "कोशिश करो मुसु और बताओ कि मैं कौन हूँ ?"

अचानक जैसे उनके दिमाग मे बिजली कौंधी और उनको याद आ गया । उन्होंने उस आदमी से कहा आप मोहित खुराना -- इतना कहते ही उस व्यक्ति ने मुस्ताक को गले लगा लिया। फिर मुस्ताक ने कहा मोहिते यकीन नहीं हो रहा तुमसे मिल रहा हूँ। तुमको पहचानना थोड़ा कठिन था क्योंकि तुम तो सींकिया पहलवान हुआ करते थे और आज एकदम गोल मटोल डब्बा बन गए हो। मोहित ने हॅंसते हुए कहा लेकिन तुमने एकदम बॉडी मेंटेन कर के रखा है। केवल बाल थोड़े कम हुए हैं और जो बचे हैं उनपर सफेदी हावी होने लगी है। 

 दोनों एकसाथ हँस पड़े । फिर एक दूसरे के कंधे पर हाथ रख रिसॉर्ट के उस कोने की तरफ बढ़ चले जिधर गहमागहमी कम थी। क्योंकि तीस साल बाद दोनों की मुलाकात हुई थी। दोनों स्कूल फ्रेंड थे और बोर्ड एग्जाम के बाद दुबारा मुलाकात नहीं हुई थी। दोनों में बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ तो बचपन के गलियारे से चलते हुए पैंतालीस के मोड़ तक पहुँच गयी। इस क्रम में कितनी भूली बिसरी बातें और यादें जीवंत हो उठीं। किसी ने गुदगुदा दिया तो किसी ने पलकों को नम कर दिया। कितने टीचर और कितने सहपाठियों के नाम के आगे अब स्वर्गीय लग चुका था। बचपन के वो पन्ने भी फड़फड़ा उठे जिनको मुस्ताक भाई भी भूल चुके थे। जैसे - जैसे याद आता दोनों एक दूसरे से अपने स्कूल फ्रेंड के बारे में पूछते। मुस्ताक कुछ ज्यादा ही उत्सुक था स्कूल के फ्रेंडस के बारे में जानने के लिए। मोहित ने कहा हमलोगों के स्कूल का एक व्हाट्सएप ग्रुप है जिसका नाम है KOMM(किड्स ऑफ मदर मेरी), उसमे तुम्हारा नाम भी ऐड करा दूँगा। इसमें अपने बैच के ज्यादातर लड़के हैं क्योंकि इसका एडमिन कमल गुप्ता है। कुछ सीनियर और जूनियर भी इसमें जुड़े हैं।सब देश के कोने कोने में फैले हैं। अब तो ऐसा लगता है मानो हर शहर में अपना कोई न कोई परिचित है। तुमको केवल ग्रुप में यह लिखना है कि किस शहर में क्या काम है। किसी न किसी का कोई न कोई पहचान निकल आती है और एक मदद हो जाती है। 

मोहित ने कमल को फोन लगाया लेकिन उसका फोन नॉट रिचेबल बता रहा था। मोहित लड़के वाले कि तरफ से आया था इसलिए वह रुक गया और मुस्ताक निकल गया। अगले रोज उसने देखा कि उसको कोम्म(KOMM)ग्रुप में जोड़ दिया गया है और उसमे उसको बहुत सारे पुराने मित्र जुड़े हुए थे। ग्रुप में जुड़े लोगों की सूची देखते देखते उसकी नजर एक नाम पर अटक गई। वह नाम था कामिनी का। वह मुस्ताक का "'फर्स्ट क्रश" थी। उसका डीपी फ़ोटो देखकर उसके अंदर एक अजीब तरह की तरंग उठी और तत्क्षण शांत हो गयी। उस अनुभव को वह अभिव्यक्त करने में असमर्थ था । उसके डीपी इन्फो में लिखा था "उलझन और ठहराव मेरी पहचान"। पढ़कर मुस्ताक भाई परेशान हो गए । इतनी नकारात्मक बात लिखने का क्या मतलब है? फोटो में भी उम्र से ज्यादा लग रही है। उसका तो एक प्रेमी था जिससे शायद उसकी शादी भी हो गयी थी। फिर क्या हुआ होगा उसके जीवन में, क्या यह सब पूछना उचित रहेगा , क्या सोंचेगी मेरे बारे में, क्या उसकी स्मृतियों के किसी खोंडर में मेरी निशानी भी होगी ? फिर मुस्ताक ने उसका फेसबुक प्रोफाइल सर्च किया । लेकिन उसपर कुछ भी नहीं मिला और दो साल से उसपर कोई पोस्ट या अपडेट भी नहीं था। इस ग्रुप में भी वो सक्रिय सदस्य नहीं थी। 

मानसिक स्तर पर मुस्ताक भाई ने अपने आप को कई जगह से जोड़-तोड कर खुद को कामिनी को मैसेज भेजने के लिए तैयार किया। अब समस्या थी कि पहली बार मैसेज में क्या लिखा जाए की वह यह समझ जाए कि आज भी उसके लिए मेरी भावना क्या है और कोई दूसरा भी पढें तो उसके सामने उसको शर्मिंदा न होना पड़े। क्या मालूम बच्चे बड़े हो गए हों, वह दादी या नानी बन गयी हो , उसका पति रोज उसका मोबाइल चेक करता हो!

बहुत सोंच विचार, तर्क वितर्क, चिंतन मनन के बाद मुस्ताक ने एक मैसेज लिखा "तीस साल तीन महीने तेरह दिन बाद तुमसे संपर्क करने की कोशिश की है,यदि एतराज न हो तो मुझे फोन करना -- एक अजीज अजनबी"

मैसेज भेजने के बाद मुस्ताक ऐसे नर्वस हो रहा था जैसे किसी किशोर ने पहली बार किसी लड़की के सामने प्रेम प्रस्ताव का पत्र पत्थर में लपेट कर उसके सामने उसके राह में गिरा दिया हो। दिल की धड़कन रोके इंतजार कर रहा है वह कब चिठी पढ़ेगी और क्या उसकी प्रतिक्रिया होगी। वह बार बार अपना व्हाट्सएप चेक कर रहा है कि कामिनी ने उसका मैसेज पढ़ा या नहीं। डबल टिक तो हो गया है लेकिन अभी तक ब्लू टिक नहीं हुआ। रात को 10.35 में ब्लू टिक हुआ।मुस्ताक के अंदर बेचैनी बढ़ने लगी हाथ से पसीना छूटने लगा। यदि कामिनी का फोन आया तो क्या बात करेगा वो भी घर में मौजूद दो बीबियों के सामने। उनको किसी तरह तो झेल भी लेगा लेकिन अब औलादें भी समझने लायक हो गईं हैं। यदि उसमें से किसी ने कुछ गलत अनुमान लगाया तो अच्छा नहीं लगेगा। उसने अपने फोन को भाइबरेशन पर डाल दिया। अब फोन आएगा तो किसी को पता भी नहीं चलेगा और मिस्ड कॉल से उसको टाइमिंग की भी मालूमात हो जाएगी।

खैर, रात भर मुस्ताक इंतजार करते रहा लेकिन ना ही कोई फोन ना ही कोई मैसेज आया। उसको अब अपनी बेचैनी और उत्सुकता पर आश्चर्य हो रहा था । कहने सुनने के लिए तो वह दोनों बीबियों के बीच में किंग साइज बेड पर सोया था लेकिन नींद गायब थी। उसको यकीन नहीं हो रहा था कि कामिनी उसका मेसेज पढ़कर रिप्लाई नहीं करेगी। फिर खुद को समझाने लगा तीस साल बहुत लंबा वक्त होता है। जिंदगी कितने मोड़ों से गुजरकर किस पड़ाव पर ठहरी है क्या पता !!

 दुसरे दिन उसको कामिनी के भेजे मैसेज पर डबल ब्लू टिक दिखा। मुस्ताक को एक संतुष्टि सी हुई कि उसके संदेश को कामिनी ने पढ़ लिया। अब उसके कॉल या मैसेज की इंतजार की तीव्रता और बढ़ गयी। जब शाम तक कोई संदेशा नहीं आया तो मुस्ताक ने सोचा कोई जरूरी तो नहीं उसके अंदर अभी भी वही भावना हो जो मेरे अंदर है? वो मेरा पहला प्यार थी मैं उसका पहला प्यार नहीं था। लेकिन उससे क्या अंतर पड़ता है, प्यार तो प्यार होता है उसमे सच्चाई और ईमानदारी होनी चाहिए। मेरा प्यार ईमानदार था और उसके होंठों ने भले ही कुछ इजहार नहीं किया लेकिन उसकी आँखों ने पाक मौन स्वीकृति दी थी। मेरे प्यार को मंजिल मिल जाती यदि दिलीप देशमुख ने खेल नहीं बिगाड़ा होता ---

दिलीप का नाम दिमाग में आते ही उसको बोर्ड के टेस्ट एग्जाम का अंतिम दिन याद आ गया जब उसकी दिलीप से जबरदस्त झड़प हुई थी । याद नहीं दोनों के किस अंग में कितनी चोट आई थी। मेरा दिल टुकड़े टुकड़े होते बचा था जब कामिनी ने यह कहा था "मुझे भी तुमसे प्यार है लेकिन स्वीकार नहीं।"

दिलीप उसके मुहल्ले का दबंग परिवार का एक बिगड़ैल लड़का था जो कामिनी पर अपना एकाधिकार मानता था । उसको इससे कोई अंतर नहीं पड़ता था कि कामिनी क्या सोचती है। वह मिर्च मसाले लगाकर अपने और कामिनी के किस्से हवा में फैलाते रहता था। उस झड़प के बाद तो उसका स्वघोषित एकतरफा प्रेम सबके बीच चर्चा का विषय बन गया । लेकिन कामिनी ने उसे कभी भी अपनी तरफ से स्वीकार्यता का कोई संकेत नहीं दिया था। इतना तो तय था कि मेरे और कामिनी के बीच में जो भी प्रेम स्पंदन और मौन प्रेमालाप था उसकी भनक किसी और को नहीं थी, सिवाय राहुल के। राहुल कामिनी का मुंहबोला भाई था और उसी के साथ में पढ़ता था। वह उसको राखी भी बांधती थी।

परिस्थितियां जो थीं सो थीं, उनको मुस्ताक ने जस का तस स्वीकार कर लिया ।यह भी मान लिया कि कामिनी उसको नहीं मिलेगी। बीच मे धर्म, समाज आदि इत्यादि खलनायक खड़े थे।उसके बाद उससे कभी मुलाकात नहीं ,कोई बात नहीं। स्कूल जाना बंद उसके घर जाने का कोई बहाना नहीं था। बोर्ड एग्जाम में उसका सीट दूसरे रूम में था । सेंटर पर उसके पिताजी बाइक से लेकर आते थे और पूरा समय सेंटर पर मौजूद रहते थे । फिर साथ मे लेकर लौट जाते थे। गुफ्तगू करने का कोई मौका नहीं मिला । उसके बाद मुस्ताक के पिता जी का ट्रांसफर हो गया। जिंदगी में बात आई गयी हो गई , ऊपरी तौर पर, समाज की नजरों में ।

लेकिन उसकी कसक में कितनी तीव्रता थी कि दो बीबी होने के बावजूद ,तीस साल गुजर जाने के बाद भी , उसका चेहरा सामने आते ही ऐसा लग रहा है कल की ही बात हो और कामिनी से मेरा मिलन हो सकता है। यह जरूर रूहानी मोहब्बत का ही असर है।

तभी उसको किसी की कही बात याद आयी "प्रेम दो नासमझों के बीच एक मिथ्या समझौता है। प्रेम भ्रांति का पुत्र और अवांछित कष्ट का पिता है।" मुस्ताक को इस बात पर हँसी आ गई - प्रेम एक भ्रांति पुत्र है। क्योंकि अक्सर इसका एहसास खूबसूरत और कोमल होता है। यह एक अजीब सी बेखुदी को जन्म देता है।

मुस्ताक ने सोंचा उसके संदेश का इंतजार करके अपना समय खराब करने का क्या मतलब है ? वह एक महिला है और महिला की वन्दिशों और मजबूरियों को समझना पुरुष समाज की संवेदनशीलता के दायरे से बाहर की बात है। उसके प्रति लगाव और खिंचाव की टीस और कसक मेरे अंदर जिंदा है । इसकी अपेक्षा इतने अरसे बाद उससे करना मूर्खता है। फिर भी उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था कि कामिनी उसको भूल गई होगी। ग्रुप में जुड़ते ही कितने दोस्तों का मैसेज आ गया कितनो का फोन भी आया। लेकिन व्यक्तिगत मैसेज भेजने के बाद भी उसकी उदासीनता उसको चुभ रही थी। उसे खुद को संतुष्ट करने का कोई बहाना नहीं मिला तो उसने अपनी तरफ से फोन करने का फैसला किया, फोन मिलाया लेकिन कनेक्ट नहीं हो पाया। उसकी उत्सुक बेचैनी और तीव्र हो गयी ।उसने एक मैसेज ड्राप किया "आपसे बात करने का सुविधाजनक समय क्या है? मुझे आपसे बात करनी है।"

तुरंत मुस्ताक के फोन की घंटी बज गई । उधर से कामिनी की वही मधुर आवाज सुनाई दी " क्या मैं जान सकती हूँ आप कौन हैं और मेरे से किस सिलसिले में बात करना चाहते हैं?"

मुस्ताक ने अपने आप को समेटा और बाल कपड़े सेट किया जैसे कामिनी उसके सामने हो और उसको देख रही हो । फिर बड़े ही संयत स्वर में कहा " कामिनी जी मैं मुस्ताक हूँ आपका स्कूल का बैचमेट ,कुछ याद आया ??"

दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं ,केवल सांस की अंदर बाहर होने की आवाज आ रही थी, फोन चालू था लेकिन संवाद ठहरा था। शायद वह भी खुद को समेट रही थी और सोंच रही थी मुस्ताक की तरफ वाली खिड़की खोलूँ या इस खट-खट को अनदेखा कर दूँ । फिर उसने सोंचा चलो बात करने में क्या जाता है। इतने लम्बे अंतराल के बाद तो उम्मीद से भी उम्मीद नहीं रहती और यादों की भी याद मिट जाती है। उसने कहा " याद की क्या बात करते हो मुस्ताक, याद तो उसको किया जाता है जिसका वजूद स्मृति पटल से विलुप्त हो चुका हो। तुमको याद करने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि यादों की राह में मैं आज भी उसी मोड़ पर खड़ी हूँ जिस मोड़ पर तुम जुदा हुए थे। तन की यात्रा आगे बढ़ी है, मन की यात्रा में ठहराव बना है।"

अबतक बातचीत के लिए उत्सुक बेचैन मुस्ताक मन की आँखे घूमा रहा था कि बोलने के लिए उधार के भी शब्द मिल जाते। वही खामोशी लुढ़क कर अब इस तरफ आ गयी थी। जब कोई माकूल शब्द नहीं मिला तो औपचारिक खैरीयत जानने के लिए पूछ लिया "परिवार में कौन कौन से लोग हैं और तुम अभी कहाँ हो और क्या करती हो ? तुमने अ बतक कितना कैलेंडर प्रिंट किया है ?"

कामिनी ने बड़े ही सधे शब्दों में कहा " मेरी जिंदगी तो एकदम सपाट है इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसमें सोचना पड़े की क्या बताना , क्या छिपाना। अभी तक मैं मातृत्व सुख से वंचित हूँ और उसी छोटे कस्बे में स्कूल टीचर हूँ। तू अपनी सुनाओ।"


मुस्ताक - मैं जैसा था वैसा हूँ और जिंदगी भी 'सो फार सो गुड' बोल सकती हो। अपनी दो बीबी और चार बच्चों के साथ मुम्बई में अपना कुनबा बसा रखा है।

कामिनी - इट्स ग्रेट , फिर तो अगले हफ़्ते तुमसे मुलाकात हो सकती है। क्योंकि अगले हप्ते मैं अपनी एक सहेली के बेटी के रिसेप्शन में मुम्बई आने वाली हूँ। मेरी वो बेस्ट फ्रेंड है । उसके आग्रह को मैं ठुकरा नहीं सकती। चलो इसी बहाने तुमसे भी मुलाकात हो जाएगी।

मुस्ताक भी मुलाकात की संभावना से काफी उत्साहित हो गया और बोला तुम रिसेप्शन वेन्यू का एड्रेस भेज देना मैं तुमको वहीं से पिक कर लूँगा। कामिनी ने कहा जस्ट होल्ड करो में कार्ड देखकर बताती हूँ। फिर उसने बताया रिसेप्शन होटल 'सी प्रिन्सेस' में है कमिंग फ्राइडे को।

मुस्ताक ने खुश होते हुए कहा " क्या बात है , मैं उस होटल का जेनरल मैनेजर हूँ। इसका मतलब तुम हीरा व्यापारी मयंक शाह की बेटी अल्पना की रिसेप्शन में आ रही हो। फिर तुम एक्स्ट्रा टाइम लेकर आना।

अब कोई अगर मगर नहीं, हमलोग अगले फ्राइडे को मिल रहे हैं।मुझे तुम्हारा बेसब्री से इंतजार रहेगा। मैं तुम्हारे नाम एक डीलक्स सूट बुक कर देता हूँ। बाइ सी यु , टेक केअर ।"


अब मुस्ताक के लिए फ्राइडे तक का इंतजार बहुत लंबा लग रहा था। उसको खुद समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इस मुलाकात में ऐसा क्या रखा है जो उसको एक्साइट कर रहा है। उसने हाउसकीपिंग मैनेजर को बुलाकर हिदायत दिया कि उसका एक खास गेस्ट फ्राइडे को आनेवाला है इसलिए सी फेसिंग वाले कार्नर सूट को एकदम बेस्ट तैयार करना। हाउसकीपिंग वाले ने पूछ लिया गेस्ट पर्सनल है या होटल का ? मुस्ताक ने कहा "वेरी वेरी पर्सनल " , लेकिन कहते हुए उसके चेहरे ने अनजाने में उसके अंदरूनी उदगार को उड़ेल दिया। अपने चेहरे के भाव भंगिमा में आए बदलाव को उसने भी महसूस किया क्योंकि उसके केबिन की एक दीवार में डेकोरेटिव ग्लास लगा है जिसमे चेहरा दिखता है। जूनियर के सामने उसकी मनोदशा का पर्दाफाश न हो जाए इसलिए उसने कृत्रिम गंभीरता को धारण करने का प्रयास किया। HK वाला यस सर् बोलकर वहां से चला गया।

मुस्ताक वैसे भी अपनी लुक और फिटनेस को लेकर सजग रहने वाला इंसान है। अब कामिनी से मिलने के उत्साह में कुछ ज्यादा ही सजग हो गया। वह अब वाशरूम में अपने अंग प्रत्यंग को निहारता था की कहीं कुछ कमी तो नहीं दिख रही है ।होटल में भी जहाँ कहीं से गुजरता और मिरर दिख जाता तो अपने आप से वह प्रश्न जरूर पूछ लेता - कहीं कोई कमी तो नहीं है।

देखते देखते और इंतजार करते फ्राइडे भी आ ही गया । आज हीरा कारोबारी मयंक शाह की बेटी अल्पना का रिसेप्शन था बहुत सारी नामचीन हस्तियां भी गेस्ट लिस्ट में शामिल थीं। लेकिन मुस्ताक की दिलचस्पी तो इस फंक्शन में आनेवाली कामिनी में थी। वह सोंचने लगा यदि वह अपने पति के साथ आई तो फिर मुलाकात फीकी फीकी रहेगी क्योंकि एक स्वभाविक संकोच तो रहेगा ही। जैसे ही गेस्ट के आने का सिलसिला शुरू हुआ मुस्ताक ने अपने केबिन में लगे स्क्रीन पर फंक्शन हॉल के गेट पर लगा सीसीटीवी कैमरा ऑन कर लिया ताकि फेस टू फेस मुलाकात से पहले उसको वो देख सके।

सीसीटीवी के जद में कामिनी का चेहरा आते ही मुस्ताक को यकीन हो गया कि आज उससे मुलाकात होगी। लेकिन उसके साथ कोई पुरुष नहीं था।इसका मतलब वो अकेली आयी है।सेजल और मयंक से मिलकर अभी वो बैठी ही थी कि होटल का एक स्टाफ उसको एक वेलकम बुके दिया और रूम नंबर 1205 का चाभी दिया।साथ मे यह भी कहा कि मैं आपका समान उस रूम में रख देता हूँ ।

तुमको यह किसने करने को कहा । उसने सपाट सा उतर दिया मेरे जनरल मैनेजर मुस्ताक साहब ने। अब उसको शंका की कोई गुंजाइश नहीं थी। फिर भी उसने मुस्ताक को फोन लगाया । 

मुस्ताक ने फोन उठाते ही कहा "वेलकम टू सीप्रिन्सेज"

कामिनी ने बोला तुमको कब पता चला कि मैं आ गयी हूँ? मुस्ताक ने हँसते हुए कहा यहाँ चप्पे चप्पे पर सीसीटीवी लगा है । मेरी नजर हर जगह रहती है और आज तो तुम आने वाली हो यह भी मालूम था। फिर यह कोई कठिन काम नहीं था। तुम्हारे रिसेप्शन का फंक्शन अभी शुरु होने में टाइम है तबतक अपने रूम में जाकर फ्रेश हो लो फिर एक कप कॉफी साथ मे पीते हैं।

कामिनी होटल के रूम में पहुँची। वहाँ बेड पर एक बड़ा सा ताजे फुलों का गुलदस्ता उसका इंतजार कर रहा था। उसमें एक पर्ची थी जिसमें लिखा था - 'फूलों को आपका इंतजार था।' रूम की भव्यता देखने लायक थी। उसने केवल फाइव स्टार होटल का नाम सुना था किसी फाइव स्टार होटल के रूम को अंदर से देखने का, महसूस करने का यह पहला अवसर था। वह उसकी भव्यता में खो सी गयी - सारे रूम की अम्बिएन्स अपनी तरफ खींच रही थी, एक अलग तरह की भावना मन को गुदगुदा रही थी । सामने के दिवार पर फूल हाइट का पर्दा लटक रहा था और वह बीच से थोड़ा हटा हुआ था। कामिनी ने जाकर पर्दे को थोड़ा और हटाया तो बाहर का नजारा देखकर मंत्रमुग्ध रह गयी। सामने दूर तक फैला समंदर उसमें उठती लहरें। ऐसा लग रहा था उन लहरों में होड़ लगी हो कि डूबते सूरज को अपने आगोश में पहले कौन लेगा। इतनी ऊंचाई से समंदर में डूबते सूर्य को देखना बहुत ही अच्छा लग रहा था। वह सनसेट देखने मे इतना डूब गई कि वह कहाँ है यही भूल गयी। जब पूर्णरूप से सूर्यास्त हो गया तो वह पीछे मुड़ी तभी इण्टरकॉम पर फोन की घंटी बजी उसने उठाया तो दूसरी तरफ मुस्ताक था। उसने पूछा यदि तुम फ्रेश हो चुकी हो तो तुम्हारे लिए कॉफी की व्यवस्था करूँ। कामिनी ने कहा मुसु मैं तो सनसेट का नजारा देखने मे ही खो गयी अभी मैं पाँच मिनट में तैयार होती हूँ ।फिर तुम आ जाना यहीं बैठकर चाय पीते हैं , मैं कॉफी नहीं पीती हूँ।

तैयार होकर कामिनी ने मुस्ताक को फोन किया और वह जिन्न की तरह प्रगट हो गया। मानो वह तैयार बैठा था और केवल फोन का इंतजार कर रहा था।जब दोनों आमने सामने मिले तो मुस्ताक का उत्साह अपनी चरम पर था लेकिन कुछ उम्र का तकाजा कुछ लंबे अंतराल की सिलवटों ने एक औपचारिक व्यवहार की अनिवार्यता को स्वाभाविक जरूरत बना दिया था।

दो अंतरंग मन दो अजनबी की तरह मिले। कामिनी तो एक सामान्य भारतीय नारी की तरह हिचकिचाहट और झिझक के लिबास में सिमटी थी। मुस्ताक को भी झिझक हो रही थी कि लगभग समाप्त हो चुके रिश्ते को पुनर्जीवित करने में किसी गलत तार पर हाथ ना लगे और एक नई अंत की शुरुआत न हो जाए। मुस्ताक को तो अपनी मनोदशा का आभास था लेकिन कामिनी के बारे में वह अनुमान लगाने में असमर्थ था क्योंकि वह उसके ओझल अतीत से अपरिचित था। दोनों के मुँह से एक साथ एक ही सवाल निकला "कैसे हो?"

लेकिन प्रत्युत्तर ने दोनों के मनोभाव की झलक को प्रस्तुत कर दिया - मुस्ताक ने कहा "ठीक हूँ" और कामिनी ने कहा "ठीक ही हूँ" । इसी "ही" के अंतर ने मुस्ताक को कामिनी के अतीत के रिश्ते के स्वेटर को उघाड़ने का सिरा पकड़ा दिया।

लिकर और दूध मिलाते हुए मुस्ताक ने पूछा शुगर फ्री या शुगर क्यूब ? कामिनी ने कहा कुछ भी चलेगा । 

मुस्ताक - जब विकल्प उपलब्ध हो तो समझौता समझदारी नहीं होती है। तुमने कहा की "ठीक ही हूँ" , ऐसा क्यों ? तुम्हारे तत्कालिक अतीत की मुझे कोई जानकारी नहीं है । लेकिन यदी तुम चाहो तो मुझे तुम्हारी तीन दशक की पूरी कहानी जानने में दिलचस्पी है।

कामिनी के होठों पर वही एक इंच वाली कातिल 'मोनालिसा मुस्कान' तैर कर गायब हो गयी। उस मुस्कान में मुस्ताक को वो आकर्षण नहीं दिखा जो कामिनी को कामिनी बनाती थी। उसमे एक अजीब और अनजान उदासी की झलक थी जो यादों में बसी कामिनी की छवि से मेल नहीं करती थी। इस बदलाव की कुछ बड़ी वजह रही होगी,लेकिन क्या ? इसी प्रश्न को अपनी आँखों मे भरकर मुस्ताक ने कामिनी की तरफ निःशब्द उछाल दिया। कामिनी भी उस निःशब्द प्रश्न का आशय समझ गयी । लेकिन नारी मन खुलने में संकोच करता है ।

कामिनी ने अपने हिस्से का प्याला उठाकर होंठों से लगाया और बड़े ही आत्मीय अंदाज में पूछा- तुम अपनी बताओ,तुम्हारे तो बड़े ठाट हैं। इतने बड़े होटल के जनरल मैनेजर हो। जिस पाँच सितारा होटल में एक रात ठहरने का सपना लिए कितने लोग इस दुनिया को अलविदा कह जाते हैं उसमे तुम अपना हर दिन बिताते हो।

मुस्ताक - मैंने तो अपनी सेवाएँ इससे भी बड़े होटल में लंदन और दुबई में दी है । एक बात जरूर है होटल लाइन में जॉब करने से लक्ज़री लाइफस्टाइल को करीब से देखने और महसूस करने का मौका मिलता है। लेकिन हमारी हालत ज्वेलरी के शोरूम में काम कर रही उस लड़की की तरह होती है जो खूबसूरत और महंगे गहने को रोज हाथ लगती है लेकिन पहन नहीं सकती। इसके चलते उसके प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है। लेकिन व्यक्तिगत जीवन की अधूरी तमन्ना हमेशा जीवंत रहती है।

कामिनी - अरे भाई, अब कौन सी तुम्हारी तमन्ना अधूरी रह गयी? अच्छी खासी नौकरी और भरा पूरा परिवार है और क्या चाहिए खुश रहने के लिए!!

मुस्ताक ने कामिनी के चेहरे पर अपनी नजरें गड़ाए हुए कहा कि मेरी अधूरी तमन्ना तुम हो। 

यह सुनते ही कामिनी भक रह गयी। क्योंकि उम्र के इस मोड़ पर किसी से अपने बारे में यह सुनने की अपेक्षा उसको नहीं थी, उसको सुखद आश्चर्य हुआ । अब उसे मुस्ताक की आंखें अपने बदन पर चुभती सी महसूस होने लगीं लेकिन उस चुभन में भी एक मिठास का एहसास हो रहा था। उसके होंठ प्याला के होंठ से मानो चिपक गए। उसी अवस्था मे वह यह आकलन करने लगी कि मुस्ताक के कहे शब्द के प्रति उसके बॉडी लैंग्वेज में ईमानदारी और तारतम्य था या नहीं। सम्भवतः मनोभाव को पढ़ने में लड़कियों से गलतियां नहीं होती यदि अपने प्रति सजग हों।

मुस्ताक के शब्द कहीं से भी अपभ्रंश नहीं थे।उसमे वही ईमानदारी आज भी थी जो तीन दशक पहले थी। लेकिन उस ईमानदारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि समाजिक रिश्ते अपभ्रंश हो जाएंगे। दिल और दुनिया के पैमाने जब मेल नहीं खाते हैं तो दुविधा का जन्म होता है। दुविधा मर्यादा और सत्य के बीच चयन का।

सत्य मुस्ताक की तरफ खड़ा था और मर्यादा कामिनी के रास्ते में। जब युद्ध स्वयं से हो तो जीत और हार दोनों में कष्ट का अनुभव होता है। यह जीत या हार कुछ और नहीं चाहतों के तरजीह में परिवर्तन बोध है जो समय -असमय स्व को गलत सिद्ध करने का प्रयास करता है।

कामिनी को तमन्ना शब्द ने झकझोर कर रख दिया था । उसको मुस्ताक से अपनी पहली मुलाकात की याद ताजी हो गयी। उसके पिताजी बैंक में अधिकारी थे और उनका उसके शहर रत्नागिरी में ट्रांसफर हुआ था। उसका एडमिशन नवी कक्षा में मिड टर्म में हुआ था। इसके चलते पूरे क्लास में उसका कोई दोस्त नहीं था। दोस्तों के बिना स्कूल कॉलेज का मजा ही अधूरा रह जाता है।पहले दिन ही मुस्ताक कामिनी के बगल वाले बेंच पर बैठा था। उसका ध्यान टीचर पर कम और कामिनी पर ज्यादा था। क्लास में नया और स्मार्ट छात्र होने के चलते सभी शिकक्षक उससे परिचय पूछते थे । लेकिन कामिनी जब भी देखती तो यही देखती की मुस्ताक उसी को देख रहा है। मध्यांतर में जब सभी लड़के लड़कियां बाहर चली गईं अपना टिफिन खाने तो क्लास में सिर्फ दो ही बचे थे। मुस्ताक ने पूछा "आपने टिफिन नहीं लाया ?" कामिनी ने कहा " नहीं मेरा आज उपवास है। लेकिन तूम क्यों नहीं गए ?"

मुस्ताक - क्योंकि आप नहीं गई। और मुझे आपसे दोस्ती करनी थी। मैं इस शहर में नया हूँ और कोई भी मेरा दोस्त नहीं है। अतः सोंचा आप जैसी खूबसूरत लड़की से ही खूबसूरत शुरुआत क्यों न कि जाए।

इतना कहते हुए मुस्ताक ने अपना दोस्ती का हाथ कामिनी की तरफ बढ़ा दिया ।उसने भी हेलो बोलकर उससे हाथ मिलाया। फिर धीरे धीरे दोनों करीब होते गए। क्योंकि मुस्ताक स्मार्ट और इंटेलीजेंट था और कामिनी भी खूबसूरत और पढ़ने में होशियार थी। दोनों का यह स्वभाविक आकर्षण प्रगाढ़ होता चला गया । लेकिन क्लास के दूसरे छात्रों को इससे जलन हो रही थी कि क्लास की सबसे खूबसूरत लड़की को एक नया लड़का पटा लिया और वो भी मियां भाई । सभी लड़को को मालूम था कि राहुल उसका 'राखी भाई' है । सब पीठ पीछे उसको ताने देते कुछ भी अनाप सनाप कहते ।कामिनी से किसी को कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं होती क्योंकि उसके पिताजी रिटायर्ड कर्नल थे और छोटे से शहर में उनका रुतबा था। वह काफी गर्ममिजाज आदमी थे और तुरंत रियेक्ट करते थे। उनके इस स्वभाव से सभी लोग डरते थे।

राहुल भीरू स्वभाव और दोहरे चरित्र का था। "जहाँ अपना काम बनता वहाँ भाड़ में जाए जनता" वाली सोंच रखता था।वह कामिनी के सामने उसके मनमाफिक बात करता और मुस्ताक को भी अपना दोस्त मानता। मुस्ताक से जलन उसको भी थी लेकिन वह प्रगट नहीं करता था और कामिनी उसको अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक और राजदार मानती थी ।

पहली मुलाकात के पहल में जो ईमानदारी थी उसी ईमानदारी को आज भी कामिनी ने महसूस किया। उस समय दोनों के पास बचपन की अबोधता थी मगर आज जीवन का गहन अनुभव , फिर भी मुस्ताक की पहल में ईमानदारी जस की तस है।शायद इसीलिए कहा जाता है सच्चा प्रेम सोना की तरह होता है - अपरिवर्तनीय। उस पर समय , संगत और स्थान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। कसौटी पर वह खरा ही उतरेगा, चाहे कितने भी छोटे टुकड़े को परख लो।

उसको खामोश देखकर मुस्ताक सोचने लगा कहीं कुछ गलत बात तो नहीं कह दी, मेरी बात का उसको बुरा तो नहीं लगा ।लेकिन अब कुछ भी बदला नहीं जा सकता है। देखते हैं, उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है । वैसे भी किसी से होनेवाली प्रत्येक मुलाकात एक नई मुलाकात होती है क्योंकि पल पल का अनुभव व्यक्ति के स्वभाव पर प्रभाव डालता है और कोई भी व्यक्ति अपने अनुभवों का संकलित बिम्ब होता है। यहाँ तो फासला तीन दशक का है।

कामिनी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा "चाय अच्छी है और मुझे इसकी जरूरत महसूस हो रही थी। स्वाद एकदम अलग और मस्त है। मेरे लिए एकदम नया स्वाद है।"

मुस्ताक - यह जानकर अच्छा लगा कि तुमको मेरी चाय पसंद आयी। तुमको अभी फंक्शन में जाना है, हमलोग कल सुबह मिलते हैं। किसी भी चीज की जरूरत हो तो रूम सर्विस को बोल देना । तुम मुझे भी कॉल कर सकती हो।

इसके बाद मुस्ताक कमरे से बाहर चला गया। कामिनी पार्टी के लिए तैयार होकर नीचे आ गयी। रिसेप्शन पार्टी जब तक चला वो वहाँ पर रही फिर अपने रूम में आ गयी।

लेकिन "मेरी तमन्ना तुम हो" शब्द उसके मन मष्तिष्क में गूंज रहा था।वह समझ नहीं पा रही थी कि इस पर उसे क्षणिक खुश होना चाहिए या अपने खुरदरे वर्तमान पर अफसोस करना चाहिए। वर्तमान का खुरदरापन और भी विभत्स लगने लगता है जब यह ज्ञात हो कि अतीत में बेहतर विकल्प की अनदेखी हो गयी थी। 

वही कामिनी जो मुस्ताक की तमन्ना है उसी कामिनी का जीवन उसके पति दिलीप देशमुख ने नरक बना रखा है। पाँच सितारा हॉटेल के बिस्तर पर वह लेटी थी लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उसके अपने अतीत के पन्ने फड़फड़ाते हुए उस मनहूस पृष्ठ तक चले गए जब उसने दिलीप से शादी का फैसला किया था और अपना सबकुछ अपने हाथ से उजाड़ दिया था।

स्कूल में आकर मुस्ताक से झगड़ा करने के बाद से वह दिलीप से नाखुश थी। क्योंकि दिलीप कौन होता है यह निर्णय करने वाला की वह किससे दोस्ती करेगी और किसे प्यार करेगी ? वह उसका गुलाम थोड़ी है। बात सिर्फ इतनी सी है कि एक ही मुहल्ले में रहते हैं और बचपन से एक दूसरे को जानते हैं। यह बात उसने राहुल को साफ साफ बताया था और उसे दिलीप को स्पष्ट बताने को कह दिया था। लेकिन दिलीप की हरकतें बंद होने की जगह बढ़ती गयी। उसने खुद को कामिनी का स्वयम्भू प्रेमी और भावी पति घोषित कर दिया। कहीं भी उसका रास्ता रोक लेता ,बातें करने की कोशिश करता ।यदि कोई भी लड़का मेरे करीब आने की कोशिश करता या बात करते दिख जाता उससे बिना कारण वह झगड़ा कर लेता। मैं अपने पिताजी के गुस्से को जानती थी इसलिए कभी उनको नहीं बताया। लेकिन बात किसी तरह उनके कान तक पहुंच गई।एक रोज दिलीप बाजार में मिल गया और मुझे जबरदस्ती अपनी बाइक पर बैठाने लगा। मेरे मना करने के बावजूद वह शारीरिक जिद करने लगा ।तभी संयोग से पिताजी बस से वहाँ से गुजर रहे थे । उन्होंने आधी अधूरी हरकतें देखी और सुनी हुई बातों से पूरा अनुमान लगा लिया।

रात को जब पिताजी घर लौटे तो कामिनी से सिर्फ इतना ही पूछा क्या तुम दिलीप से प्यार करती हो? उसने ना में सिर हिलाया । अगले रोज जब वह कॉलेज से लौटी तो पता चला कि दिलीप को उसके पिताजी ने चाकू से गोध डाला है और वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। कर्नल साहब को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। राहुल के माध्यम से दिलीप ने खबर भेजा कि यदि वह अपने पिताजी को बचाना चाहती है तो उसको आकर मिले। मिलने पर दिलीप ने कहा कि यदि तुम मुझसे शादी करती हो तो मैं उनको छोड़वा सकता हूँ । भाई विदेश में था और दिलीप का परिवार काफी दबंग था। अतः उसने हामी भर दी।

पिताजी को जब यह मालूम हुआ कि उसकी बेटी ने यह स्वीकार किया है कि वो दिलीप से प्यार करती है और उससे शादी कर लिया है। उनको बहुत सदमा लगा और कुछ ही महीनों में उनकी मृत्यु हो गयी। भाई को भी जब सब मालूम हुआ तो वह भी कामिनी से नफरत करने लगा। वैसे भी वह विदेश में ही सेटल्ड होना चाहता था अब तो एक बहाना भी मिल गया। वह कामिनी दिलीप देशमुख बन गयी। कॉलेज खत्म होते ही उसने एक स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगी। वक्त के साथ दिलीप की शारीरिक और मानसिक यातनाएँ बढ़ती गयी। कामिनी के सैलरी एकाउंट का एटीएम भी उसने अपने कब्जे में ले लिया। उसको अपने जेब खर्चे के लिए भी पैसा दिलीप से ही लेना पड़ता । उसकी हरकतों से तंग आकर घर वालों ने उसको परिवार से बाँटकर अलग कर दिया। घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी अब कामिनी पर आ पड़ी। वह केवल नाला निठल्ला घूमता रहा। वक्त के साथ कामिनी और दिलीप का रिश्ता और भी अपभ्रंश होता गया। इसी बीच राहुल की भी शादी हो गयी और उसकी पत्नी से दिलीप के नजायज सम्बंध बन गए । कामिनी को कोई संतान नहीं पैदा हुआ और राहुल की पत्नी से दिलीप का एक बेटा पैदा हुआ। वह दिलीप का फोटोकॉपी था। लेकिन राहुल को इन सब बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता था, उसको तो कामिनी की कमाई मुफ्त में मिल जाती थी। 

कामिनी ने अपनी इसी जिंदगी को अपनी नियति मान लिया था। लेकिन मुस्ताक की "तमन्ना" शब्द ने भावना के शांत पडे झील में कंकड़ उछालकर तरंगें पैदा कर दी थी। उसको पहली बार महसूस हुआ कि उसमे भी एक नारी है जो किसी की तमन्ना हो सकती है। लेकिन बिडम्बना देखिए मुस्ताक जिसको चाहत भरी नजरों से देख रहा है उसको चाहने वाला कोई नहीं है और वह जिससे उम्मीद रखने की उम्मीद कर सकती है उसका अपना भरा पूरा परिवार है। यह पहल सामाजिक और नैतिक दोनों पैमाने पर अमान्य है। उसने मुस्ताक के नजरों में तैरती ईमानदार तमन्ना को महसूस किया था । वह अहसास उसको परेशान कर रही थी । क्या इतने लंबे समय तक कोई अपनी चाहत को सहेज कर इतना जीवंत रख सकता है? 

बहुत कोशिश के बावजूद भी नींद उसके आंखों से दूर रही और सवेरा होने का समय हो गया। रात तो बीत गयी लेकिन उसके अंदर का अंधेरा और गहरा लगने लगा ।कामिनी यह निर्णय नहीं कर पा रही थी उसके लिए क्या उचित है क्या अनुचित है। उसके अंदर भी मुस्ताक के प्रति एक आकर्षण था जिसे वो भूल नहीं पायी थी लेकिन वह वक्त की धूल में कहीं खो सा गया था ।कल की मुलाकात से उस आकर्षण में एक हलचल सी हुई थी। वह बिस्तर से उठी और ताजी हवा के लिए समंदर के किनारे आकर टहलने लगी। उधर सूर्योदय के मनोहारी दृश्य में वह खो सी गयी। ऐसा लग रहा था मानो समंदर की चादर को हटाकर सूरज बाहर निकल रहा हो। वह सोंचने लगी सूरज भी कितना जिद्दी है , हर रोज अंधेरे में डूबने के बाद भी अगले रोज एक नई उम्मीद के साथ ऊपस्थित हो जाता है। शायद हमको यह संदेश देता है कि कोई भी अंधेरा अंतिम नहीं होता नई उम्मीद से नई शुरुआत करनी चाहिए। सच्चे प्रेम में निहित आशा, उम्मीद और उत्सुकता ही जीवन को जीने योग्य बनाती है।

फिर उसके स्व ने उसका उपहास उड़ाया की तुम खुशी उसमें ढूंढने की सोच रही हो जिसपर पहले से ही दो बीबीयों ने कब्जा जमा रखा है। लेकिन मन मे अनाप-सनाप विचार आने पर कोई नियंत्रण नहीं होता है। ना जाने वह कितनी देर तक समंदर के अंदर से निकलते सूरज को देखती रही और अपने पैर के अंगूठे से रेत पर आड़ी तिरछी लकीरें बनाती रही - कभी गहरी, कभी हल्की । लहरें आकर उनको मिटाती रही। वह बेखुदी की मनोदशा में लकीरें बनाती और लहरे उसे मिटा देती। 

तभी उसको ढूंढता हुआ मुस्ताक भी बीच पर आ गया । बेखबर कामिनी की सूर्योदय के साथ उसने कई तस्वीरें अपने मोबाइल से निकली। फिर उसके करीब आकर गुड मॉर्निंग बोला। उसके बाद जैसे कामिनी की तंद्रा भंग हुई।

कामिनी ने उसे पूछा तुम कब आए और तुमको कैसे मालूम कि मैं यहाँ हूँ।

मुस्ताक ने मुस्कुराते हुए कहा जब तुमने इण्टरकॉम और मोबाइल फोन बहुत देर तक नहीं उठाया तो मैंने सीसीटीवी फुटेज देखा उसमे तुम बीच के तरफ बढ़ती दिखी ।फिर मैं यहाँ तक आ गया। लेकिन तुम इतनी गहन मुद्रा में क्या सोंच रही थी?


कामिनी - कुछ खास नहीं, आंखों से समंदर की गहराई माप रही थी जिसमें रोज सूरज समा जाता है और अगली रोज फिर नई जिद्द और नई उम्मीद से वह बाहर निकल आता है। इसमें सत्य क्या है , समंदर की उदारता जो थके सूरज को विश्राम के लिए विस्तार देता है या सूरज दुनिया के साथ लुका छिपी का खेल करता है!

मुस्ताक - तुम दार्शनिक की तरह उन प्रश्नों में क्यों उलझ रही हो जिनका उत्तर न भी मिले तो संसार को कोई अंतर नहीं पड़ता है। सूरज और समंदर की यह आंख मिचौली एक अंतहीन सिलसिला है। तुम देखो इस उगते सूरज के साथ खड़ी कितनी खूबसूरत लग रही हो। इस पल को महसूस करो और उसका लुत्फ उठावो।

फिर उसने अपने फोन से खींची उसकी तस्वीर को दिखाया। उन तस्वीरों को देख कामिनी हतप्रभ रह गयी। तस्वीरें काफी खूबसूरत थी । यकीन नहीं हो रहा था इतनी खूबसूरत नजारा को वह अपनी आंखों से देख रही थी लेकिन महसूस नहीं कर रही थी।

यही होता है , अक्सर लोग अतीत पर पछताने में वर्तमान का भी आनंद नहीं उठा पाते हैं और अंत में अपने जीवन को निरर्थक समझने लगते हैं। कामिनी और मुस्ताक एक ही रेत पर साथ साथ चल रहे थे लेकिन दोनों की मनोदशा विपरीत ध्रुव की धरातल पर विचरण कर रहा था । मुस्ताक कामिनी के साथ बीतने वाले हर पल का पूर्णता में आनंद ले रहा था वहीं कामिनी अपने खुरदरे अतीत के विसंगतियों में उलझी यह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि उसे मुस्ताक के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। एक भूतपूर्व प्रेमिका की तरह या एक मर्यादित विवाहित महिला मित्र की तरह। दोनों ही भूमिका का विकल्प उसके सामने खुला है। तन और मन दोनों कहता मुस्ताक के साथ कदम बढ़ाने में कोई हर्ज नहीं है। समय का लुत्फ लो लेकिन सामाजिक मर्यादा की बंदिशें कहती कि मुस्ताक की तरफ बढ़ता प्रत्येक कदम अपभ्रंश पथ पर ले जाएगा।

लोग क्या कहेंगे यह सोचकर हम वो नहीं करते जो खुद को खुशी देता है और वो करने में ,बनने में ,दिखने में जो लोगों को अच्छा लगे स्व को समाप्त कर देते हैं। फिर स्वयं एक जिंदा लाश बनकर सांसों का बोझ ढोते हैं।



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