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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Fantasy


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

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अकाय - पार्ट 15

अकाय - पार्ट 15

10 mins 160 10 mins 160

चिमटा बाबा के चरण में माथा टेककर दुष्यंत बाबू ने प्रस्थान की अनुमति मांगी और पूछा कि बाबा इसमें कितना खर्च आएगा ताकि मैं उस हिसाब से भी तैयार रहूँगा ।

चिमटा बाबा - देखो कोई भी सच्चा तंत्रसाधक या आध्यात्मिक व्यक्ति अपने कार्य का पारिश्रमिक नहीं मांगता है । क्योंकि यह शक्ति उसको विशेष आशीर्वाद के रूप में मिली होती है और आशीर्वाद बेचा नहीं जाता है। उसका प्रयोग केवल कल्याण में ही होना चाहिए। यदि कोई साधक तुमसे पहले पैसा लेकर काम करने की बात करे तो यही समझना या तो उसे अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं है या वह ढोंगी है। इतना तय है कि इस लोक में सब चंचला माया से ही चलता है। अतः जीवन यापन के लिए संत सन्यासी को भी धन की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन हर इंसान को यह ख्याल रखना चाहिए कि उसके पास शुभ लक्ष्मी का आगमन हो अलक्ष्मी का नहीं। लक्ष्मी अलक्ष्मी में बदल जाती है जब देने वाले का मन व्यथित होता है। अतः आपको जो उचित लगे बाहर रखे दान पेटी में डाल देना । हम उसको अपना सौभाग्य समझकर ग्रहण कर लेते हैं। यदि तुम्हारी तरह के तकलीफ में कोई गरीब व्यक्ति हो तो उसको भी इस संकट से मुक्त कराना मेरा कर्तव्य है। सच्चा साधक कष्टनिवारण में पीड़ित की अवस्था देखता है मुद्रा की व्यवस्था नहीं। यदि धनाभाव के चलते वह किसी की मदद करने से इनकार कर देता है तो उसकी साधना शक्ति क्षीण पड़ने लगती है।

अच्छा तुम जब घर पहुंचोगे तो इस प्रेत रोधक पोटली को सोने से पहले रात में बारह बजे तक घर के कोने-कोने में घुमाकर मुख्य दरवाजे पर लटका देना। घर का कोई भी कोना छूटना नहीं चाहिए। यह काम तुम्हारी पत्नी को करना है और तुम साथ मे रहोगे। यह काम करते समय कोई टोका टोकी नहीं करना चाहिए। दरवाजे पर लटकाने के बाद उस परिक्षेत्र में जो भी भूतात्मा होगी वहाँ पर कैद हो जाएगी। वहाँ से ना कोई बाहर निकल पाएगा, न कोई अंदर प्रवेश कर पाएगा। मैं यहाँ से उसपर नजर रखूँगा । इसके अतिरिक्त तुमको घर के पीछे चहारदीवारी के अंदर जो खाली जगह है उसके चारों कोने पर छह इंच का गोल गढ़ा खोद देना और बीच में उतना ही बड़ा वर्गाकार गढ़ा होना चाहिए। तुम उसमें रोज शाम को पानी भरकर मिट्टी के ढक्कन से ढक देना। अगले रोज तुमको चारों कोने में से किसी ना किसी का पानी सूखा मिलेगा। जिस दिन बीच के वर्गाकार गढ़े का पानी सूखा मिले मुझे सूचित करना । उस समय अपने पास पांच हरा निम्बू तैयार रखना। मेरे कहने के बाद उसको गढ़े में डालकर उसको भर देना।

हाँ जिस रूम में झन झन की आवाज आती है उसमें तुम्हारी पत्नी के अलावा कोई नहीं प्रवेश करेगा। उस रूम के बीचोबीच एक कलश में पानी भरकर रखना और उसमें ग्यारह सुपारी डाल देना। उस कलश के समीप सवा नाहिन चतुर्मुखी अखंड दीप जलना चाहिए। उसमें तील का तेल प्रयोग करना होगा।

आगे देखते हैं माँ चंडिका का क्या आदेश होता है। मैं तो बस वही कहता हूँ जो उनका आदेश होता हैं। 

आश्रम से निकलने के बाद दोनों लगभग संतुष्ट दिख रहे थे । चिमटा बाबा के रूप में उनको उम्मीद की किरण मिल गयी थी। दुष्यंत बाबू यही सोचकर आनंद की अनुभूति कर रहे थे कि शायद अब राधा की माँ भी एक नार्मल इंसान की जिंदगी जी पाएगी। जब देखो तो बीमार ही रहती है और कोई पूछे कि क्या हुआ है तो बताने के लिए कुछ भी नहीं है। सब जाँच रिपोर्ट नॉर्मल है। थोड़ी देर के लिए भी उसकी तबीयत ठीक होती है तो स्वस्थ व्यक्ति की तरह घर का सारा काम फटाफट निपटा लेती है। यदि लक्षण के अनुसार उसको डॉक्टर के पास लेकर जाए तो उसको शायद दुनिया के हर विशेषज्ञ के पास ले जाना पड़े। किसी भी इंसान में इतनी बीमारी कैसे हो सकती है!! यदि है भी तो अपने आप वो ठीक कैसे हो सकता है। बीमारी होगी तो या तो ठीक होगी या ठिकाने लगा देगी। इसी से साबित होता है कि यह मसला निसंदेह पैरानॉर्मल है।

घर पहुँचने के बाद दुष्यंत बाबू ने अपनी पत्नी को सविस्तार बताया कि चिमटा बाबा के आश्रम में जो कुछ भी हुआ। 

सब जानने और अपने पति के चेहरे की प्रसन्नता देखकर राधा की माँ को भी उम्मीद के साइड खड़ा होने का मन करने लगा। क्योंकि चिमटा बाबा ने कोई पैसा की मांग नहीं रखी है और नैहरे-ससुरे उनका नाम भी सुना हुआ है। पिछली बार कटनी के जाली पंडित के चक्कर में हमलोग पड़ गए थे। उसने बातें तो सभी सही बताई थी। बल्कि इनसे भी ज्यादा खुलकर । उसने कहा कि एक लाख रुपया लूंगा और गारंटी के साथ ठीक कर दूंगा। आपने भी उसके झांसे में आकर लाख रुपया एक ही मुठी गीन दिया। वो कलमुँहा पंडित इतने तरह का बरजनेमि कराया कि किसी भी जिंदा इंसान के लिए अक्षरसः पालन कर पाना असंभव था। मांसाहार नहीं करना है,दारू नहीं पीना है, किसी दूसरे के घर का कुछ नहीं खाना है, ताबीज-जन्तर को हर प्रकार की अशुद्धि से बचाना है, पति पत्नी को संबंध नहीं बनाना है तीन महीने तक और मालूम नहीं क्या- क्या अचरम-पचरम लगाया था। अपनी नाकामी का सारा ठीकरा इस बात पर फोड़ दिया कि आपने एक रोज किसी पार्टी में चिकेन खा लिया था।

राधा की माँ चिमटा बाबा के उपाय को करने को सहर्ष तैयार हो गयी। खाना खाकर जब घर के सभी सदस्य सो गए तो दोनों प्राणी ने मिलकर 'प्रेतरोधक पोटली' को पूरे घर आंगन में घुमाकर मुख्य प्रवेशद्वार पर लटका दिया।


रोज की तरह सत्यम रात में रामु के शरीर से निकलकर अपने घर चला गया था। सुबह जब वह आया तो दरवाजे पर पहुँचते ही उसको जोर का झटका लगा , मानो उसने चार सौ चालीस वोल्ट का नंगा तार पकड़ लिया हो। उसको ऐसा लग रहा था मानो कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो। उसकी सारी कोशिश नाकाम रही। घर का कोई भी सदस्य आराम से अंदर बाहर आ-जा रहा है। किसी को कोई तकलीफ नहीं है। कुछ देर बाद रामु वोडा को लेकर बाहर आया तो सत्यम उसके शारीर में प्रवेश कर गया। वह वोडा को टहलाकर जब लौटा तो दरवाजे पर कॉल बेल बजाते ही उसको झटका लगा और वह वहीं गिर पड़ा। अब सत्यम को एहसास हो गया कोई अदृश्य शक्ति है जो उसको प्रवेश करने से रोक रही है। रामु को समझ में नहीं आ रहा था आखिर वो गिरा कैसे और उसको झटका जैसा क्यों महसूस हुआ, कहीं स्विच में करंट तो नहीं आ रहा है। वोडा भौंकने लगा। बालकॉनी से राधा ने रामु को गिरते देख लिया था । वह दौड़कर आयी और दादी को भी बुला लिया। दोनों ने मिलकर उसको उठाया। उसने जो भी महसूस किया बता दिया। फिर राधा ने दो बार बेल बजाकर देखा कोई करंट नहीं मार रहा है। फिर दादी ने कहा "तू नशा-पताई करने लगा क्या?" फिर उसका मुंह सूंघा। सब ठीक ही था।

अब अकाय सत्यम रामु के शरीर से बाहर आकर मुख्य द्वार का बारीकी से अवलोकन किया । आखिर रातोंरात ऐसा क्या हो गया कि उसका राधा के घर मे प्रवेश वर्जित हो गया। कुछ तो हुआ है जो उसके पीठ पीछे हुआ है । तभी उसका ध्यान उस पोटली पर अटक गई जो कल शाम तक वहाँ नहीं थी। उसने अनुमान लगाया कि इस अवरोध का कारण वह पोटली ही है। फिर उसने सोंचा की चलो दूसरी जगह से प्रवेश करते हैं। उसको अंदर घुंसने के लिए दरवाजा की कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन उसका सारा प्रयास विफल रहा । हर जगह उसको वही अदृश्य दीवार उसका रास्ता रोक रही थी। फिर उसने ऊपर से अंदर घुसने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुआ। उसको अपनी गाय नानी तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। वह घर के ऊपर खुले आसमान में भी खड़ा नहीं हो पा रहा था। बहुत कोशिश के बाद घर के बाहर एक नीम के पेड़ की उपरी डाल पर बैठकर वह अपनी गाय नानी का दर्शन कर पाया। इसके अलावा उसके पास कोई दूसरा उपाय नहीं था। जबतक गाय बाहर बंधी रहेगी तबतक देख सकता है लेकिन रूम के अंदर चले जाने पर वह नहीं देख सकता है। उसके लिए यह बहुत ही असुविधा और दुविधा जनक परिस्थिति पैदा हो गयी। वह अपनी गाय नानी तक पहुंच नहीं पाएगा और कामचोर रामु अच्छी तरह से देखभाल नहीं करेगा । अब वह गाय नानी का केवल दूरदर्शन लाभ ही प्राप्त कर सकता है। इस संकट का तो उसको भान भी नहीं था। उसको मालूम नहीं यह अवस्था कबतक बनी रहेगी।


उसका मन बहुत उदास हो गया। क्योंकि गाय नानी का बच्चा देने का समय करीब आ गया था। कल ही दादी कह रही थी अब गाय के रात बियान का समय आ गया है। उसको बहुत दुख हो रहा था कि इस बंधन के चलते वह अपनी माँ को नए अवतार में जन्म लेते हुए नहीं देख पाएगा।

कल तक वह कितना खुश था, उत्सुक था , उतावला था उस क्षण का गवाह बनने के लिए जब उसकी माँ की आत्मा का नए रूप में अवतरण होगा और वह उसके साथ अपना समय व्यतीत करते हुए आनंद महसूस करेगा। सुख ,दुख और आनंद का बड़ा ही गहरा और अनूठा रिश्ता है। सुख की मात्रा में कमी दुख है और दुख की अनुपातिक कमी सुख है। इन दोनों का संबंध बाहरी दुनिया के साधनों से है। लेकिन आनंद एक स्वांत्रिक अवस्था है जिसका बाहरी वैभव या घटना से कुछ भी लेना देना नहीं है। आनंदित रहना एक कला है जो किसी किसी को आता है- है तो उत्तम ,नहीं है तो अतिउत्तम । लंबी यात्रा में छोटी गठरी सुविधाजनक होती है। सुख दुख दोनो के प्रति समभाव आनंद के समीप ले जाता है। समभाव का व्यवहारिक निर्वहन कर पाना कठिन होता है। अकाय रूप में भी सत्यम को इस बात का दुख है कि वह अपनी गाय नानी और बछिया माँ से अपनी मर्जी से नहीं मिल पाएगा। 

अपने आनंद के स्तर को बनाए रखने के लिए उसने सोंचा चलो कम से कम नीम के पेड़ पर बैठकर उनको देख सकता है। यह क्या काम है! आगे की आगे देखेंगे , इस बंधन की कुछ तो अवधि होगी, कुछ तो राज होगा, कुछ तो इलाज होगा। जब वांछित प्रश्न का उत्तर नहीं मिले तो उचित वक्त का इंतजार करना ही सही विकल्प है। क्योंकि सही समय पर समय सभी प्रश्न का सही उत्तर ढूंढ लेता है।

आनंदमय जीवन के लिए छोटी-छोटी बातों में बड़ी-बड़ी खुशियां ढूंढने के सकारात्मक सयास करना चाहिए। सत्यम अभी यही सोंच रहा था कि घर के अंदर वह जा नहीं सकता और जिस उद्देश्य से यहाँ चिपका हुआ था वह पूरा नहीं होने वाला है ।आखिर वह करे भी तो क्या करे ? 

तभी उसकी नजर घर से बाहर निकलती राधा पर पड़ी जो तैयार होकर कॉलेज जा रही थी। उसके एग्जाम का समय नजदीक आ रहा है तो प्रजेक्ट सबमिशन और लाइब्रेरी में पढ़ाई के चलते कॉलेज में ज्यादा समय निकल रहा है। लेकिन इधर कुछ दिनों से वह तनाव में दिख रही है। सत्यम इसको एग्जाम प्रेशर समझ रहा था और उस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया । आज वह फुरसत में था तो अपनी राधा के साथ वह उसके कॉलेज चल पड़ा। नुक्कड़ पर आकर राधा ने रिक्शा लिया वह भी उसके साथ बैठ गया। उसके बदन की जानी पहचानी खुशबू को वह बहुत दिन बाद इतने करीब और इत्मीनान से महसूस कर रहा था। लालपुर छोटा शहर होने के चलते उन दोनों का मिलना जुलना इस तरह से खुलेआम नहीं हो पाता था। आज किसी के नजर में आने का डर नहीं है तो वह एकदम चिपक कर बैठा है लेकिन जिससे चिपका है यदि उसको हकीकत ज्ञात हो जाए तो वह आनंदित होने की जगह भयभीत हो जाएगी।

हवा के झोंके से उड़कर जब राधा का दुपट्टा उसको स्पर्श करता तो उसको एक अलग तरह की संतुष्टि मिल रही थी। उसके गाल पर लटके बाल हवा के साथ मिलकर एक शरारत से कर रहे थे कभी इस गाल को कभी उस गाल को सहला रहे थे ।वह उसे कई बार अपनी हाथों से ठीक करती। वह इस मस्त नजारे का पूर्णता में आनंद ले रहा था तभी उसको एहसास हुआ कि यह एहसास तो भरम है क्योंकि उसको तो मालूम ही नहीं कि उसको कोई इतनी बारीकी से निरेख रहा है।

जवान लड़की को चुपके से निरेखती नजरों का एहसास अच्छा लगता है, आह भरती नजरों का पीछा करना भी अच्छा लगता है। इन नजरों की गिनती उसके आकर्षण का प्रमाणपत्र होती हैं। लेकिन यहाँ तो आज एहसास ही एकतरफा था जो कभी जीवंत और दोतरफा हुआ करता था। 

आज पहली बार सत्यम राधा के साथ उसके कॉलेज में गया। क्योंकि वह कॉमर्स कॉलेज में पढ़ती थी और वह आर्ट कॉलेज में पढ़ता था। बात फैलने के डर से वो दोनों कॉलेज के बाहर ही मिलते थे। जैसे ही रिक्शा कॉलेज के गेट पर रुका सत्यम को लगा सुहाना सफर का अंत हो गया लेकिन राधा के लिए तो यह रूटीन था। इसलिए यह अनुमान करना असंभव है कि किसी घटना का कौन किस रूप में कितना आनंद उठा रहा है जिसमें आप भी पात्र हो।

क्रमशः -----------


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