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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Inspirational


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Inspirational


तीसरी रोटी

तीसरी रोटी

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महानगरीय जीवन में हर व्यक्ति की जिंदगी टुकड़ों में बँटी हुई है। एक दूसरे को पहचानते बहुत लोग हैं लेकिन कोई किसी को जानता नहीं है। लोगों की जान पहचान एक इंच मुस्कान से लेकर मतलब की दुकान तक सीमित है। उस इंच भर के मुस्कान के आवरण में कितनी खुशी कितना गम छुपा है यह एक राज ही बना रहता है। उसको ना ही कोई छूना चाहता है , ना ही कोई छूने देता है।

शर्मा जी एक ही हैं, लेकिन मॉर्निंग वॉक वाले शर्मा जी, 9.55 की लोकल वाले शर्माजी, मैनेजर शर्मा जी , मिनी के पापा शर्मा जी और अपनी पत्नी एवं सेक्रेटरी के शर्मा जी अलग हैं। "आल इन वन" शर्मा जी को जानने वाला कोई नहीं मिलेगा। यही यहाँ के जीवनशैली की विशेषता और विवशता है।

रोज की तरह तेंदुलकर मैदान में मॉर्निंग वॉक करने वालों की भीड़ जुट चुकी थी। कोई दौड़ रहा है, कोई जॉगिंग कर रहा है, कोई स्ट्रेचिंग कर रहा है, कोई वाक & टॉक में व्यस्त है। यह सिलसिला सुबह पाँच बजे से शुरू होकर साढ़े सात बजे तक चलता है।लोग अपने समयानुसार आते हैं और अपनी सुविधानुसार व्यायाम कर के निकल लेते हैं। लेकिन सात बजे से साढ़ेसात बजे तक लोग अपने मनपसंद के ग्रुप में बैठकर अपने पसंद का वक्त अपने लिए बिताते हैं। यही वो लम्हा होता है जब उनका केवल 'स्व' उनके साथ होता है और 'मैं' कहीं दूर खड़ा इंतजार करता है। जो लोग यहाँ भी 'मैं' का चादर ओढ़े रहते है वो आपको अकेले टहलते या किसी कोने में मुँह लटकाए मिल जाएंगे। इनमें से कुछ तो मात्र डॉक्टर के इंस्ट्रक्शन पर आते है और समझते हैं हम दुनिया पर एहसान कर रहे हैं।

जॉगिंग ट्रैक के डिवाइडर पर ग्रेनाइट की पटी लगी हुई है । उसी पर लोग अपने ग्रुप में बैठकर अपने स्टेटस से इत्तर आनंद उठाते हैं। इन ग्रुप के बैठक को अलग अलग पॉइंट के नाम से जाना जाता है - भजन मंडली, पोलिटिकल मंडली, स्पोर्ट्स मंडली , लाफ्टर मंडली, रोमियो पॉइंट और डॉग लवर्स ।

कुछ ज्ञानचंद और ख़बरचंद ऐसे हैं जो मौसमी पंछी की तरह हर पॉइंट पर फुदकते फिरते हैं।यहाँ निगलते हैं और वहाँ उगलते हैं। मिश्रित प्रजाति के सामाजिक जंतु इस मॉर्निंग वॉक के हिस्सेदार और भागीदार हैं।

एक लंबे अंतराल के बाद उपाधयाय जी तेज कदमों से चले आ रहे थे। वो भजनमंडली के प्रमुख चेहरा हैं ।भजन की शुरुआत वही करते हैं। अपनी अनुपस्थिति में यह उत्तरदायित्व वो किसी को देकर जाते हैं।वो समय के इतने पाबंद हैं कि उनको देखकर आप अपनी घडी का समय मिला सकते हैं। रक रिटायर्ड स्कूल टीचर होने के चलते उनकी पुरी जीवन शैली टाइम टेबल से निर्देशित होती है। आदर सबलोग उनको गुरु जी भी कहते हैं। अनुपस्थित रहने का भी प्रोग्राम पूर्वनियोजित रहता है। वो अपना कुछ समय मुम्बई में ,कुछ समय पैतृक गाँव मे और बाकी कुछ समय अपने दूसरे बेटे के पास अहमदाबाद में बिताते हैं। रिटायरमेंट के बाद उनकी जिंदगी तीन टुकड़े में विभक्त हो गयी है जिसका वो बड़े ही प्रेम और संतुलित अनुशाशन से निर्वाह करते हैं। इस मंडली में अधिकतर रिटायर्ड लोग ही है और अपनी जिंदगी की ढलती शाम को गहन रात्रि में बदलने का इंतजार कर रहे हैं। भजन के बाद सभी अपने अनुभवों और वर्तमान के संघर्ष को एक दूसरे से साझा करते हैं। किसी भी जिज्ञासु के लिए इनका वार्तालाप एक जीवंत पुस्तक की तरह है। 

भजन मंडली को डॉग लवर्स पॉइंट के नेतृत्वकर्ता यादव जी से नहीं पटती है। उनके टीम में अधिकतर युवा पीढ़ी के लोग हैं और उनकी परिचर्चा डॉग ब्रीड ,उनकी देख रेख, उनके पालन पोषण से संबंधित समस्या और निराकरण पर केंद्रित रहता है। इस ग्रुप के लिए डॉग की दुनिया से बाहर किसी चीज का अस्तित्व नहीं है। डॉग्स के फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता आयोजित करना, उनके लिए चिकन पार्टी रखना , उनकी खेल स्पर्धा कराना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। 

पोलिटिकल पॉइंट का नेतृत्व गुप्ता जी के इर्दगिर्द घूमता रहता है।वो रोज कोई न कोई विवादास्पद मुद्दा उछाल देते हैं जिसपर ज्ञानचंदों और अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता रखनेवालों के बीच बहस कटुता की सीमा तक पहुँच जाती है। लेकिन मैदान से बाहर सब ऐसे मिलते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो । पीठ मुड़ते ही बात खत्म, जज्बात खत्म।अगले रोज नया मुद्दा नई बहस।

रोमियो पॉइंट के अधिकतर सदस्य दूरस्थ इलाके से आते हैं ताकि उनके पहचान वाले के मिलने की संभावना नगण्य हो। उनका आपसी व्यवहार और बातचीत लगभग अश्लीलता की श्रेणी में फिट बैठता है। लेकिन उसमे किसी का अपना बच्चा नहीं होता है और कोई भी उच्छऋंखल होती युवा पीढ़ी से पंगा नहीं लेना चाहता और उनकी अनदेखी करता है। इसको वो लोग अपनी स्वीकार्यता समझ बैठे हैं।

           रोज की तरह आज भी गुरुजी भजन मंडली पॉइंट पर नियत समय पर पहुँचे और गणपति स्तुति के बाद "श्रीराम जयराम" शुरू हो गया।फिर हनुमान चालीसा का दो बार पाठ हुआ । उसके बाद तम्बाकू घिसने और गप्प का सिलसिला शुरू हो गया। लेकिन गुरुजी ने यह अनुभव किया कि आज माहौल थोड़ा गंभीर और गमगीन है। चूंकि वह दो महीना बाद जौनपुर से लौटे हैं तो वो यहाँ की वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ थे । उन्होंने अपने मित्र मौर्या से पूछा की भाई क्या बात है? सबलोग गंभीर चिंता में थे। मेरी अनुपस्थिति में किसी के साथ कुछ ऊपर नीचे हुआ है क्या ? 

मौर्या जी ने कहा कुछ खास नहीं बस अपने वो पुरोहित जी जो थे--

गुरुजी - हाँ क्या हुआ उनको ? कहीं उनका विकेट तो नहीं चल गया ?

तभी मिश्रा जी बोले नहीं वैसी कोई बात नहीं हुई है । लेकिन मामला उससे भी गंभीर है।


पुरोहित जी और गुरुजी भजन मंडली के संस्थापक सदस्य थे। उन्ही दोनो ने यह कार्यक्रम शुरू किया था। धीरे धीरे अन्य लोग जुड़ते चले गए थे।अतः गुरुजी का चिंतित होना स्वभाविक था।

मिश्रा जी ने बताया कि अब वो वृद्धाश्रम में रह रहे हैं और काफी दुखी हैं।भगवान बुढापा में किसी को यह दिन नहीं दिखाए।


गुरुजी - लेकिन यह सब कैसे हो गया, उनकी पत्नी कहाँ चली गयी?

मिश्रा जी - पूरी कहानी तो उनके मौत के बाद ही शुरू हुई।पिछले महीने उनकी पत्नी का देहांत हो गया।उसके बाद वो एकदम टूट गए।अब किसी से कुछ भी नहीं बोलते हैं। बहुत दिन से वो नहीं आ रहे थे तो उनका हालचाल जानने के लिए उनके घर गया तो पता चला कि उनक फ्लैट बिक चुका है और वो अब वृद्धाश्रम में रहते हैं। नए मकान मालिक को तो यह भी नहीं मालूम था।यह बात उनके पड़ोसी ने बताया। मैं उनको मिलने के लिए वहाँ गया लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं बताया।ऐसा लग रहा था जैसे वो संज्ञाशून्य हो गए हों।अतः मुझे उनकी इस स्थिति का वास्तविक कारण ज्ञात नहीं हो पाया। कुल मिलाकर उनकी हालत बहुत दयनीय है और कारण अज्ञात है।


यह सब जानकर गुरुजी बहुत दुःखी हुए और कल जाकर उनसे मिलने का निर्णय किया। संयोग से अगले रोज रविवार का दिन था अतः पुरा दिन मुलाकात का समय था। उत्तन के रामभरोसे वृद्धाश्रम में गुरुजी दस बजे पहुँच गए। उन्होंने पुरोहित जी से मिलने का आग्रह आश्रम का देखरेख करनेवाले सकपाल से किया।सकपाल ने उनके कमरे तक पहुंचने का रास्ता बता दिया। गुरुजी जब कमरा में पहुँचे तो देखा कि एक कमरे में पाँच बेड लगा है और सभी बेड पर एक जैसा चादर और तकिया रखा था।यदि उनका रंग सफेद होता तो यह जगह हॉस्पिटल का एक वार्ड जैसा लगता। रूम में घुसते ही पुरोहित जी का बेड दिख गया।वो आंखे बंद कर तकिया के सहारे अर्धलेटि अवस्था में पड़े थे। गुरुजी उनके बिस्तर के करीब जाकर कुछ देर उनको देखते रहे और वो उसी अवस्था मे पड़े रहे। गुरुजी ने जब उनका नाम लेकर अभिवादन किया तो उनकी तंद्रा भंग हुई।

अपने सामने गुरुजी को पाकर पुरोहित जी के सब्र का बांध टूट गया।वो उनसे लिपटकर छोटे बच्चे की तरह फफक कर रो पड़े। गुरुजी ने भी उनको जी भर कर रोने दिया ताकि उनका मन हल्का हो।

उनके बगल के बेड वाले बंगेरा ने कहा "तुम औरत के माफिक क्यों आँसू बहा रहे हो।अभी तक अपनों के लिए जिया अब अपने लिए जीना सीखो। लगता है यह तुम्हारा दोस्त है , तुम इसको लेकर 'क्राइंग पॉइंट' पर चले जावो और उससे बात करके अपना मन हल्का कर लो। यहाँ पर तुम्हारी बात सुनकर दूसरे लोगों के मनोबल पर असर पड़ेगा।"

फिर गुरुजी का हाथ पकड़कर वो बाहर आकर गार्डेन में बरगद के पेड के नीचे रखे बेंच पर बैठ गए। अबतक पुरोहित जी भी कुछ संयमित हो चुके थे। फिर गुरुजी ने उनसे कहा तुम मुझे विस्तार से बताओ यह सब कैसे हुआ और तुमने मुझे बताने का जरूरत नहीं समझा?" लहजा सख्त और शिकायती था जो सिर्फ एक दोस्त का ही हो सकता है।

पुरोहित ने अपने हाथों से फिर से नम हो चुकी पलकों को पोछकर गुरुजी के कंधे पर हाथ रखकर कहा " तुमको सब बताता हूँ यार, तुमको नहीं बताउँगा तो किसको बताउँगा ! मेरे साथ जो भी हुआ वो मैंने किसी के साथ साझा नहीं किया है।"

गुरुजी ने कहा बता दे यार, तुम्हारा भी मन हल्का हो जाएगा और मेरे से जो भी होगा मैं तुम्हारी मदद करूँगा।

पुरोहित - तुम्हारे जाने के कुछ दिन बाद मेरी पत्नी की तबियत अचानक बहुत खराब हो गयी और उसको आई सी यू में डालना पड़ा । लेकिन वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। बेटा-बहु से मिलने की इच्छा भी पूरी नहीं हुई। जबतक वो थी मैं खुद को खुशनसीब समझता था।बेटे बहु अमेरिका में सेटल्ड हैं ।अपना भी रिटायरमेंट के बाद पेंशन का इतना मिल जाता है कि कोई कठिनाई नहीं थी। बेटा- बहु अमेरिका से आए और उसकी क्रियाकर्म तक ठहरे। इस बीच उनका व्यवहार बहुत ही अच्छा था। उनलोगों ने मुझे इस बात के लिए मना लिया कि मैं भी उनके साथ अमेरिका चलकर रहूँ। पासपोर्ट तो पहले से ही बना हुआ था बेटे ने वीसा भी निकलवा दिया। फिर फ्लैट को यह कहकर बेचवा दिया कि जब यहाँ रहना नहीं है तो यह फ्लैट किस काम का। मैं तो अपनी पत्नी के गम में अपनी सुधबुध में नहीं था। बेटा ने जो भी कहा मैं करता गया और उसने जहाँ कहा साइन करता गया।


अमेरिका जाने का दिन भी आ गया हमलोग एयरपोर्ट गए और वो दोनो अंदर चले गए यह बोलकर की कुछ मेरी वीसा में टेक्निकल इशू है उसको रेक्टिफाय कराना है। साथ में मेरा लगेज और और मोबाइल भी लेते गए। मैं बाहर बैठा उनका इंतजार करते रहा । दोपहर से जब शाम हो गई और भूख से मेरी हालत खराब होने लगी तो वहाँ खड़ा सी आई एस एफ के कांस्टेबल ने पूछा बाबा आप यहाँ बैठकर किसका इंतजार कर रहे हैं। मैंने उसको बताया कि मुझे अमेरिका का फ्लाइट पकड़ना है , बेटा के साथ अब वहीं रहूँगा।उसने पूछा आपके पास टिकट है। मैंने उसको टिकट का ज़ेरॉक्स दिखाया। कागज देखते ही उसने बताया यह फ्लाइट तो तीन घंटे पहले उड़ गई। रुकिए मैं चेक करता हूँ कि इसमे आपके बेटा ने बोर्ड किया है या नहीं। 

कांस्टेबल ने जब लौटकर बताया कि बाबा आपका बेटा तो अमेरिका चला गया आप अपने घर लौट जाओ। मेरे पास अब केवल पॉकेट डायरी था जिसमे मात्र पाँच सौ रुपया ,,आधार कार्ड और पेंशन एकाउंट का एटीएम कार्ड था। मोबाइल फोन नहीं होने के चलते मेरे पास कोई कांटेक्ट नंबर नहीं था जिसको मैं संपर्क कर सकूं। किसी तरह अपने बिल्डिंग में पहुँचा। मेरे फ्लैट पर नए मालिक का ताला लटक रहा था। मैं अपने पड़ोसी देसाई के घर गया।सारी बात सुनकर उसने मुझे खूब खरी खोटी सुनाया और कहा कि तुमने अपने हाथ से अपना हाथ काट लिया है।तुम्हारे पास अब मात्र वृद्धाश्रम का ही विकल्प बचा है। फिर अगले रोज मुझे यहाँ पर लाया तब से यहीं हूँ और अभी तक नहीं समझ पाया मुझसे गलती कहाँ हो गयी। लगता है यह मेरे पिछले जन्म के पाप का भुगतान है। आज मैं एक रोटी के लिए भारी हो गया।

गुरुजी ने संतावना देते हुए कहा - भाई देखो, मनुष्य को जीवन मे चार प्रकार की रोटी मिलती है और इंसान को उन सबका सम्मान करना चाहिए और आभारी होना चाहिए।

पुरोहित - मैं समझा नहीं ।


गुरुजी - मॉर्निंग वॉक से लौटते समय हनुमान जी के मंदिर में माथा टेककर मैं हमेशा कहता था की भगवान मेरे ऊपर इतनी कृपा करना कि मुझे तीसरी रोटी से वंचित नहीं होना पड़े।तुम हमेशा पूछते थे कि "क्या तुम्हारी बहु तुमको तीन ही रोटी खाने को देती है?"

मैं इस बात को टाल जाता था ।आज मैं तुमको उस प्रार्थना का मतलब बताता हूँ। पहली रोटी माँ के हाथ की होती है जिसमे ममता भरी होती है।खाने से पेट भर जाता है लेकिन मन नहीं भरता। दूसरी रोटी बीबी के हाथ का होता है जिसमे परस्पर प्रेम और समर्पण होता है उससे पेट भी भारता है और मन भी तृप्त होता है। तीसरी रोटी बहु के हाथ की होती है जिसमे कर्तव्य का भाव होता है।उसमे स्वाद भी होता है और पेट भी भरता है। और चौथी रोटी नौकरानी के हाथ का होता है।इसमे प्यार और अपनापन का अभाव होता है तथा स्वाद का भरोसा नहीं रहता है।

अतः हर किसी को माँ की पूजा और आदर करना चाहिए। बीबी को प्यार और इज्जत देनी चाहिए। बहु को बेटी समझो और उसको सम्मान दो।यदि नसीब से नौकरानी के हाथ की रोटी खाने की नौबत आ जाए तो स्वाद की अपेक्षा मत रखो केवल जीने भर खावो ताकि बुढापा आराम से कटे और उस हाथ का शुक्रगुजार रहो।

कभी-कभी बिना गलत हुए भी इंसान को अवांछित परिस्थिति का सामना करना पड़ता है।तुमने भी तो अपने गाँव से संपर्क काफी पहले तोड़ लिया था । यदि वह सेतु आज जीवंत होता तो तुमको यहाँ आश्रय नहीं लेना पड़ता । क्योंकि गांव में आज भी इंसानियत बहुत हद तक जिंदा है और शायद ही किसी को वृद्धाश्रम में जाना पड़ता है। अपनों के बीच की खींचतान और कड़वाहट का स्वाद भले नीम की तरह कड़वा लगे लेकिन कई तरह की बीमारी से दूर रखता है।

गुरुजी ने अपना फोन उनको दे दिया और उसमे से अपना आधार कार्ड लिंक्ड सिम निकाल लिया।दूसरा सिम उसी में था लेकिन उस फोन में उनके सभी कॉमन फ्रेंड का नंबर सेव था।तुम अब यहाँ पर ही खुश रहना सीखो। मैं और अपने भजन मंडली के मित्र गण समय समय पर मिलने आते रहेंगे। तुम यहाँ के लोगों को ही अपने परिवार की तरह अपना लो आगे की यात्र आसान रहेगी। जो बीत गयी वो बात गयी उनको छोड़कर आगे की यात्रा आनंदमय बनाने का प्रयास करो। तुमको इतना पेंसन तो मिलता ही है कि तुमको किसी प्रकार की तंगी अकेली जान को तो नहीं होने वाली।

पुरोहित जी ने मुस्कुराकर कहा तुम्हारी बातों से मुझे बहुत राहत मिली । मैं भी ईश्वर से प्रार्थना करूँगा की तुम्हारी तीसरी रोटी आजीवन बनी रहे।


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