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सच की जीत

सच की जीत

28 mins 908 28 mins 908


                                     

 

        सुबह-सुबह विमल को पलंग पर न पाकर विनीता बुदबुदा उठी...सिर्फ काम ही काम, न अपने स्वास्थ्य की चिंता और न ही घर की...। सुबह से ही अपने आफिस कम स्टडी रूम में जाकर बैठ गये हैं । इतने काम और ईमानदारी से क्या मिला ? एकमात्र बेटी के हाथ पीले करना भी असंभव प्रतीत हो रहा है ।

        विनीता चाय बनाकर स्टडी रूम में ले गई । दरवाजा अंदर से बंद था । मन में खटका हुआ । विमल कभी तो दरवाजा बंद नहीं करते । आज बंद क्यों कर लिया...? धड़कते दिल से दरवाजा खटखटाया । न खुलने पर अव्यक्त भय से त्रस्त जोर-जोर से आवाज लगाते हुए दरवाजा खटखटाने लगी । शोर सुनकर रिनी भी आ गई...

        ‘ क्या बात है ममा...? दरवाजा क्यों खटखटा रही हो...?’ उसे दरवाजा खटखटाते देख रिनी ने उससे पूछा ।

        ‘ पता नहीं बेटा, इतनी देर से दरवाजा खटखटा रही हूँ , पर तेरे डैड न तो दरवाजा खोल रहे हैं और न ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं ।’ विनीता ने रोआँसे स्वर में कहा ।

        रिनी ने भी आवाज लगाई । कोई उत्तर न पाकर वह जोर-जोर से दरवाजे पर हाथ मारने लगीं पर फिर भी दरवाजा खुलते न देखकर वह पड़ोसी रमाकान्त के घर दौड़ी-दौड़ी गई । उसकी परेशानी और बदहवास हालत देखकर वह तुरंत ही आ गये । उनके प्रयत्नों से दरवाजा खुल गया । वे सब बदहवासी में अंदर घुसे तो देखा विमल टेबल पर सिर रखे बैठा है । आँखें बंद हैं तथा मुँह से झाग निकल रहा है । उसकी स्थिति देखकर रिनी डैडी...डैडी कर उसे झकझोरने लगी ।

        विनीता टेबल पर रखे पानी के गिलास, नींद की गोलियों के खाली रैपर देखकर अव्यक्त आशंका से काँपने लगी । काँपते हाथों से राइटिंग पैड उठाया...।

        पहला नोट पुलिस के नाम था...मैं आत्महत्या कर रहा हूँ अतः व्यर्थ किसी को परेशान न किया जाये ।

        दूसरा पत्र था रिनी के नाम....बेटा, मैं जिंदगी भर तुझे कोई सुख नहीं दे सका । इस भाग्यहीन पिता को हो सके तो क्षमा कर देना ।

        तीसरा पत्र था विनीता के नाम...जीवन को रंगीन, स्वप्निल बनाने के लिये पैसा चाहिए जो एक नौकरीपेशा इंसान के मामूली वेतन में असंभव है । नाजायज तरीके से पैसा कमाना मेरे सिद्धांत के प्रतिकूल है । अब मेरे शव के द्वारा, मेरे पी.एफ., ग्रेजुएटी एवं इंश्योरेंस के द्वारा तुम्हें काफी पैसे मिल जायेंगे । हो सके तो उन रूपयों से रिनी के हाथ पीले कर देना । अब तुम अपनी तरह से जीवनयापन के लिये स्वतंत्र हो ।

        ‘ ममा, तुम्हीं सदा डैडी से झगड़ा करती रहती थीं । तुम्हारी आकांक्षाओं के असीमित आकाश के कारण आज मुझे अनाथ होना पड़ा । तुम्हीं मेरे डैडी की मृत्यु का कारण हो...।’ कहते हुये रिनी चीख उठी ।

        ‘ हाँ बेटी, तुम ठीक कह रही हो...।’ कहते हुए विनीता कटी पतंग की तरह वहीं पर गिर पड़ी । अस्फुट स्वर में बुदबुदाते हुए बोलीं,‘ तुमने यह क्या किया विमल ? इतनी भयानक सजा क्यों दी मुझे...? यह सच है कि मैंने सदा तुम्हारे आदर्शो की अवहेलना की, यहाँ तक कि अपनी इच्छाओं को पूरा न कर पाने के कारण जब-तब तुम्हें अपमानित भी किया, पर तुमने तो मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक ही नहीं छोड़ा...।’

        ‘ भाभी, रिनी सँभालो स्वयं को...विमल अभी जिंदा है । इसे जल्दी से अस्पताल ले जाना होगा...।’ रमाकान्त ने विमल की नब्ज देखते हुए कहा ।

        ‘ क्या...?’ दोनों ने एक साथ कहा ।

        ‘ हाँ बेटी, रोओ मत...। मैं अभी गाड़ी निकालता हूँ । ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा...।’ 

        रमाकान्त ने विमल को गाड़ी में बिठाया तथा अपने ही एक रिश्तेदार डाक्टर के नर्सिग होम में एडमिट करवा दिया क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करते तो विमल के विरूद्ध आत्महत्या का केस पुलिस दर्ज कर सकती थी...।

        रमाकान्त विमल की मनःस्थिति से परिचित थे । उनके परिवार से उनका घनिष्ट संबंध है । वह नहीं चाहते थे कि विमल के ओवर रियक्शन से वह तथा उसके परिवार के लोग संकट में आये । लड़ाई झगड़ा किस परिवार में नहीं होता पर इसका मतलब यह तो नहीं कि जीवन का अंत ही कर लिया जाये...।

        विमल को आई.सी.यू. यूनिट में भर्ती देखकर जहाँ रिनी को अपनी माँ गलत लग रही थी वहीं विनीता के दिल में हलचल मची हुई थी । वह कहाँ गलत थी...? क्या उसकी चाहना गलत थी या दो विभिन्न परिवेश से आये व्यक्तियों के सामंजस्य नहीं बिठा पाने के कारण ऐसी स्थिति पैदा हुई थी । अनजाने ही वह अतीत के गलियारों में भटकने लगी...

        वह एक अमीर माता-पिता की नकचढ़ी बेटी थी । बचपन से दुख और अभाव से उसका सामना ही नहीं हुआ था । ग्रेजुएशन करते-करते कालेज के वार्षिक समारोह की तैयारी के समय उसका परिचय अपने से दो वर्ष सीनियर विमल से हो गया । यह छोटा सा परिचय न जाने कब प्यार में बदल गया पता ही न चला । विमल सामान्य परिवार से था । उसके पिता मिडिल स्कूल में टीचर थे पर पोस्ट ग्रेजुएशन करते ही उसका अपनी मेहनत के बल पर स्टेट सिविल सर्विसेस में चयन हो गया ।

        विमल की नौकरी लगते ही जब विनीता ने अपने माता-पिता को अपने प्यार के बारे में बताया तो पहले तो वे बिगड़े । विमल के साधारण बैकग्राउंड देखकर झिझके पर विनीता की जिद तथा विमल के सुनहरे भविष्य को देखते हुए अंततः उन्होंने सहमति दे दी । विमल ने विवाह की तैयारी करते उसके पिताजी से विनम्र स्वर में कहा था कि वह विवाह के समय कोई उपहार ग्रहण नहीं करेगा । विनीता को भी वह मात्र पाँच कपड़ों में ही ब्याह कर ले जायेगा । विमल के आग्रह को सुनकर उसके माता-पिता को आश्चर्य हुआ था । वह भी थोड़ा परेशान तो हुई थी पर प्यार का नशा उस पर ऐसा चढ़ा था कि उस समय वह विमल की हर बात मानती गई थी ।

    विवाह के पश्चात् जैसे-जैसे प्यार का नशा उतरता गया वैसे-वैसे उसे विमल में कमियाँ नजर आती गईं। जहाँ वह भौतिक वस्तुओं की शौकीन थी वहीं विमल किताबी कीड़ा था । आफिस से आते ही वह जहाँ घूमने जाना चाहती थी वहीं वह अपना कुछ समय किताबों के साथ बिताना चाहता था । धीरे-धीरे अकेलेपन के एहसास के साथ उसे सुख-सुविधाओं की कमी महसूस होने लगी । उसे याद आया अपने विवाह के दस महीने पश्चात् आया उसका जन्मदिन का दिन...  

        ‘ मैनी मैनी हैप्पी रिर्टन आफ द डे विनी ।’ प्यार भरे शब्दों में कहते हुए विमल ने कमरे में प्रवेश करते हुये उसे एक उपहार पकड़ाया ।

        ‘ क्या लाये हो, दिखाओे न...? ’ उसने खुशी से मचलते हुए पूछा ।

        ‘ तुम स्वयं ही अनुमान लगाओ ।’

        ‘ मुझे क्या पता ? तुम ही बताओ...।’ कहते हुए विनीता बच्चों सी चहक उठी थी ।    

        ‘ तुम स्वयं ही खोलकर देख लो । तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी ओर से तुच्छ भेंट । तुम युग-युग जिओ । मेरी उम्र भी तुम्हें लग जाये...।’ उपहार उसके हाथ में देते हुए रोमांटिक प्रेमी की तरह उसने कहा ।

        ‘ हटो, ऐसा भी कहीं कहते हैं ।’ विनीता ने भी उसी गर्मजोशी के साथ उत्तर देते हुए विमल के मुख पर हाथ रख दिया था ।

        ‘ उपहार, यही उपहार मिला है मुझे देने के लिये तुम्हें...।’ विनी ने पैकेट में पुस्तक देखकर मुँह बनाकर उत्तर दिया था ।

        ‘ इस पुस्तक को पढ़कर देखो तो सही । बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं रोचक है जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक ‘ डिस्कवरी आफ इंडिया ।’

        ‘ यह क्यों नहीं कहते कि इससे अधिक मेरे जन्मदिन पर खर्च करने की हैसियत नहीं है तुम्हारी ? ’

        ‘ यह क्या कह रही हो विनी...?’ तड़प कर विमल ने कहा था...।

        ‘ मैं ठीक ही कह रही हँू...पड़ोसी मित्रा भी तो आपके ही स्तर के पदाधिकारी हैं किंतु हमारे और उनके घर के स्तर में इतना अंतर क्यों है ? क्या नहीं है उनके पास ? कलर टी.वी., टू इन वन, वी.सी.आर...इत्यादि । निवा मित्रा घर में भी हजार, दो हजार से कम की ड्रेस नहीं पहनती हैं और आज जन्म दिन पर भी बस आप एक किताब उठा लाये...।’ आक्रोशात्मक स्वर में विनी ने उत्तर दिया था ।

        ‘ विनी दूसरों के साथ कभी अपनी तुलना मत किया करो...। वैसे भी इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता । एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी पैदा हो जाती है । जितनी चादर हो उतना ही पैर फैलाना चाहिए फिर हम कितनों से अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं । आज भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है...। ऊपर देखने की अपेक्षा अगर नीचे देखोगी तो ज्यादा सुख और संतोष पाओगी । मुझे पुस्तकों से अच्छा और कोई उपहार नहीं लगता क्योंकि पुस्तक हमारे मानसिक सौन्दर्य का विकास करती हैं । अगर तुम्हें मेरा उपहार पसंद नहीं आया तो कोई बात नहीं, क्रोध थूको और तैयार हो जाओ, अपनी मनपसंद ड्रेस या जो चाहे खरीद लेना और हाँ आज बाहर खाना खाकर ही आयेंगे...।’ शांत स्वर में विमल ने कहा ।

        ‘ इतनी दरियादिली अब रहने ही दो...। कोरे उपदेशों के सहारे जीवन नहीं व्यतीत किया जा सकता । हमेशा महत्वाकांक्षी होना चाहिए अगर हम ऊपर नहीं देखेंगे तो आगे कैसे बढेंगें...? आज केवल हम दोनों है । मैं अपनी इच्छाओं को दबा सकती हूँ किंतु कल जब हम दो से तीन होंगे तब बच्चों की इच्छाओं का दमन होते मैं नहीं देख पाऊँगी । तुम्हें अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास करना होगा । चाहे जैसे भी हो । मुझे अपनी सुख सुविधाओं की पूर्ति के लिये पैसा चाहिए...।’ कहती हुई वह दनदनाती हुई रसोई में चाय बनाने चली गई ।

        चाय नाश्ता लेकर आई तो कमरे में विमल को न पाकर समझ गई कि वह क्रोधित होकर कहीं चला गया है...। वह प्रारंभ से ही आदर्शवादी एवं आत्मसम्मान की गरिमा से युक्त व्यक्तित्व वाला रहा है । यह गुण उसे अपने पिताश्री जो स्कूल में अघ्यापक थे, से विरासत में मिला है । न चाहते हुए भी वह जब तब उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा देती है । विमल ने उसे स्वयं ही विवाह से पहले अपने विचारों से उसे अवगत करा दिया था । उसने भी तो सब देख, समझ बूझकर उसे अपनाया था फिर यह गिला शिकवा क्यों...? आत्मग्लानि से पीड़ित मन ही मन स्वयं को दोष दे रही थी कि बाहर कार के रूकने की आवाज सुनाई दी । सामने ममा, पापा को देख पल भर पहले का विषाद, हर्ष में बदल गया...।

        ‘ हैपी बर्थ डे बेटा...।’ मम्मी ने उसे गले से लगाते हुए कहा ।

        ‘ थैंक यू मम्मी, थैंक यू पापा । कितना ख्याल रखते हैं आप मेरा ?’

        ‘ क्यों विमल नहीं आया अब तक, सात बजने वाले हैं ।’ पापा ने उसे अकेला देखकर घड़ी देखते हुए कहा ।

        ‘ उन्हें तो सदैव काम की ही धुन सवार रहती है । अन्य बातों से उन्हें कोई मतलब ही कब रहा है ?’ झूठ बोलते हुए भी विनीता के मन का आक्रोश जुबां पर आ ही गया ।

        ‘ कोई काम आ गया होगा । अच्छा अब जल्दी से तैयार हो जाओ । विमल भी आता होगा । तुम्हारे लिये कुछ उपहार दिलवाकर आज बाहर ही कहीं खाना खायेंगें ।’ पापा ने आदेशात्मक स्वर में कहा ।

        ‘ बेटा, आठ बजने वाले हैं । विमल का इंतजार करते रहे तो थोड़ी देर बाद बाजार भी बंद हो जायेगा ।’ देर होता देख मम्मी ने चिंतित स्वर में कहा ।

        ‘ पर ममा इनके बिना...।’ वह कहती भी तो कैसे कहती कि वह आ तो जल्दी गया था पर नाराज होकर चला गया है ।

        ‘ ऐसा कर बेटा, ताला लगाकर चाबी पड़ोस में दे चल...।’ उसे चुप देखकर थोड़ा रूक कर मम्मी ने पुनः कहा ।

        ‘ लेकिन यह तो उचित नहीं होगा...। वह बेचारा आफिस से थका हारा आयेगा और घर में ताला लगा देखकर परेशान हो जायेगा ।’ पापा ने विरोध किया था ।

        ‘ तो क्या हम उसकी वजह से अपनी बेटी को अच्छी ट्रीट भी न दें ? आज तो उसे जल्दी आना ही चाहिए था...।’ मम्मी ने डैडी की बात को काटते हुए कहा था ।

        पता नहीं विमल से बदला लेने के लेने की भावना थी या मम्मी का विरोध न कर पाने की झिझक या एक अच्छी ट्रीट की चाह, उसने भी मम्मी की हाँ में हाँ मिला दी । उसकी स्वीकारोक्ति पाकर डैडी विरोध न कर सके तथा सिर्फ इतना बोले,‘ चाबी के साथ एक नोट भी पड़ोस में दे दे कि हम गोल्डन ट्रीट रेस्टोरेंट में खाना खायेंगे, वह भी वहीं आ जाए ।’

        विमल रात्रि को जब लौटा तो ताला लगा देखकर समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे !! तभी पड़ोसी मित्रा जी की लड़की पिंकी उसे चाबी देते हुए बोली,‘ अंकल, आँटी अपने मम्मी पापा के साथ कहीं गई हैं तथा यह चिट्ठी आपको देने के लिये कह गई हैं । ’

        विमल ने ताला खोला । पत्र पढ़कर वह बौखला गया...गोल्डन ट्रीट रेस्टोरेन्ट में इंतजार करेंगे । जब घर में ही इंतजार नहीं कर सके तो बाहर क्या करेंगे ? सब दिखावा है, ढोंग है...। जिसके लिये पैसा हीं आज सब कुछ है वह किसी की मानमर्यादा की परवाह क्यों करेगा...? मन ही मन वह बुदबुदाया ।

        तिरस्कार और अवहेलना के कारण विमल को नींद भी नहीं आ रही थी । करीब ग्यारह बजे घंटी बजी । दरवाजा खोला तो देखा विनीता अपनी मम्मी के साथ दरवाजे पर खड़ी थी तथा उसके पापा गाड़ी से कोई सामान उतरवा रहे थे ।

        ‘ बेटा, हमने बहुत देर तुम्हारा इंतजार किया । ऐसा क्या काम आ गया था कि तुम विनीता के जन्मदिन पर भी शीघ्र घर नहीं आ पाये । तुमने खाना खाया या नहीं...।’ मम्मी ने अपनत्व दिखाते हुए उससे पूछा ।

        ‘ क्षमा करना बेटा, तुम्हारी अनुपस्थिति में हम विनीता को लेकर चले गये किंतु तुम्हारे न रहने से किसी को भी अच्छा नहीं लग रहा था । हम सभी ने तुम्हें बहुत मिस किया...। हमारी ओर से विनीता के जन्मदिन पर मामूली उपहार है । अच्छा अब हम चलते हैं, काफी रात हो गई है । अब तुम लोग भी आराम करो ।’ उसे चुप देखकर डैडी ने कहा ।

        वे दोनों चले गये । विनीता ने उसके गले में हाथ डालते हुए कहा,‘ लगता है तुम्हारा क्रोध अभी तक शांत नहीं हुआ है ।’

        ‘ यह प्यार नहीं, दिखावा है । अगर ऐसा ही था तो तुम मुझे अकेला छोड़कर नहीं जातीं...।’ विमल ने अपने गले से उसकी बाहें हटाते हुए कहा ।

        ‘ छोड़ो भी गुस्सा । यह देखो...मम्मी पापा ने कलर टी.वी. और भइया ने म्यूजिक सिस्टम उपहार में दिया है ।’ विनी ने खुशी से चहकते हुए कहा ।

        ‘ विनी, तुम्हें उनसे इतने कीमती उपहार स्वीकार नहीं करने चाहिए...। अब तुम्हारा विवाह हो गया है ।’

        ‘ वाह ! क्यों नहीं लेने चाहिए...। मैं उनकी पुत्री हूँ ...। उन्हें देने का अधिकार है और मुझे लेने का...।’ विनीता ने सहजता से कहा ।

        ‘ लेकिन विनी...।’

        ‘ लेकिन वेकिन कुछ नहीं, तुम दिलवा नहीं सकते अतः ईष्र्या वश स्वीकार करने में झिझक महसूस कर रहे हो...।’ अचानक फिर विनी के मुँह से व्यंग्यवाण निकल ही गया ।

        ‘ विनीता...।’ विमल ने लगभग चिल्लाते हुए कहा और कमरे में जाकर लेट गया...।

        विनीता ने भी उसे मनाने की कोशिश नहीं की...। पाँच वर्ष बस ऐसे ही रोते मनाते बीत गये...। समय की अबाधगति का कोई क्या रोक पाया है ? वह तो नदी की अविरल धारा की तरह सदा चलता ही जाता है...निरंतर..अनवरत...और इसी तरह सुख-दुख, धूप-छाँव, नोक-झोंक के बीच जीवन चलता रहता है । इसी के साथ बनते बिगड़ते रहते हैं आपसी संबंध...। इसी बीच हमारे प्रेम की डोर को मजबूत बनाने आ पहुँची हमारी प्यारी बिटिया रिनी...। रिनी की मधुर मुस्कान, किलकारियों एवं बालसुलभ हरकतों ने उनके जीवन में मिठास पैदा कर दी थी...। आपसी कलह छोड़ अब वे उसकी किलकारियों में ही अपना सुख चैन ढूँढने लगे थे । जैसे-जैसे वह बढ़ रही थी उसे उसके दाखिले की चिंता सताने लगी...

        ‘ हम अपनी रिनी को बोर्डिग स्कूल में पढ़ायेंगे ।’ एक दिन विनीता ने विमल से कहा ।

        ‘ क्यों क्या यहाँ के स्कूल खराब हैं...? मैं भी तो ऐसे ही स्कूल में पढ़ा था ।’

        ‘ आपके पिताजी के पास पैसा नहीं होगा पर हमारी एक ही बच्ची है अतः मैं उसे अच्छे स्कूल में ही शिक्षा दिलवाऊँगी । वैसे भी तुम्हारा तो हर दूसरे तीसरे वर्ष स्थानांतरण हो जाता है... इससे उसकी पढ़ाई में व्यवधान आयेगा...।

        ‘ विनी, मेरे पिताजी के पास भी ज्यादा पैसा नहीं था और न ही मेरे पास है । कान खोलकर सुन लो मैं इतना खर्च वहन नहीं कर सकता । मैं इतना पैसा कहाँ से लाऊँ...? चोरी करूँ या डाका डालूँ...!! बोलो क्या करूँ ? जहाँ तक व्यवधान का प्रश्न है, मेरे जैसे अन्य अधिकारी भी हैं । जिनके बच्चे बाहर नहीं उनके साथ रहकर ही पढाई़ कर रहे हैं...। ’ अनायास ही विमल का स्वर तेज हो गया था ।

        ‘ मैं कुछ नहीं जानती । मैं अपनी बेटी को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहती हूँ । चाहे इसके लिये मुझे अपने खर्चो में कटौती ही क्यों न करनी पड़े !! जहाँ तक आय का प्रश्न है, क्या तुम नहीं जानते कि अतिरिक्त आय कैसे प्राप्त की जाती है...?’ विनीता ने फिर व्यंग्य से कहा ।

        ‘ जो तुम चाहती हो वह कभी नहीं हो सकता । इतने वर्षो पश्चात् तो मुझे समझने की कोशिश करो...। प्रत्येक इंसान के अपने कुछ सिद्धान्त होते हैं, आदर्श होते हैं, उन पर चलना वह अपना कर्तव्य समझता है...। मेरा भी सिर्फ एक आदर्श है, मेहनत और ईमानदारी की कमाई । उसी में जीवन का सुख निहित है ।’

        ‘ चाहे मेहनत और ईमानदारी की कमाई में हम अपने बच्चों की उचित परवरिश न कर पायें !! ’

        ‘ बच्चों की उचित परवरिश अगर सिर्फ पैसों से ही की जा सकती है तो यह तुम्हारा भ्रम है । यदि तुम आकलन करो तो पाओगी कि पैसे वालों के बच्चे अक्सर बिगड़ते ही हैं क्योंकि वह सोचते हैं कि उनकी प्रत्येक इच्छायें और अभिलाषायें पैसों के द्वारा पूर्ण हो जायेंगी अतः वे परिश्रम से जी चुराने लगते हैं । यदि दैवयोग से कभी विपरीत परिस्थितियों का सामना कर पड़ जाए तो वे अपनी अकर्मण्यता या मेहनत से जी चुराने की आदत के कारण असफल सिद्ध होते हैं अतः जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिये पैसा उतना आवश्यक नहीं है जितने कि संस्कार जो बच्चों को अपने माता-पिता से प्राप्त होते हैं...। पैसा ही सब कुछ होता तो भगवान बुद्ध को राजसी ठाठ बाट छोड़कर वन गमन नहीं करना पड़ता । महात्मा गाँधी को पैसों ने नहीं वरन् उनके आदर्शो ने, मूल्यों ने विश्व प्रसिद्ध बनाया ।’

        ‘ मैं आपके समान दार्शनिक नहीं हूँ । एक सामान्य नारी हूँ । आपका जीवन दर्शन समझ पाने में असमर्थ हूँ । आज के भौतिकतावादी युग में पैसा ही सब कुछ है, बस इतना ही जानतीं हूँ ।’

        ‘ विनी तुम्हें कैसे समझाऊँ...? दुनिया में पैसा ही सब कुछ नहीं है । आदमी की अपनी इज्जत होती है और यदि वह नीलाम हो गई तो वह कहीं का नहीं रहता । काश ! तुम मुझे समझ पाती तो मैं आज स्वयं को इतना अकेला और असहाय महसूस नहीं करता...।’ वह स्वयं बुदबुदा उठा और सदा की तरह अपना सिर पकड़ कर बैठ गया ।

        तभी नन्हीं रिनी ने आकर अपने नन्हें हाथों से उसका सिर उठाया तथा अपनी बाल सुलभ तोतली आवाज में बोली, ‘ डैडी हमें आइसक्रीम खाना है । प्लीज चलिये न ।’

        ‘ चलो बेटी, हम अभी आपको आइसक्रीम खिलाने ले चलते हैं । ’ कहते हुए उसने रिनी को सीने से लगा लिया तथा अस्फुट स्वर में बोला,‘ मेरे जीवन की एकमात्र खुशी तो तू ही है मेरी बच्ची...। मेरे जीने का सहारा भी तू ही है यदि तू न होती तो शायद मैं जी ही नहीं पाता...।’

        संतोष असंतोष, सुख-दुख के बीच जीवन के बारह बसंत बीत गये । एक दिन विमल थका हारा आकर कुर्सी पर बैठते हुए बोला,‘ विनी एक कप चाय देना ।’

        विनी चाय लेकर उसके पास गई तथा एक कप उसे पकड़ाते हुए वहीं पास में बैठते हुए बोलीं, ‘ क्या हुआ ? बहुत थके लग रहे हो ।’

        ‘ हाँ...आज मंत्री आये थे ।’

        ‘ इनको भी कोई काम नहीं रहता...जब देखो मुँह उठाये चले आते हैं ।’ विनीता ने मुँह बिचकाकर कहा ।

अभी वे बात कर ही रहे थे कि रिनी ने घर में घुसते हुए प्रसन्नता से कहा, ‘ ममा, पापा देखिये मुझे कालेज की वादविवाद प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला है...विषय था आज की नारी पुरूष के समान सक्षम है । मैंने पक्ष में अपने विचार रखे । मेरे तर्को से सब इतने प्रभावित हुए, इतनी तालियाँ बजी कि कुछ पूछिये मत । अगर आप भी होते तो देख कर बहुत ही खुश होते ।’

        ‘ वैरी गुड, दिखाओ तो मिला क्या है ?’ विमल ने रिनी की खुशी में अपना स्वर मिलाते हुए कहा ।

        ‘ सब काल्पनिक बातें हैं यदि यथार्थ से सामना हो पता चले कि आज की नारी पहले की अपेक्षा अब ज्यादा विवश एवं परतंत्र होती जा रही हैं ।’ पिता-पुत्री को ऐसे खुश देखकर विनीता ने कहा ।

        ‘ डैडी क्या हो गया है ममा को...?’ रिनी ने पूछा ।

        ‘ कुछ नहीं बेटी, वह तो सदा से असंतोषी रही हैं...।’   

        ‘ मैं ही पागल हूँ तभी किसी को समझ नहीं पाती...।’ खीजते हुए विनीता ने कहा ।

        समय के साथ विनी ने पोस्टग्रेजुएशन कर लिया तथा कालेज में पढ़ाना प्रारंभ कर दिया था । विनीता को उसका पढ़ाना अच्छा नहीं लगता था । वह चाहती थी कि वह सिविल सर्विस जैसे सम्मानजनक पेशे को अपनाये जबकि रिनी पी.एच.डी कर शिक्षा के क्षेत्र में ही आगे बढ़ना चाहती थी । विनीता की इच्छानुसार रिनी ने सिविल सर्विस की तैयारी प्रारंभ कर दी थी ।

    अब विनीता को विवाह की चिंता सताने लगी थी । कुछ जगह बात भी चलाई । एक ऐसे ही दिन जब लड़के वालों से बात कर विमल लौटा तब विनीता ने उसके सामने चाय रखते हुये पूछा,‘ कहीं बात बनी ?’

        ‘ बात क्या बनेगी...? जहाँ भी जाओ, यही पूछते हैं कितना लगा सकोगे । बीस पच्चीस लाख से कम की कोई बात ही नहीं करता...।’

        ‘ मैं तुमसे इसीलिये कहती रहती थी, आज अगर हमारे पास पैसा होता तो हम अपनी बिटिया के लिये मनपसंद वर खरीद सकते थे । तुम्हारे ट्रांसफ़रेबिल जॉब के कारण मैं नौकरी नहीं कर पाई और घर में बैठकर कोई काम तुमने करने नहीं दिया क्योंकि उससे तुम्हारे अहम्, आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती थी । मैंने तो जैसे तैसे अपनी जिंदगी गुजार दी । बेटी को भी हम क्या ऐसे ही तिल-तिल कर मरते देखेंगे ? क्या उसकी झोली में थोड़ी सी भी खुशी नहीं डाल पायेंगे...?’

        ‘ कहे जाओ विनी, आज मैं सब कुछ सुनने को तैयार हूँ किंतु क्या करूँ, मजबूर हूँ । अपनी आत्मा को तो नहीं कुचल सकता...। एक सच्चे और ईमानदार आदमी का अगर यही हश्र होता है तो होने दो मुझे कोई गिला शिकवा नहीं है पर मेरी सोच आज भी नहीं बदली है । आज भी मैं मानता हूँ सच्चाई पर कभी बुराई हावी नहीं हो सकती । देखना हमारी रिनी के लिये भी एक न एक दिन योग्य वर मिल ही जायेगा ।’

        ‘ मैं बंद आँखों से नहीं खुली आँखों से स्वप्न देखना पसंद करती हूँ । वैसे भी अगर स्वप्न देखने से ही अगर हर इच्छा पूरी हो जाती तो कोई प्रयत्न ही नहीं करता । खैर छोड़ो...तुमने उनसे कहा नहीं कि दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन जुर्म है ।’ 

     ‘ सब कह कर देख लिया । कोई कह देता है कि हमें इस वर्ष विवाह ही नहीं करना है । कोई साफ कह देता है...अरे, भाई कानून तो कितने ही बनते रहते हैं और फिर किसी को पता ही क्या चलेगा ? रस्म पर तो हम एक हजार एक ही लेंगे...।’

        ‘ बोलो अब तुम्हारा आदर्शवाद कहाँ गया...? यदि विवाह करना है तो देना ही पड़ेगा । सामने से नहीं तो पीछे से ही सही... । तब तुम्हारी आत्मा नहीं कचोटेगी...!! सिद्धान्त, आदर्श, उसूल सब किताबी बातें हैं । जीवन को सुखमय बनाने के लिये व्यवहारिक बनना ही पड़ता है । बदलते जीवन मूल्यों के साथ स्वयं में परिवर्तन लाना पड़ता है...।’

        जीवन के आदर्श प्रत्येक काल और परिस्थिति में समान रहे हैं और रहेंगे । वे समय के साथ बदला नहीं करते । काश ! प्रारंभ से ही तुम मुझे समझने का प्रयत्न करतीं । बाह्य आडम्बर युक्त जीवन जीने की अपेक्षा सदा सरल जीवन व्यतीत करते हुए कुछ बचत करती तो शायद आज हम इतनी विकट स्थिति में नहीं होते...।’

        ‘ मुझे तो तुम सदा लांक्षित करते आये हो परन्तु अब एक दूसरे पर आरोप लगाने से कोई हल नहीं निकलेगा, कुछ तो करना ही पड़ेगा...।’

        सिविल सर्विस के प्रिलिमिनरी एक्जाम में रिनी क्लिीयर हो गई थी । मैनस का रिजल्ट आना बाकी था । उसके विवाह की चिंता अभी भी जस कि तस थी । बस एक आस बाकी थी कि यदि वह सिविल सर्विस में आ गई तो अच्छा घर वर मिल जायेगा तथा दहेज भी नहीं देना पड़ेगा ।

    परेशानी तो तब होती जब अड़ोसी पड़ोसी, नाते रिश्तेदार कहते...कब कर रही हो बिटिया का विवाह...? अरे भई, विवाह अगर समय पर न हो तो अच्छा लड़का मिलना मुश्किल हो जाता है । अब वह हरएक से तो कह नहीं सकती थी कि बात दहेज पर आकर रूक जाती है ।

        कल विनीता के भइया-भाभी आये थे । उनके रिनी के विवाह के बारे में पूछने पर उसने कह दिया,‘ भइया, रूपयों पैसों पर आकर बात रूक जाती है...।’

        ‘ जितना चाहे हमसे ले ले, बाद में लौटा देना...।’

        उनके जाते ही विमल फट पड़े थे तथा उससे भी रहा नहीं गया...। आरोप प्रत्यारोपों का जो दौर शुरू हुआ वह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । रिनी ने आकर ही दोनों को यह कहकर चुप कराया, ‘ प्लीज मेरे लिये आप लोग झगड़ा न करें, मुझे अभी विवाह नहीं करना है...। मेरी मंजिल विवाह नहीं मेरा कैरियर है...।’

        दूसरे दिन यह घटना...। सच सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है...। शायद वह सीमा समाप्त हो गई थी वरना एक आदर्शवादी और अपने सिद्धान्तों के पक्के विमल ऐसा कदम कभी न उठाते । अपने इन्हीं सिद्धान्तों के चलते उन्हें अपनी नौकरी में भी क्या-क्या कठिनाइयाँ नहीं उठानी पड़ी । उनके मित्र तो अक्सर कह देते थे...यार, तुम गलत प्रोफेशन में आ गये हो । तुम्हें तो अपने पिताश्री की तरह ही कहीं किसी विद्यालय में शिक्षक ही होना चाहिए था...।

        तब वह मुस्करा कर कहते,‘ मित्र, कोई भी प्रोफेशान बुरा नहीं होता अगर हम अपनी महत्वाकांक्षाओं सीमित रखें तथा अपने निजी स्वार्थो के चलते समझौता न करें...। यह सच है कि सच्चाई और ईमानदारी आज के युग में गौण हो गई हैं पर यह सोचना कि समाप्त हो गई है, ठीक नहीं है । सच्चाई और ईमानदारी का रास्ता दुर्गम अवश्य है पर इतना भी नहीं कि उस पर चला न जा सके । कम से कम मन में इतना संतोष तो रहेगा कि हमने कभी गलत काम नहीं किया...। आज भी मेरा अटल विश्वास है कि जीत अंततः सच्चाई की ही होती है...।’

        इतना अटल निश्चय वाला व्यक्ति भी आज हार कर ऐसा निर्णय ले बैठा । किसी ने सच कहा भी है कि इंसान पूरी दुनिया से लोहा ले सकता है पर अपनों से हार जाता है । आज अपनों के कारण ही विमल को यह दिन देखना पड़ा वरना उसकी ईमानदारी के चर्चे तो उसके पहुँचने से पहले ही दूसरे शहर में पहुँच जाया करते थे...। उसको वह दिन याद आया जब उनका स्थानांतरण बरेली से इटावा हुआ था । वे कार से जा रहे थे । एक जगह नाश्ता करने रूके । तभी एक आदमी आया तथा विमल के पास आकर बोला, ‘ अगर मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो आप विमल वर्मा हैं ।’

        ‘ यस...।’ विमल ने आश्चर्ययुक्त स्वर में कहा ।

        ‘ सर, हम आपस में कभी मिले तो नहीं हैं पर आपके चर्चे जरूर सुने हैं । आप जैसा ईमानदार आफिसर आज के युग में बिरले ही होते हैं । हम आपकी ईमानदारी के कायल हैं, हमें बेहद खुशी है कि आप जैसा आफिसर हमारे शहर में आ रहा है ।’

    वह एक बिजनिस मैन था । वह इटावा का ही था तथा बिजनिस ट्रिप पर निकला था ।

        विमल ने नम्रता से उसका शुक्रिया अदा किया था । चलते समय विमल बिल अदा करने लगे उन्हें ऐसा करते देख वह नम्रता से बोला, ‘ सर, इस बार मुझे पेमेंट करने दीजिए क्योंकि ज्वाइन करने के बाद तो आप हम लोगों से कुछ लेंगे नहीं...।’

        उनके इस इसरार पर विमल ने उनसे क्षमा माँगते हुये स्वयं ही बिल चुकाया था । वह व्यक्ति भी कुछ नहीं कह पाया था । उस क्षण विमल उसे अन्य से अलग लगे थे । उस दिन के बाद तो रिनी के लिये उसके पापा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये थे । यहाँ तक कि जब भी उनकी तकरार होती, वह उसे समझाती हुई अपने पापा के पक्ष में ही खड़ी नजर आती ।

        और आज ऐसे व्यक्ति का ऐसा हश्र...विनीता पश्चाताप की अग्नि में जल रही थी । आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी तथा मन ही मन कह रही थी...मुझे क्षमा कर दो विमल । बस एक मौका और दे दो...इस बार तुम्हें निराश नहीं करूँगी ।

        रिनी जो डाक्टर से मिलने गई थी, ने माँ को ऐसे रोते देखा तो बोली,‘ ममा, शांत हो जाओ...। सब ठीक हो जायेगा । डाक्टर कह रहे हैं कि खतरा टल गया है । डैड के पास मैं बैठती हूँ । आप घर जाकर आराम करो ।’

        ‘ आराम...जब तक तेरे डैडी ठीक नहीं हो जाते, मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।

        ‘ जिद न करो ममा...आलोक तुम्हें घर छोड़ देगा ।’

        वह आलोक के साथ घर लौट आई थी...। आलोक रिनी का मित्र है । दोनों ने एक साथ पोस्टग्रेजुएशन किया था तथा रिनी और आलोक एक ही कालेज में पढ़ा रहे हैं । रिनी जहाँ सिविल सेवा की तैयारी कर रही है वहीं वह पी.एच.डी. कर रहा है । विनी को अचानक ही वह बहुत महत्वपूर्ण लगने लगा । पिछले दो दिनों से वह साये की तरह उनकी देखभाल कर रहा है । इतना कोई मित्र तो नहीं कर सकता...। कहीं मित्रता के अतिरिक्त दोनों में कोई और संबंध तो नहीं है । वह रिनी से बातें करेगी...अगर दोनों विवाह करना चाहेंगे तो वह कर देगी...सामने हीरा है और उसे दिखाई ही नहीं दे रहा है ।  

        जीवन साथी अगर सच्चा मित्र हो तो जीवन सुखमय बन सकता है...। सोचकर विनीता को एक आशा की किरण दिखाई थी । तभी उसके दिल ने टोका...प्रेम विवाह तो तुमने भी किया था पर तुम्हारा विवाह तो यथार्थ की कठोर सच्चाई से टकराकर चूर-चूर होता रहा यहाँ तक कि बिखरने की कगार पर पहुँच चुका है...अंततः उसने रिनी से बात करने का विचार त्याग दिया ।

        हफ्ते भर बाद विमल घर आ आये...। उन्होंने डियूटी भी ज्वाइन कर ली थी । इसके बावजूद घर में अव्यक्त तनाव मौजूद था । जहाँ रिनी अपने डैडी के मानसिक तनाव के लिये अपनी ममा को दोषी ठहरा रही थी वहीं विनीता सोच रही थी कि क्या उसी के कारण विमल को यह कदम उठाना पड़ा या वास्तव में वह सामाजिक कुरीतियों के कारण हार गया था !! अगर वह सचमुच हार गया था तो उसे दोष क्यों दिया ? क्या स्त्री की नियति ही अपमान सहने के लिये है...?

        दोनों के बीच आये दरार को पाट पाना संभव प्रतीत नहीं हो रहा था । तभी रिनी का मैनस का रिजल्ट आ गया एक बार लगा कि घर भर में खुशियाँ छा गई...। चारों ओर से बधाई संदेश आने प्रारंभ हो गये । विनीता को लगा कि अब शायद सारी समस्यायें सुलझ जायेंगी ।

        रिनी के चेहरे पर कोई खुशी न पाकर विनीता से रहा न गया । कारण पूछने पर वह बोली, ‘ ममा, मैं सिविल सेवा में जाकर पापा की तरह खानाबदोषों की तरह जीवन व्यतीत नहीं करना चाहती । वैसे भी आजकल इस नौकरी में पहले जैसी गरिमा कहाँ...? इस सर्विस में आजकल सभी भ्रष्ट एवं चापलूस है जो थोड़े बहुत पापा की तरह ईमानदार हैं, उनको उनके अपने ही नहीं समझ पाते तो दूसरा कैसे समझेगा ? बार-बार स्थानांतरण झूठे आरोप...मैं अपनी कालेज की नौकरी से ही खुश हूँ तथा यही करना चाहूंगी । कम से कम यहाँ छल कपट से दूर रहते हुए अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ निभा तो पाऊँगी । आपके कहने पर मैंने सिविल सेवा के लिये परीक्षा तो दे दी थी तथा सफल होकर अपनी श्रेष्ठता भी सिद्ध कर दी पर मैं उसमें नहीं जाऊँगी...।’

        अचानक जैसे उस पर गाज गिर गई...। बाप तो बाप, बेटी भी उसकी कामनाओं पर खरी नहीं उतर रही है । आखिर क्या कमी रह गई उसकी परवरिश में जो रिनी ने अपने निर्णय का जिम्मेदार भी जाने अनजाने उसे ही करार दिया ।

        उसका निर्णय सुनकर एक बार विमल भी चौंके थे पर पुत्री की इच्छाओं का आदर करते हुए उन्होंने उसके निर्णय को तहेदिल से स्वीकार कर लिया था । थक हार कर विनीता ने रिनी के मित्र आलोक से बातें की...

        ‘ आँटी मैंने भी रिनी को समझाने की बहुत कोशिश की पर वह मानती ही नहीं है...।’

        ‘ क्या तुम रिनी से प्यार करते हो ? क्या उससे विवाह करोगेे ?’ अचानक वह बोली ।

        ‘ आँटी, मैं...।’

        ‘ हाँ तुम...।’

        ‘ पर मैंने तो इस बारे में सोचा ही नहीं फिर मैं यह भी नहीं जानता कि रिनी भी मुझे इस नजर से देखती है या नहीं...।’

        ‘ तो अब सोचो, मुझे लगता है वह तुम्हारे साथ खुश रह पायेगी...।’     

        विनीता के प्रस्ताव पर आलोक असमंजस में पड़ गया । रिनी उसे अच्छी तो लगती थी पर वह पहल इसलिये नहीं करना चाहता था कि कहीं रिनी को उसका इस तरह का प्रस्ताव पसंद आये या न आये । वैसे जबसे रिनी ने सिविल सेवा की तैयारी प्रारंभ की थी तबसे उसने दूरी बढ़ा ली थी क्योंकि उसे लगता था कि उनकी मंजिल अलग-अलग है । वैसे भी रिनी की मम्मी को उसका आना और उससे मिलना पसंद नहीं था । वह तो उसके लिये सदा से डाक्टर, इंजीनियर या सिविल सेवा वाला वर ढूँढ रही थी...।

        आज उनके स्वयं के प्रस्ताव पर वह मना नहीं कर पाया । वैसे भी अगर रिनी सिविल सेवा में जाने की इच्छुक होती तो शायद वह मना भी कर देता पर अब तो वह यहीं इसी कालेज में रहकर अपना कैरियर बनाना चाहती है, तब उसे क्या आपत्ति हो सकती है ?

        विनी ने रिनी से बात की तो पहले तो वह चौंकी पर उसके चेहरे की लालिमा उसके दिल का हाल कह गई । विनी की मौन स्वीकृति पाकर विमल से बात की...। विमल को तो आलोक पहले से ही अच्छा लगता था...। वह उसके सहज, सौम्य व्यवहार का कायल था । इससे भी बढ़कर था उसका व्यक्तित्व...। वह कालेज में पढ़ाने के साथ-साथ मानव मनोविज्ञान में रिसर्च कर रहा था । वह पढ़ाने के साथ-साथ मनोचिकित्सक बनकर समाज सेवा भी करना चाहता था क्योंकि उसका मानना था कि आज का व्यक्ति रूपया पैसा, मान और शौहरत के वावजूद मनोरोगों से घिर रहा है शायद वह कुछ के जीवन को नई रोशनी से भर सके । फिर भी उसने विनीता से कहा, ‘ अच्छी तरह सोच लो अध्यापक दामाद तुम्हारी बेटी को वह सुख न दे पाये जिसकी तुमने कल्पना की है । कहीं तुम्हें बाद में पछताना न पड़े...।’

        ‘ आप मुझे शर्मिन्दा मत कीजिए । मैं अपने आकांक्षाओं के असीमित आकाश के कारण पहले भी बहुत कुछ झेल चुकी हूँ । अब समझ गई हूँ कि हर व्यक्ति के जीवन में आकांक्षाओं का आकाश होना चाहिये पर इतना भी नहीं कि उसे अपने जीवन मूल्यों से समझौता करना पड़े । अब मैं व्यर्थ के दिखावे में न पड़कर सहजता से जीना चाहती हूँ । आलोक एक अच्छा लड़का है । सबसे बड़ी बात है कि वह हमारी रिनी को भी पसंद है ।’

        आलोक और रिनीं की स्वीकृति प्राप्त कर विवाह की तैयारी प्रारंभ कर दी । यद्यपि उसके इस निर्णय का उसके भइया भाभी ने विरोध किया था । उन्हें लगा था कि दहेज न दे पाने के कारण अंततः हम सब इस विवाह के लिये राजी हो गये हैं पर उसने यह कहते हुए उन्हें चुप कर दिया, ‘ भइया, प्लीज आप अन्यथा न लें, आलोक अच्छा लडका है, सबसे बड़ी बात यह है कि वह दोनों एक ही कालेज में पढ़ाते हैं, कम से कम जिंदगी में स्थायित्व तो रहेगा...।’

        चाहकर भी वह यह नहीं कह पाई थी कि आलोक रिनी की पसंद है वरना वह सदा की भाँति कहते कि तुम्हारी पसंद भी तो विमल था पर तुम तो खुश नहीं रह पाई और वह सदा की तरह सिर झुका लेती...।

        आज उसे लग रहा था कि विवाह का सफल होना न होना तो दोनों साथियों की आपसी समझदारी और एडजेस्टमेंट पर निर्भर है...। माना विमल सरकारी नौकरी में न होकर एक सफल बिजनिसमैन होता तब क्या कोई समस्या ही नहीं होती...!! उसे अगर समस्या ढूंढनी होती तो वहाँ भी किसी दूसरी समस्या से त्रस्त परेशान रहतीं । क्या उसकी मम्मी को पापा से या भाभी को भइया से कोई शिकायत नहीं थी ? समस्या हर जगह है...हर व्यक्ति समस्याओं त्रस्त है । समस्या का निदान ढूँढ कर आगे बढ़ते जाना ही जीवन है...। 

        कुछ ही दिनों में घर में शहनाई बज उठी । हल्के गुलाबी लहंगे में रिनी का दमदमाता रूप आलोक के सानिध्य में खिल उठा था । विवाह के समारोह के बीच, उन्हें हँसते खिलखिलाते देख विनीता सोच रही थी कि शायद यही उसके जीवन का पहला सही निर्णय है । उसे विमल के शब्द बार-बार याद आ रहे थे...सच्चाई पर कभी बुराई हावी नहीं हो सकती । हमेशा जीत सच्चाई की ही होती है... देखना हमारी रिनी के लिये भी एक न एक दिन योग्य वर मिल ही जायेगा...।

        हर अंधेरे पक्ष के बाद उजाला पक्ष आता ही है । अब इस उजाले पक्ष की उज्जवलता को अपने दामन में संजो कर रखेगी तभी शायद अपने प्यार को सही अर्थो में पाकर सुकून के साथ जीवन के बाकी पल जी पाये...।  

             

                               

 

                                                         सुधा आदेश

 

 



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