Sharad Kumar

Inspirational


4.9  

Sharad Kumar

Inspirational


तेरहवीं

तेरहवीं

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अर्थी उठते ही नरेंदर की आँखें नम हो गयीं। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था की उसके पिता (रामजतन ) अब नहीं रहे, खैर ये आशंका तो उसे ३-४ दिन पहले से ही हो गयी थी, जब रामजतन अचानक से गिर पड़े थे। वैद्य का कहना था की "हवा लग गयी है", रोज़ की तरह ही वो भोर में नहर के पास जा रहे थे, उस दिन उनकी तबियत भी थोड़ी नाजुक थी। यही कोई ७५ वां बरसात चल रहा होगा। ढलती उम्र और मौसम के प्रति संवेदनशीलता में बड़ा सम्बन्ध होता है। हालांकि वो एक किसान थे लेकिन शरीर की गर्मी, हवा की ठंडक को सहन नहीं कर पायी। वो अचानक से गिर पड़े। गाँव वालों ने उन्हें उठाकर उनके घर ले आये। तब से ही उनकी तबियत और भी बिगड़ती गयी। ‘पिता’ शब्द शायद छाँव का ही पर्यायवाची होगा, क्योंकि इस शब्द को धारण करने वाला जब चौखट छोड़ देता है, तो ऐसा लगता है जैसे एक बहुत पुराना पेड़, जो धूप व बरसात में एक छाँव, एक आसरा था, सूख गया हो। शरीर चाहे जिन्दा हो या मुर्दा, जब तक ये चौखट के पास रहता है, एक आस बंधी होती है, एक आसरा लगा होता है लेकिन जैसे ही अर्थी उठती है, अचानक से उनके ख़ास चाहने वालों के शरीर में एक डर दौड़ जाता है। एक कपकपी सी होने लगती है, हाथ काँपने लगते हैं, भीड़ मृत इंसान को अकेला समझती है जबकि जीवित इंसान अपने-आप को उस भीड़ में अकेला पाता है। वो एक छोटे बच्चे की तरह चिल्लाने लगता है, शायद उसके रोने को सुन कर, जाने वाला वापस लौट आये लेकिन हमेशा शमशान से एक इंसान कम ही लौटता है। ये डर जो वर्तमान में पैदा हुआ है ये असल में अतीत से जुड़ी हुई उन तमाम खूबसूरत यादों का परिणाम है, जिनमे वो गुजरा हुआ इंसान हमारे साथ था, लेकिन भविष्य में अब उसकी कमी रहेगी। ये डर हर उस इंसान के साथ चलता है जो सुख व दुःख और मोह-माया की सीमा में बंधा हुआ है। नरेंदर भी उनमें से एक था। पिता के ढके हुए चेहरे की तरफ देखा। जब भी रामजतन सोते थे, चेहरा उनका खुला ही रहता था, उन्हें ढक कर सोने की आदत नहीं थी, फिर आज इतना सुकून से कैसे सो सकते हैं ? उधर कोई भी हरकत नहीं दिखी। मृत्यु की शैय्या पर लेटा हुआ इंसान कितना असहाय सा दिखता है, वो भले ही शत्रु क्यों न हो, उस पर दया आ ही जाती है, ये तो फिर भी ‘पिता’ है। वैसे तो प्राणी इस अनंत ब्रह्माण्ड के सामने नगण्य है, लेकिन हर उस एक प्राणी के जीवन के अनुभवों को देखा जाय तो उसमे भी असीमित क्षोभ-विक्षोभ दिखाई देंगे, यही क्षोभ-विक्षोभ इस ब्रह्माण्ड में मिलकर, इसका पुनः प्रसार करते हैं, अर्थात नगण्य प्राणी द्वारा किया हुआ कोई भी कर्म, ब्रह्माण्ड के भविष्य पर प्रभाव डालता है ।

रामजतन के अनुभव भी कहीं न कहीं आने वाले भविष्य पर प्रभाव डालेंगे। फिलहाल तो अभी समाज उन्हें कितना तौलेगा, वो देखना है। उनके मृत शरीर को नहला कर, सफ़ेद वस्त्र में लपेटा गया व देह को दक्षिणोत्तर कर के दोनों पैर के अंगूठों को रस्सी से आपस में बाँध दिया गया था। ‘राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत है …’ की ध्वनि के साथ लोग शमशान की ओर बढ़ चले। शव की ज़िंदगी घर से घाट तक ही होती है। शमशान एक ऐसी मंज़िल है जिसे हम न चाहते हुए भी पल-पल उसी की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं। शमशान एक द्वार भी है जहाँ शरीर को पंच-तत्वों में विलीन कर आत्मा को स्वतंत्र चरने के लिए छोड़ दिया जाता है। नरेंदर ने स्नान किया, चिता की परिक्रमा कर, पिता के मुँह में तिल रखा। गाय के घी का छिड़काव कर उसने, तीन रेखाएं खींची। मिट्टी के घड़े में जल भरकर फिर से चिता की परिक्रमा की और घड़े को पिता के सिर के पास गिरा कर फोड़ दिया, चिता को अग्नि दी। एक बांस की सहायता से शव के कपाल में छेद कर उसने इस अनुष्ठान का समापन किया। ऐसा करते हुए उसके हाथ कांप रहे थे। लोगों के लिए ये एक शव भले ही हो, लेकिन नरेंदर के लिए अभी भी उसके पिता ही थे, वो कैसे बांस से पिता के सिर में चोट कर सकता था, इसीलिए वो कांप रहा था, लेकिन पंडित व अन्य लोगों के बार-बार बल देने पर उसने ये अनुष्ठान भी किया। पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद सारे कर्म-काण्ड से विमुक्त होकर नरेंदर घर की ओर लौट चला। गाँव के बड़े -बुजुर्ग भी साथ में थे। भीड़ में रामजतन की ही बातें हो रही थीं, लोग उनके बारे में भला- भला बोल रहे थे, फिर तेरहवीं की बातें भी होने लगी। नरेंदर का मन पिता के यादों से अशांत था, उसे डर था की वो घर लौटेगा और पिता वहां नहीं होंगे क्योंकि अभी अपने ही हाथों से उन्हें जला आया है। घर के लोगों का सामना कैसे करेगा ? अंकुर तो अपने दादा के आगे हम सब को भूल जाता था। वो पूछेगा की दादा कहाँ गए तो क्या जवाब दूँगा ? बाबा अब लौट के नहीं आएंगे, ये सत्य तो अब मुझे भी मान लेना होगा। नरेंदर फिर घर लौट आया, आस-पड़ोस के लोग भी अपने-अपने घर को लौट गए। कुछ रिश्तेदार अभी भी घर पे रुके थे। पड़ोस के घर से खाना आ गया। रात हो चुकी है, आज घर में थोड़ी शान्ति लग रही है। लालटेन की जगह दीपक जल रहा है वो भी एक बाती वाला। लौ भी थकी हुई सी है, मेढक बोल रहे हैं, शायद बारिश आने वाली होगी । “बाबा धान की फसल में कल पानी भरना है”- ऐसा कहते हुए नरेंदर अचानक से उठकर बगल वाली खटिया की तरफ देखने लगा, लेकिन वहां बाबा नहीं थे, झुर्री मौसा लेटे हुए थे। अब उसे सच में एहसास हुआ की बाबा नहीं रहे। लोगों की भीड़ में सच्चाई का पता नहीं लगता, लेकिन जब इंसान एकांत में होता है, तो उसके सवाल ही उसको जवाब दे देते हैं। आज पहली बार उसने किसी का दाह-संस्कार किया। शमशान में तो उसने सारी विधि जल्दी-जल्दी निपटा दी लेकिन अब फिर से एक-एक करके उन सभी क्रियाओं के बारे में वो सोच रहा है, जैसे वो सारी क्रियाएं उसके सामने फिर से दोहराई जा रहीं हो। उसे याद है, जब वो बहुत बीमार पड़ा था, बाबा ने अपने हाथों से उसके मुँह में दवा रखा था, आज उसने बाबा के मुँह में तिल रख कर वो उधार चुकता कर दिया। वो कैसे भूल सकता है की, बचपन में वो बाबा के चारो ओर गोल-गोल घूमता था, आज आखिरी बार फिर से बाबा के चारो ओर परिक्रमा कर उसने वो सिलसिला भी ख़तम कर दिया । उसे याद है, बाबा उसको गिनती सिखाने के लिए मिट्टी में रेखाएं खींचते थे, आज उसने तीन रेखाएं खींच कर बाबा को ये बता दिया की, उसने गिनती सीख ली है। उसे ये भी याद है, जब वो मट्ठे की मटकी उठा कर ला रहा था और मटकी हाथ से छूट कर फूट गयी थी, तब बाबा ने हँसते हुए कहा था- "हो गया सब स्वाहा" , आज भी एक मटकी फूटी थी, एकदम उनके सिर के पास लेकिन बाबा ने कुछ नहीं कहा, बाबा क्यों नहीं उठे ? काश ! बाबा उठ कर फिर से बोलते- "हो गया सब स्वाहा ", ऐसा सोचते हुए नरेंदर की आँखों से आँसू टपक पड़े, उसने करवट बदल कर आँसुओं को मिट्टी में गिर जाने का रास्ता दिया। ये आँसू बड़े ही शांत थे, लेकिन उतने ही गरम भी थे, शायद उनमें दिमाग की तमाम चल रही उथल-पुथल, मोह, लगाव, प्रेम, पितृभक्ति, जिम्मेदारी, आशीर्वाद, धूप-छावं आदि अदृश्य भावनाओं का समन्वय था। खैर, मिट्टी सब कुछ सोख लेती है, एक पूरा का पूरा इंसान भी, तो ये आँसू क्या चीज हैं। एक इंसान के जीवन में रात या अंधकार का होना बहुत जरूरी है, यही एक ऐसी अवस्था है जब इंसान खुद को अपनी आत्मा के साथ अकेला पाता है, ये अंधकार ही तय करता है की आप कितने सक्षम हो, यही आपको आपकी जिम्मेदारियों, आपकी क्षमता व समाज की सामाजिकता का बोध कराता है। फिर उगता हुआ सूरज या उजाला आपको उन्ही गुणों को अपनी जिंदगी में लागू करने का मौका देती है । उसे नींद नहीं आयी, वो रात भर करवटें बदलता रहा और मिट्टी, आँसू सोखती रही।

नया दिन है, एक नई सुबह, बस एक पुराना आदमी साथ नहीं है किन्तु उसकी यादें अभी भी नयी ही है, अब इन यादों की छांव मात्र ही रहेगी। अगली सुबह सब-कुछ पहले जैसा ही लग रहा था, लोग फरसा, लाठी उठाये अपने खेतों की तरफ चल दिए, लेकिन हाँ एक बार अनायास ही नरेंदर या उसके घर की तरफ ज़रूर देखते। उसका गाँव काफी बड़ा है, मगर पिछड़ा है जो समय की दौड़ में कदम से कदम न मिला सका और उन्नति में पीछे रह गया। हाला की कुछ जमींदार लोग संपन्न भी हैं लेकिन यह सम्पन्नता केवल उनके खुद के लिए ही है, गाँव के विकास में उन्होंने कोई योगदान नहीं दिया। समय बदला, सोच बदली, तो कुछ लोगों को एहसास हुआ की गाँव का विकास जरूरी है। सही फैसले लेने के लिए पंच बना दिए गए, स्कूल खोल दिए गए । फिर भी अभी और विकास होना बाकी है, क्योंकि गाँव में जगह-जगह भिन्नताएं व्याप्त हैं, पंद्रह-बीस मकान ही ऐसे होंगे, जो की पक्के ईंटों के बने होंगे, इसके अलावा सभी मकान मिट्टी, खपड़े, सरपत व पेड़ों की लकड़ियों के हैं। गाँव उन्नत तभी कहा जा सकता है जब उसके हर-एक घर सुखी व संपन्न हों। लोग सुखी तो थे लेकिन संपन्न नहीं थे। सुखी इसलिए थे क्योंकि संतुष्ट थे, और संतुष्ट इसलिए थे क्योंकि कुछ भी नया होने की कोई उम्मीद नहीं थी, रोज़ की दिनचर्या निर्धारित थी। उनकी संतुष्टि में भी भिन्नताएं थीं और इसी के चलते कहीं-कहीं ईर्ष्या, द्वेष व जलन जैसे नकारात्मक गुण भी देखने को मिल जाते थे । सबका अपना-अपना काम निर्धारित था, ज्यादातर लोग किसान ही थे, खेतों पर निर्भर थे । नरेंदर का घर भी मिट्टी और खपड़े का बना हुआ है। वह किसी जमींदार के खेत पर काम करता है, हालाँकि उसके पास तीन-चार बिस्सा अपना खेत भी है। दोनों ही खेतों को वो सामान रूप से देखभाल करता है। वैसे तो श्राद्ध अनुष्ठान के कारण अगले १० दिन तक नरेंदर व उसके घर वालों को एकदम अलग सा रहना चाहिए, लेकिन मानव का धर्म ही ‘कर्म प्रधान’ है, इसलिए उसे अपने कर्म के लिए घर से निकलना होगा । किसी के गुजर जाने से जीवन और समय की धारा कभी नहीं रूकती, क्योंकि दोनों को ही निरंतर बहते रहने का वरदान मिला हुआ है। श्राद्ध अनुष्ठान करने के बाद वह खेतों में भी घूम आया करता, जिससे खेतों की देख-रेख हो जाती थी। आज उसका मन खेत में जाने का नहीं कर रहा था। फिर सोचा चलो चल के घूम आये, मन भी थोड़ा हल्का हो जाएगा। घूमते -घूमते एक पंडित मिल गए। हाल-चाल लेते हुए उन्होंने रामजतन की तेरही की बात छेड़ दी। कम ही दिन बचे हैं , सारी व्यवस्था करने के लिए। नरेंदर के दिमाग में एक और चिंता घर कर गयी की सारा इंतज़ाम कैसे होगा ? अगर बीस-तीस लोगों को निमंत्रण दिया तो बाकी बुरा मान जाएंगे, व्यवहार तो सभी के यहाँ है, लेकिन अगर सभी घर से एक आदमी आएगा तो भी सत्तर-अस्सी आदमी, लेकिन ऐसा होता कहाँ हैं, तेरही खाने तो सभी आते हैं, इसका मतलब कुल मिला-जुला के ढाई-तीन सौ लोग। इतने लोगों को बुलाने का मतलब है, तीन-चार हजार का ख़र्चा। इतना पैसा एक साथ कहाँ से आएगा ? घर में यही कोई सौ-पचास रूपए पड़े होंगे। सनेही से तीस रूपए, हेला से बीस, खूंटिया से चालीस, दो हफ्ते पहले मंगरु २५ रूपए बाबा से उधार ले गया था , झुर्री मौसा को दो सौ उधार दिया था, उनसे वापस मांग लूंगा। मामा की भी स्थति ठीक नहीं है, नहीं तो एकाक हजार का वहां से बंदोबस्त हो जाता। पिछले बार का गेहूँ रखा है, उसे बेच के तीन-चार सौ का इंतज़ाम कर लूंगा, चलो अगर गेहूं नहीं बेचा तो तेरही की पूड़ी बनाने में खप जाएगा । फिर भी तीन- साढ़े तीन हजार की कमी पड़ रही है । कुछ पड़ोसी हैं जो उधार भी दे सकते हैं, मगर कितना ? अधिक से अधिक सौ रूपए लेकिन उधार लेना नहीं है । बाकी का क्या ? मन हल्का होने के बजाय और भारी हो गया । दोपहर हो चला था, खेत को देखते हुए वह वापस घर लौट आया। पैसों के इंतज़ाम के लिए अगले ही दिन मौसी के यहाँ चला गया लेकिन वहां भी कुछ बात नहीं बन पाई, फिर मामा और फूफा के यहाँ। शाम तक वापस लौटते हुए उसे आश्वासन मिल गया था की एक हजार तक का इंतज़ाम हो जाएगा । घर पर अंकुर और राधा बिटिया उसका इंतजार कर रहे थे। राधा की उम्र यही कोई तेरह -चौदह साल होगी, अक्सर अपने दादा के साथ खेत के कामो में हाथ बंटाया करती थी। नरेंदर के लिए सूरज जैसे जल्दी डूबने लगा था। लेकिन उसे अगली सुबह का इंतज़ार नहीं होता, क्योंकि सुबह होने का मतलब है, तेरही की घड़ी में एक दिन कम हो जाना। मन करता था की रात जल्दी न बीते। चिंताओं ने रात की नींद भी हड़प ली थी। एक बार तो ये भी सोचता था की तेरही अगर न करे तो ? कल पंडित जी से बात करेंगे, शायद वो ही कोई हल निकालें ? नरेंदर के गाँव से २ मील दूर से एक नहर जाती है । बरसात के अलावा, सिंचाई का यही एकमात्र श्रोत है। खेतों के पास में ही एक तालाब बना हुआ है, जब नहर में पानी होता है तो एक छोटे रास्ते से तालाब भी भर दिया जाता व खेतों की सिचाई के लिए पानी इकट्ठा कर लिया जाता, यही तालाब बरसात के दिनों में खेतों से अतिरिक्त पानी निकालने के भी काम आता है। रामजतन और नरेंदर मिलकर ये कार्यभार संभालते। अब वो अकेला पड़ गया था। अगले दिन नहर के पानी से खेतों की भराई करने के बाद, पंडित से मिलने गया । वहां पंडित जी ने जाने कौन-कौन से उपदेश दे डाले, कुछ मनुस्मृत, गरुणपुराण जैसी महान पुस्तकों का जिक्र भी किया, और अंत में नरेंदर को ये भी बताया की अगर वो तेरहवी नहीं करेगा तो रामजतन की आत्मा की मुक्ति नहीं हो पाएगी। तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है। और कोई रास्ता नहीं है। फिर उसने निर्णय लिया की केवल तेरह ब्राह्मणों को खाना खिला कर, पिता की तेरहवीं करेगा, क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति केवल इतना ही खर्चा उठा सकती थी ।

अब नरेंदर को मृत्युपरांत होने वाले अनुष्ठान जैसे अस्थिविसर्जन, अस्थिसंचय, पिंडदान, पंचगव्य होम, एकोद्दिष्ट श्राद्ध, वसुगण श्राद्ध तथा रुद्रगण श्राद्ध, सपिंडीकरण श्राद्ध भी करने होंगे ।

लेकिन गाँव के लोग तो तेरही का इंतज़ार कर रहे थे, वो जहाँ भी जाता, खेत हो या नहर, मंदिर का चबूतरा हो या स्कूल का मैदान, कुएं का पत्थर हो या पीपल की छाँव, कोई न कोई मिल ही जाता । हाल-चाल लेने के बहाने, तेरहवीं की पूड़ी-कचौड़ी तक पहुँच ही जाते थे । नरेंदर भी क्या करता, हाँ में हाँ मिला कर रह जाता । एक बार तो उसने सोचा की दूसरे गाँव के एक अन्य पंडित हैं, उनसे भी चलकर सलाह लेनी चाहिए की क्या तेरह ब्राह्मणो को खाना खिलाने के बाद तेरहवीं पूरी हो जायेगी ? उनसे बात की तो उन्होंने बताया की तेरह पंडितों को खाना खिलाने के साथ ही साथ गाय भी दान करनी होगी, इससे उसके पिता को स्वर्ग की प्राप्ति होगी । यहाँ तो खर्चा और भी बढ़ गया । रात में बादल घिर रहे थे, लेकिन हवाओं की वजह से सुबह होते -होते बादल भी छट लिए । अगले दिन कचौड़ी चाचा खेत में मिल गए । असल में उनका नाम भगत है, लेकिन गाँव के लोग उन्हें ‘कचौड़ी-चाचा’ ही बुलाते हैं, क्योंकि इन्हे कचौड़ी बहुत पसंद है, जब भी भंडारे में जाते हैं तो, कचौड़ी खाते भी हैं व ६ कचौड़ी झोले में भर भी लाते हैं । नरेंदर की आर्थिक स्थिति से वो भी अपरिचित नहीं थे, इसलिए सुझाव देने लगे की ज्यादा लोगों को निमंत्रण न दे केवल सौ लोग काफी हैं, जैसे पिछले साल सरजू ने दिया था । उनके जाने के बाद नरेंदर सोचने लगा कहाँ तेरह कहाँ सौ ? यहाँ तो वो गाँव वालों को बुलाने ही नहीं वाला है, लेकिन हर कोई यही सोच के बैठा है तेरही होगी । उसे धीरे-धीरे ये बात लोगों के कान में डालनी होगी की वो केवल तेरह ब्राह्मणों को ही खिला पायेगा। हर गाँव में कम से कम एक खबरी ज़रूर होता है, जिसे पूरे गाँव की खबर रहती है जैसे, किसके यहाँ कौन रिश्तेदार आया है, किसके घर में कलह चल रहा है, कौन-कौन अपनी जोरू का गुलाम है, किसके घर में रोज पकवान बनता है, शहर में किसकी नौकरी लगी है, किसकी बहु, सास की बात नहीं मानती, किन दो भाइयों में बंटवारा हो सकता है, आदि। इस गाँव में भी दो हैं लल्लू व धनिया । नरेंदर ने लल्लू से मिलकर चुपके से उसके कान में ये बात डाल दी । फिर क्या था, एक शाम में पूरे गाँव को मालूम चल गया । अगले दिन दोपहर में उसके मौसा छह-सात सौ का बंदोबस्त कर लाये, तो उन्हें मालूम चला की नरेंदर छोटी सी तेरही करने वाला है जिसमे वो केवल तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराएगा। उन्होंने उसको समझाया, की तेरही बार-बार कहाँ होती है, रामजतन जैसे लोगों की तेरही धूम-धाम से होनी चाहिए, फूफा के पास से कुछ पैसे का बंदोबस्त हो जाएगा, थोड़ा उधार जमींदार से ले लेना, लेकिन तेरही ज़रूर करना, नहीं तो लोग क्या कहेंगे । गाँव के बड़े बुजुर्ग भी उसे समझाने लगे की पुत्र के किये हुए कर्म ही पिता को मुक्ति देते हैं इसलिए वो ऐसा कोई काम न करे की ऊपर उसके पिता को शर्मिंदगी हो । रामजतन कहा करते थे की कभी भी किसी से उधार मत लेना नहीं तो हमेशा सामनेवाले की नजरों से दबते चले जाओगे । यही वजह थी की उनपर एक पैसे का कर्जा नहीं था । इसलिए वो नहीं चाहता था की किसी से उधार लेकर वो तेरही करे। उधर गाँव के लड़के मज़ाक भी बनाने लगे की एक साल के बाद तो उन लोगों ने सोचा की पूड़ी और बुनिया खाने को मिलेगा, वो भी हाथ से गया। गाँव के पंडित अलग ही राग आलाप रहे थे, वो उसे समझा रहे थे की ग्रहण लगने वाला है, तेरही के बाद कुछ दान-पुण्य भी करना होगा, जैसे तिल का लड्डू, घी से भरे पात्र में एक छोटा चांदी का टुकड़ा डालकर, आदि । कोई क्यों नहीं उसकी स्थिति समझता ? डर व चिंता से उसका मन जला जा रहा था, और उधर मुक्के में रखी दीपक भी। रात के झींगुर पंचायत करने लगे थे, दूर सियार की आवाज नींद में विघ्न डालती व कुत्तों की कहासुनी से नींद करवट ले लेती। बगल में देखा बाबा नहीं थे, उनकी खटिया एक किनारे खड़ी हुई है। खटिये की टूटी हुई सुतलियाँ हवा से हिल रहीं है। दक्खिन की हवा बह रही थी, मेढक सुर में सुर मिला रहे थे, हलके बादल भी चढ़ रहे हैं, बारिश हो सकती है…।

अगले दिन दोपहर में वो जमींदार के बेटे 'उदय प्रताप' के पास गया, उदय शहर की पढाई कर के लौटा था, फिर भी उसके मन में घमंड नहीं दिखता था, उसके विचार भी आम जमींदारों जैसे नहीं थे, वो इंसानियत में विश्वास करता था, शायद इसीलिए कभी-कभी गाँव के लोग उससे मिलने भी जाया करते थे । उदय से उसने सारा हाल कह दिया। “पांच-छह सौ की मदद तो मैं ही कर सकता हूँ, इससे ज्यादा मेरे पास नहीं हैं, पिताजी से बात करनी होगी” -उदय ने सहानभूति व यकीन दिलाते हुए कहा । लेकिन नरेंदर को उधार नहीं चाहिए था। उदय ने सोचने का वक़्त माँगा। रात को बाहर खटिये पर उदय और नरेंदर बैठ कर मसले पर चिंतन करने लगे । उदय ने सुझाव दिया की वो तेरही न करे, केवल दान-पुण्य कर ले। पांच-छः सौ का खर्चा आएगा । नरेंदर ने गाँव वालों का हाल बताया, लोगों के ताने, तेरही से उन लोगों की उम्मीदें, पंडित की चेतवानी और अपना डर उदय ने फिर समझाया- “ये लोग चार दिन बात करेंगे फिर भूल जायेंगे, लेकिन उसके लिए तुम्हें कितनी परेशानी झेलनी पड़ रही है। जो लोग उधार लेते हैं, उनको किस-किस के आगे हाथ फैलाना पड़ता है, इसलिए केवल दान-पुण्य करके छोड़ दो, तुम्हारे बाबा भी यही चाहते होंगे। तुम्हें दुःख में देख कर उनको भी मुक्ति नहीं चाहिए होगी, भला अपने पुत्र को कष्ट देकर, कोई भी पिता अपने रास्ते कैसे आसान कर सकेगा, नहीं नहीं, तुम इतने परेशान न हो।" फिर भी नरेंदर सहमत नहीं हुआ। नरेंदर ने कहा- “अगर ये कदम आप लोग उठाओगे तो लोग नहीं बोलेंगे, लेकिन अगर मैंने ऐसा किया तो लोग ताने मार-मार कर जीना दूभर कर देंगे।" अंत में उसने कोई और रास्ता निकालने का आश्वासन दिया। रात में खटिये पे लेटे हुए नरेंदर ने तेरही का हिसाब लगाया, अगर एक आदमी छह कचौड़ी खाये तो तीन सौ गुणे छह मतलब अट्ठारह सौ कचौड़ी , लोग घर भी ले जाएंगे सो तीन-चार सौ और मान लो, फिर कद्दू की सब्जी सौ-डेढ़ सौ किलो, बुनिया से कम तो लोग मानेगें नहीं, सो वो भी रख लो अस्सी-नब्बे रख लो ऐसा सोचते हुए आँख लग गयी। लेकिन शुद्ध नींद नहीं आयी, उसमे भी यही सब गणनाओं का मिश्रण था। जब नींद आयी तब दूर कहीं मुर्गे ने समय की गणना का एहसास दिलाया । उधर अगले दिन उदय के मन में एक विचार आया की अगर सारे गाँव वाले रामजतन की तेरही के लिए मिलकर पैसा इकट्ठा करें तो नरेंदर की मुश्किलें हल हो जाएंगी। वैसे भी वो गाँव वालों के भले के लिए ही नहर व तालाब की देख-रेख करते थे, अब हम सबका ये दायित्व बनता है की उनकी आत्मा की शान्ति के लिए ये कदम उठाएं । उसने अपने पिता ‘सूर्यनारायण’ (जमींदार) के सामने ये विचार रखा। जमींदार साहब भी उन्ही पांच पंचों में से एक पंच थे। उन्हें भी ठीक लगा सो पंचायत के सामने ये प्रस्ताव रखने का मन बनाया। सयोंग से आज मंगलवार यानी पंचायत का दिन भी है । पंचायत में काफी समस्याओं का हल निकाला जाता था, कभी-कभी हल नहीं तो रास्ते तो ज़रूर ही निकाले जाते थे इस बार भी कुछ समस्याएं सामने थीं जैसे, बारिश न होना, नहर से पानी काटकर तालाब भरने की जिम्मेदारी, कुएँ पर लगी काई को हटाने की जिम्मेदारी, बदरीनाथ व सोमनाथ के खेत का बंटवारा, स्कूल के नलकूप की मरम्मत आदि । इन सब समस्याओं के हल होने के बाद उदय प्रताप ने नरेंदर की समस्या रखी । पंचों को ये प्रस्ताव ठीक लगा, आखिर रामजतन जैसे नेक व मेहनती आदमी के लिए इस समाज का भी कुछ उत्तरदायित्व तो बनता ही है । पंचों ने गाँव वालों की राय जाननी चाही। कुछ लोग नरेंदर के पक्ष में थे, तो कुछ लोग सहमत नहीं थे। पंचों ने सब को सुना, जो लोग पक्ष में थे उन्हें व जो लोग सहमति में नहीं थे, उन्हें भी, क्योंकि पंचों को तो सारे गाँव को साथ लेकर चलना था और अंत में एक रास्ता निकाला । रास्ता ये था की सभी घरों से कुछ न कुछ पैसा इकट्ठा किया जाएगा, जो जिससे बन पड़ता है, दे सकते हैं, कोई अगर अन्न देना चाहे तो वो भी दे सकता है और इसके बदले में नरेंदर धान की फसल पकने के बाद उन सभी घरों की फसल-कटाई में मदद कर सकता है, जो जितने पैसे या अन्न का योगदान देगा, उसी अनुपात में नरेंदर उसकी मदद करेगा। लोगों ने सोचा की धान की फसल बड़ी मेहनत मांगती है, लगाई, कटाई और फिर कुटाई। वैसे भी एक-दो आदमी तो काम पर लगाने ही पड़ते हैं, जो तीस रूपया प्रति दिन के हिसाब से लेते ही हैं, चलो वो पैसा यहाँ ही लगा देते हैं, अब नरेंदर से ही काम निकलवा लेंगे, अगर साठ रूपया लगाया तो दो दिन का इंतज़ाम हो जाएगा। अब जाकर लोग सहमत हुए और नरेंदर को भी कोई ऐतराज नहीं था। लोगों को गुरुवार तक का समय दिया गया। पंचों ने कहा ऐसा पहली बार हुआ है, जब सारा गाँव ही किसी की तेरही मनाएगा। नरेंदर का जैसे बोझ हल्का हो गया हो, अब उसे उधार की भी जरूरत नहीं थी । रात पहले जितनी ही लम्बी होने लगी, आज बादल नहीं थे, तारे टिमटिमा रहे थे। नरेंदर के साथ अंकुर भी दूसरे खटिये पे लेटा हुआ था, वो अक्सर पूछता की दादा कहाँ गए? आज नरेंदर ने उसे बताया की वो देखो दूर जो तारा चमक रहा है, वहां हैं उसके दादा। झींगुरों की आवाज़ के साथ आज एक भैंस भी चिल्ला रही है, शायद बच्चा देने वाली है । मेंढक भी शांत थे जैसे बारिश के इंतजार में थक चुके हों। सियार नहीं बोल रहे हैं, अन्धकार एक अलग सी चुप्पी बांधे हुए है, बगल वाले घर में दीया, हवाओं से संघर्ष कर रहा है। पेड़ों की डालियाँ चुरचुरा रहीं हैं। आर्द्र नक्षत्र लगे हुए १० दिन बीत गए, लेकिन बारिश ने अपना रूप नहीं दिखाया।

गुरुवार तक ११ किलो चावल, २० किलो गेहूं व डेढ़-दो हज़ार रूपए इकट्ठा हो गए। जिसने जो भी दिया, पंचों को लिखवा दिया। बाकी का बंदोबस्त नरेंदर ने अपने रिश्तेदारों के द्वारा कर लिया । तेरही का कार्यक्रम आगे बढ़ा, नरेंदर के साथ-साथ कुछ लोग भी प्रबंध करने में जुट गए। हलवाई खोजे गए, बर्तन, पतीले का इंतज़ाम किया गया, कद्दू काटे गए, बुनिया छाना गया, आटे की लोई बनाई गयी, तेल की कढ़ाई चढ़ गयी । तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद, गाँव के लोग भी जुट गए। कुछ लोग खा भी रहे थे और घर के लिए भी बाँध रहे थे, उनका ये सोचना था की उनका भी पैसा लगा है सो वो स्वतंत्र हैं, उधर कचौड़ी चाचा की आवाज़ आयी- “६ कचौड़ी अलग से बाँध दो।“ सब लोगों के खाने के बाद ही नरेंदर और उसके परिवार ने खाना खाया, क्योंकि उन्हें डर था कहीं खाना कम न पड़ जाए। शाम ५ बजे तक तेरही समाप्त हुई, नरेंदर और बेटी राधा पत्तल व पुरवा को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे, जूठे पत्तल और छोड़ी गयी सब्जी-कचौड़ी को गाय-भैंस खा लेगी व पुरवा गल कर मिट्टीमें मिल जाएगा । बची हुई बुनिया और सब्जी को थोड़ा बचाकर, बाकी घरों में बाँट दिया गया। फिर सारा परिवार बाहर बैठ के आपस में बातें करने लगे। भगवान की कृपा से सब कुछ अच्छे से निपट गया, आज सुकून की नींद आएगी। आज बाबा बहुत याद आ रहे हैं, ये उनके ही कर्म थे जो गाँव वालों ने मदद की, अन्यथा लोग तो खुद की उँगलियों में फर्क कर लेते हैं, हम तो फिर भी एक हाथ दूर के पड़ोसी हैं । गाँव के बहुत से लोग बैर रखते हैं, देखा था कैसा पंचायत में विरोध कर रहे थे, लेकिन जाने कौन सा योग बना, की सब लोग साथ हो गए । जब फसल का काम आएगा, हम लोग सबका हाथ बटाएंगे। बातें करते-करते काफी समय बीत गया। सब सोने चले गए, नरेंदर वहीं खटिया पर सोने की कोशिश करने लगा, ऊपर देखा तो काले-काले बादल उमड़ रहे थे, रात कुछ ज्यादा ही काली लग रही थी, मेढक फिर से बातें करने लगे थे, हवायीं धीमी बह रहीं थी, कुछ खुड़ ख़ुड़ाने की आवाज़ आ रहीं थी, उठ के देखा तो गाँव के कुत्ते पतली में से जूठन खोज रहे थे, वैसे तो जग्गा, मोती, करिया, मल्लू आदि कुत्तों को उनका हिस्सा पहले ही मिल चुका था, लेकिन शायद झींगुरों की झी-झी से उन्हें नींद नहीं आ रहीं थी। नरेंदर फिर से लेट गया की तभी एक बूँद माथे पे गिरी, फिर दो बूँद हाथों पर, फिर चार-पांच बूंदें पैरों पर…इस नखत की पहली बारिश ने बादलों से बाहर झाँका, नरेंदर उठा और खटिया घर के अंदर करते हुए, बारिश को देखने लगा, उसकी पत्नी भी उठ गयी । ऐसे कितने ही लोग उठे होंगे, आखिर इन्ही ठंडी बूंदों का ही तो इंतजार था । बाबा की खटिया भी खड़ी थी, ऐसा लगा बाबा भी बारिश को देख रहे हों, झमा-झम बारिश ने पेड़ों-पत्तीयों, जानवरों और गावंवालों की सूखी तृष्णा को तर कर दिया, शायद बादलों को भी इसी तेरही का इंतज़ार रहा होगा क्योंकि आज आर्द्र नखत का भी तेरहवां दिन था, नरेंदर को ऐसा आभास हुआ जैसे बाबा को मुक्ति मिल गयी हो। व्यर्थ ही उदयप्रताप बोलता था की तेरही मत करो, गाँव वाले क्या बोलते ? कहाँ-कहाँ मज़ाक उड़ता ? पंडितजी क्या कहते ? सारे रिश्तेदार क्या सोचते…? अंदर का मन इन्ही सवालों-जवाबों से घिरा हुआ था और बाहर की मिटटी, बारिश के थपेड़ों से।

अगले दिन कुछ लोगों के जुबान पे था की ये बारिश रामजतन की तेरही की वजह से ही हुई है, खैर गाँव वालों का क्या है, कुछ भी मान लेते हैं, वे तो 'गूलर के फूल' में भूत तक देख लेते हैं । नखत (नक्षत्र) ने अपने पैर आगे बढ़ाए, आर्द्र, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, आदि को पार कर चैत्र तक पहुँच गया । कभी-कभी हमारे द्वारा की गयी परिकल्पना सटीक नहीं बैठती, जिसे हम अनहोनी का नाम दे देते हैं व उस घटना को दुर्भाग्य से जोड़ देते हैं। इस बार की बारिश से ये दोनों शब्द 'अनहोनी' व 'दुर्भाग्य' फिर से परिभाषित हुए। उम्मीद से ज्यादा बारिश हुई, धान की खेती के लिए जितने की जरूरत थी उससे तीन गुना ज्यादा, पानी कई-कई दिनों तक खेतों में जमा रहा। नहर और तालाब भी भर गए थे, सो पानी निकलने का कोई रास्ता नहीं बन सका, ज्यादातर लोगों की फसलें खराब हो गयीं । लोगों ने इसे इंद्रदेव का कहर माना । जब लोग इस प्रतिकूल दशा से उबरे तो उन्हें ख्याल आया की नरेंदर को दिया हुआ पैसा कैसे वापस लिया जाय, क्योंकि न फसल है खेत में, न ही काम । उन्होंने पंचायत में ये मुद्दा उठाया, तो पंचों ने नरेंदर को गेहूं की फसल के लिए नियुक्त कर दिया, नरेंदर ने भी ये स्वीकार किया । नरेंदर के दस बिस्सा खेत के साथ ही साथ उसका साझा किया हुआ खेत भी खराब हुआ, खड़ी फसल मर गयीं । तेरही में जमा किये हुए अन्न लगभग ख़तम हो चुके थे । इस बार की मरी फसल को साझा करने के बाद थोड़ा ही चावल नरेंदर के भाग्य में आ पाया । ३-४ महीने का काम तो चल गया लेकिन गेहूं की फसल तैयार होने में अभी ३-४ महीने और लगेंगे । भूख महीने नहीं बल्कि ‘दिन’ गिनती है । नरेंदर को चिंता होने लगी की बच्चों को कहीं भूखा न सोना पड़े। असल में ये चिंता उसे तभी से घर कर गयीं थी जब उसने तेरही की रात मिट्टीके कोठिले में झांका था । उसमे १-२ महीने का गेहूं व २-३ महीने का चावल ही शेष था, और उसके ऊपर नई धान की फसल का मरना । चिंताएं निष्पक्ष होती हैं, इनपर समय या मौसम प्रभाव नहीं डालते, ये कभी भी, किसी पर आ सकती हैं। गाँव के केराने के दुकान के सामने से जब वो गुजरता, उसे याद आता की घर में कुछ सामान ख़त्म हो गए हैं, घरवाली ने हल्दी लाने को कहा था, घरवाली ने प्याज लाने को कहा था, आदि । लेकिन जब उसे अपनी तंगी का आभास होता, तो वो अपने मन को समझा लेता, ये कहकर की हल्दी व प्याज के बिना भी काम चल सकता है, और घरवाली को ये कह देगा की जल्दीबाजी में सामान लाना भूल गया । इस तरह से तराजू के एक पड़ले में वो अपनी जेब को और दूसरे पड़ले में अपनी आवश्यकताओं को रखकर परिवार के वर्तमान का भार तौलता, तो उसे हर बार भविष्य ‘भारी’ ही दिखाई देता, वो दुकान से मुँह फेर लेता। कम्बल ओढे हुए नरेंदर ने सूखे पत्तों को आग में डाला, फिर आग तापते हुए हाथों को आपस में रगड़ा । बहुत दिनों के मंथन के बाद उसने ये निर्णय लिया की अपनी बची हुई दस बिस्से की जमीन को जमींदार के पास गिरवी रख कर थोड़े अन्न लाएगा । अगले ही दिन वो जमींदार के पास अपनी ज़मीन गिरवी रख आया, हर महीने सूत के तौर पे, उसे उसकी ही ज़मीन पर काम करना होगा व फसल का बड़ा हिस्सा जमींदार को देना होगा, जब तक वो खेत का दाम वापस नहीं करता। नरेंदर मान गया, क्योंकि उसे अपने परिवार के पेट का वर्तमान सुधारना था, भविष्य तो फिर भी दो हाथ दूर था । लेकिन भविष्य की मुट्ठी में क्या है, ये किसे पता ? हम केवल कर्म कर सकते हैं, और अर्जित किये अनुभवों से आने वाले बुरे व अच्छे समय में किस तरह से अडिग रहे, ये सीख सकते हैं । ईश्वर हमें वो नहीं देता जो हमें 'अच्छा लगता है' बल्कि वो देता है जो 'हमारे लिए अच्छा होता है' । नरेंदर की परिकल्पना थी की अगली फसल में सब कुछ फिर से ठीक हो जाएगा, उसकी कोठली फिर अन्न से भर जायेगी और वो अगले २-३ सालों में अपना खेत छुड़ा लेगा, लेकिन विडम्बना ने अपने होने का अहसास दिखाया, दुर्भाग्य ने खुद को दोहराया, फसल में कीड़े लग गए । अगले कुछ सालों तक नरेंदर के साथ-साथ कई गाँव वालों की स्थिति गिरती गयी, और वो अपना खेत छुड़ा न सका । जिस खेत को उसके पिता ने अपनी मेहनत से ख़रीदा था, उसे उसने गिरवी रख दिया, उसे ऐसा लगा की उसने अपने पिता के बहे हुए पसीने को गिरवी रख दिया, या शायद पिता को ही…। इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं था, यही विचार पल-पल उसे छुब्ध रखता था, कभी-कभी तो वो ये भी सोचता था की उसके पिता को शान्ति मिली होगी या नहीं ? समय मूक था, लेकिन अपनी परतों में लोगों के कर्मों को लिपटाये हुए अपनी धूरी पर खिसकता जा रहा था, इस तरह से भूत व वर्तमान का हिसाब रखते हुए उसे ४-५ साल बीत गए।

इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित सभी तत्त्व सिमित हैं। उन्ही तत्त्वों में से एक तत्त्व है 'आत्मा' । जितनी कल थीं उतनी ही आज भी हैं, किसी छोर एक जिंदगी पनपती है तो दूसरे छोर एक जिंदगी मुरझा जाती है, जीवन व मरण तो केवल क्रियाएं मात्र हैं । किसी जगहं एक जिंदगी ने आँखें खोली होंगी, तभी तो आज जमींदार साहब की आँखें बंद हुई हैं। उदय प्रताप के पिता अब नहीं रहे । जमींदार साहब बड़े ही मान-सम्मान वाले आदमी थे, लोग उनका आदर भी करते थे और उनसे डरते भी थे । उदयप्रताप की प्रकृति उनसे अलग थी, वो मानवता के लिए ज्यादा सोचता था, फिर भी वो उसे बहुत चाहते थे । पता नहीं उसे ये शिक्षा शहर की पढ़ाई से मिली थी या फिर अपनी माँ से, खैर अब तो उसके सर से माँ-बाप दोनों का साया हट गया था । शमशान से लौटने के बाद उसका मन शांत भी था व छुब्ध भी । शांत इसलिए था क्योंकि यही प्रकृति का नियम है, कुछ भी नया नहीं हुआ है और छुब्ध इसलिए था क्योंकि अब कुछ पुराना भी तो नहीं रहा । इंसान भले ही कितने भी नए रिश्ते बना ले, ह्रदय के छोटे से कोने में पुराने रिश्तों की झलकियों को हमेशा संजो के रखता है । यही झलकियाँ उसे कमजोर भी बनाती हैं व मजबूत भी। उदयप्रताप मन से कमजोर हो रहा था, लेकिन उसे उसकी इच्छाशक्ति ने संभाला। अब आगे क्या करना है?

उधर नरेंदर के साथ कुछ लोग शमशान से लौटने के उपरान्त नहर में नहाने चले गए थे। नरेंदर की ज़मीन अभी भी गिरवी रखी थी। जमींदार के जाने के बाद अब उसका हिसाब उदयप्रताप ही रखेगा। नरेंदर की बेटी राधा भी शादी के लायक हो गयी थी, उसके लिए भी लड़का देखा जा रहा था, लेकिन दहेज़ की मांग और शादी के खर्चे को झेलना अभी नरेंदर की जेब से बाहर था, अभी तक उसकी कोठली अन्न से नहीं भर पायी थी । जेठ की दोपहर है, नरेंदर अपने एक-दो पड़ोसियों के साथ, पीपल के पेड़ के नीचे बैठा बातें कर रहा है। पेड़ों के लिए हमारे प्राचीन ग्रंथों में लिखा गया है-

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्ठन्ति चातपे ।

फलान्यपि परार्थाय वॄक्षा: सत्पुरूषा इव ।।

अर्थात, पेड़ खुद धूप में खड़े होकर दूसरों को छाया देते हैं। उनके फल दूसरों के लिए हैं। इसलिए वृक्ष 'सत्पुरुष' (सज्जनों) के समान हैं।

पत्ते फड़फड़ा रहे हैं, मोती कुत्ता बड़ा हो गया है, वो भी छांव में बैठा पैर से खुजली कर रहा है, गरम हवा के थपेड़े पीपल के पत्तों से टकराकर ठन्डे हो रहे हैं, कौवों में कुछ कहासुनी चल रही है । कुछ दिनों से एक काला कौवा अक्सर कांव -कांव करता रहता है। जमींदार के विषय में बात करते हुए लोग ‘एक बड़ी तेरही’ की कल्पना कर रहे थे । सभी जानते थे की बड़े आदमी की तेरही खूब धूम-धाम से होती है । १० साल पहले उदयप्रताप के दादा की तेरही भी बड़ी भव्य हुई थी । इस बार तो लोगों ने काफी कुछ सोच के बैठा है, पूड़ी, कचौड़ी, २-३ प्रकार की सब्जी, रसगुल्ला, छेना, आदि। आस-पास के गाँवों को मिला कर लगभग पांच-छह सौ लोग आमंत्रित होंगे, उस दिन किसी के घर चूल्हा नहीं जलेगा । ४ दिन बाद पंचायत है, वहां भी तेरही की बातें होंगी, तब मालूम चल जाएगा की कितने लोगों का निमंत्रण होगा, वैसे भी जमींदार साहब, पंचों में से एक पंच थे, उनकी जगह किसी अन्य को भी नियुक्त किया जाएगा । आने वाली पंचायत थोड़ी ख़ास होगी । अगले तीन-चार दिनों तक, लोगों के मन में यही चलता रहा की पंच किसे बनाया जाएगा ? तेरही कितनी धूम-धाम से मनाई जायेगी ? आते-जाते लोग अक्सर जमींदार के घर की तरफ एक बार ज़रूर देखते। असल में वो देखना चाहते थे की, तेरही की कितनी तैयारी हुईं? तम्बू कब लगेंगे ? हलवाइयों को चुना गया की नहीं ? रिश्तेदार आये की नहीं? उदयप्रताप व्यस्त है की नहीं ? खाना बाहर बनेगा या घर के अंदर ? निमंत्रण पत्र छपवाया गया की नहीं?

जमींदार के निधन की वजह से पिछले हफ्ते की पंचायत स्थगित कर दी गयी थी। गाँव वालों की उत्सुकता में कोई कमी नहीं थी। तेरही के तीन दिन बचे तो उन सब के मन में हड़कंप मच गया की अभी तक उदयप्रताप की तरफ से कोई भी तैयारी नहीं दिख रही है । आखिर कैसे होगा सबकुछ एक साथ ? अंत में जब लोगों से न रहा गया तो खबरी से मालूम करवाया गया की आखिर बात क्या है ? मालूम चला की तेरही नहीं होगी। लेकिन क्यों ? इसका सही उत्तर किसी को नहीं पता। मंगलवार की पंचायत में पंच के नए सदस्य की नियुक्ति नहीं हो पायी, लेकिन तेरही को लेकर उदयप्रताप से ढेर सारे सवाल और तर्क किये गए। लोग समझ नहीं पा रहे थे की, वजह क्या है। इस तरह से रिवाज़ बदलने की जरूरत कैसे आ पड़ी? जमींदार की आत्मा को शान्ति कैसे मिलेगी ? समाज क्या कहेगा ? आस-पास के गाँव वाले उदयप्रताप के समक्ष हसी नहीं उड़ाएंगे, लेकिन आपस में खुसर-फुसर तो जरूर ही करेंगे । उन्हें यकीन नहीं हुआ क्योंकि ऐसा तो किसी ने सोचा ही नहीं था। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। ऐसे तो समाज में गलत सन्देश पहुंचेगा। वहां उपस्थित पंडित लोग भी समझाने लगे की बरसों चली आ रही परंपरा व रीती को नहीं बदलना चाहिए, आत्मा की शान्ति के लिए ये क्रियाएं करनी पड़ती है, शास्त्र भी यही कहता है, पिता को इस बंधन से मुक्त करने के लिए ही ये विधान बनाये गए हैं । उसके दादा ने ऐसा ही किया, फिर उसके पिता यानी जमींदार साहब ने और अब उसे भी ऐसा ही करना चाहिए । इस गाँव की कितनी बदनामी होगी, की पंच के बेटे ने गलत किया, स्वर्ग में बैठे हुए उसके पिता भी खुश नहीं होंगे। पंचों, पंडितो व लोगों ने हर तरीके से उसे समझाने की कोशिश की लेकिन उसने केवल एक ही जवाब दिया की उसके पिता यानी जमींदार साहब नहीं चाहते थे की उनकी तेरही मनाई जाए, और वो बस उनकी आज्ञा का पालन कर रहा है । भला जमींदार साहब ऐसा क्यों चाहते थे ? उदयप्रताप ने बताया की –“जमींदार साहब गाँव की स्थिति से खुश नहीं थे, इस गाँव में भी बहुत से ऐसे परिवार रहते हैं, जिनकी दाल-रोटी बहुत ही मुश्किल से चलती है, उन्हें सोचना पड़ता है पेट भर भोजन के लिए, वो आधा पेट ही खाते हैं जिससे अगले दिन के लिए अन्न बचा रहे, उनके कोठिले हमेशा खाली रहते हैं, कइयों के बच्चे तो कहानी से ही पेट भर लेते हैं। ऐसे वक़्त में अगर उनपर कोई संकट आ जाए तो वो कैसे सँभालते होंगे ? ऐसे वक़्त में अगर उनके घर किसी की मृत्यु हो जाए, तो वो तेरहवीं का खर्चा कैसे उठा पाएंगे ?” तभी बीच में उसकी बात काटते हुए पंडित जी बोल उठे- “भाई, तुम्हे ऐसी कौन सी आर्थिक कमी हो गयी की तेरहवीं का खर्चा नहीं उठा पाओगे?” उदयशंकर ने फिर बोलना शुरू किया- “बस वही बताने की कोशिश कर रहा हूँ, की ईश्वर की कृपा से मैं सक्षम हूँ, लेकिन जो लोग नहीं हैं, उनपर ये समाज कितना दबाव डालता है, धरती से लेकर स्वर्ग तक की सारी आपदाएं, विपदाएं गिना कर, उन लोगों के अंदर डर पैदा कर दिया जाता है, लोक-परलोक का बंधन बता कर किसी तरह से लोग दान-पुण्य जबरदस्ती करवा लेते हैं । अगर कोई तेरह लोगों को भोजन कराता है तो आस-पड़ोस के लोग नाराज़ हो जाते है, आस-पड़ोस के लोगों को भोजन कराओ तो बाकी गाँव के लोग नाराज़ हो जाते हैं, एक गाँव को न्योता भेजो तो दूसरे गाँव के लोग बात करना बंद कर देते है, आखिर एक ग़रीब जिसके घर खुद अन्न के लाले पड़े हों, वो दो-तीन सौ लोगों का खर्चा कैसे उठा पायेगा ? पंडित लोग अलग दाएं-पुण्य मांगते हैं । ऐसे में जिसके पास ज़मीन है, उसे अपनी ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है, और जिसके पास ज़मीन नहीं है, उसे अपना सम्मान । इन परम्पराओं के आगे हम इतने मजबूर क्यों हो जाते हैं की इंसानियत को ही भूल जाते हैं। जिस समय ये बनाये गए थे, उस समय का समाज कुछ और था, लोगों के मन में छल-कपट जैसी भावनाएं नहीं थीं, भावनाएं थी तो एक दूसरे के कष्ट को अपना कष्ट समझने की, परोपकार करने की । अब वो समाज नहीं रहा, तो फिर ये उम्मीदें क्यों ?

पंचों में से एक बोला- “नहीं-नहीं, वैसा ही समाज आज भी है, उदाहरण के तौर पे, ५ साल पहले ही की घटना देख लो, जब नरेंदर के पिता, रामजतन की मृत्यु हुई थी, तब सारे गाँव ने मिल कर तेरहवीं मनाई थी, परोपकार तो आज भी लोगों के अंदर है।“ उदयप्रताप उनकी बात काटते हुए- “उसी परोपकार के चलते आज भी नरेंदर की ज़मीन गिरवी है, वो परोपकार नहीं बल्कि व्यापार था । मुझे भी याद है, मैं भी यहीं पंचायत में बैठा था, लोगों ने मदद तो की लेकिन अपने स्वार्थ को दूसरे हाथ में रखकर, लोगों ने पैसे दिए, लेकिन मजदूरी का हिसाब लगाकर। उस साल बारिश ज्यादा हुई, खेत में काम नहीं बचा तो लोगों ने उन पैसों के बदले नरेंदर से अपने घर के काम करवाने शुरू कर दिए, क्या यही समाज की परिभाषा थी ? पिताजी अक्सर कहते थे की, समाज मनुष्य के लिए बना है, मनुष्य समाज के लिए नहीं । मुझे तो लगता है की रामजतन की आत्मा नरेंदर की स्थिति देख कर बहुत दुखी हुई होगी, भला एक पिता अपने बेटे को कष्ट देकर, परलोक के रास्ते कैसे सुगम कर सकता है ? पंडित बोले- “शास्त्रों में तेरहवें दिन का महत्त्व बताया गया है, जन-सामान्य को भोजन कराने का रिवाज़ भी यहीं से आया है, इस दिन की गयी क्रियाओं से मरे हुए व्यक्ति की आत्मा को सदगति प्राप्त होती है, तुमने शहर में रहकर पढ़ाई की है, वहां की पुस्तकों में शास्त्रों की बातें नहीं होंगी ? आम लोगों को इसके बारे में जानने के लिए शास्त्रों को पढ़ना पड़ेगा, अब शास्त्र, वेद, उपनिषद कौन पढ़ता है ? इसीलिए संस्कार बना दिए गए, जिससे लोग इसको अपनाकर पुण्य कमाएं, और मरे हुए व्यक्ति को शान्ति प्रदान करें । मृतक के लिए किये जाने वाले अनुष्ठान के बारे में कितना जानते हो ? उसकी आत्मा की शान्ति के लिए कौन-कौन सी क्रियाएं की जाती हैं ? तेरहवीं का क्या महत्त्व है ? तुम्हे कितना पता है ? चलो वो सब छोडो, इतना बता दो की मृतक के पैर के अंगूठों को क्यों बाँध दिया जाता है ?” उदयप्रताप- “आपने सही कहा, मै शहर से पढ़ कर आया हूँ, इसीलिए ये सब के बारे में नहीं जानता, लेकिन पिछले साल मै शहर गया, वहां के पुस्तकालयों से ऋग्वेद, मनुस्मृति, उपनिषद व गरुणपुराण की कुछ प्रतियां ले आया था, उसका अध्ययन किया और जानना चाहा की मृत्यु के बाद कौन-कौन से कर्म-काण्ड किये जाते हैं, १३ वे दिन का महत्त्व क्या है ।“ फिर पंडितों व उदयप्रताप के बीच वाद-विवाद छिड़ गया । आगे बोलते हुए उदयप्रताप ने कहा- “इन्हीं पुस्तकों से मैं जाना की पैर के अंगूठों को आपस में इसलिए बाँध दिया जाता है जिससे आत्मा मूलाधार चक्र से होते हुए पुनः शरीर में प्रवेश न कर पाए । पैरों के अंगूठों को बांधने से उसके शरीर की दाहिनी व बाईं नाडी का संयोग होता है और शरीर की तरंगों का शरीर में ही गोलाकार आवा-गमन आरंभ होता है । इस अवस्था में मृतक के दोनों भागों से तरंगों का आगे बढ़ना आरंभ होता है जिससे शरीर के नाभिचक्र पर दबाव पडता है । इससे शेष निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायु जोर से ऊपर दिशा में जाती है, व मुख अथवा नाक से निकलती है या फिर मस्तिष्क में स्थिर हो जाती है पंडित- "खोपड़ी क्यों छेदते हैं ?" उदयप्रताप- " अग्नि देने के पश्चात खोपड़ी छेदने के समय वो फंसी हुई सूक्ष्म वायु बाहर निकलती है ।“ पंडित- "उन तीन रेखाओं का क्या मतलब है ?" उदयप्रताप- "चिता को आग लगाने वाला व्यक्ति तीन रेखाएं खींचता है, ये तीन रेखाएं क्रमशः मृत्यु के देवता 'यम', शमशान के देवता 'काल' व मृत्यु की ओर इशारा करती हैं ।“ पंडित- "कपाल क्रिया का नाम सुना है ?" उदयप्रताप- " अनुष्ठान के दौरान समारोह का समापन ‘कपाल क्रिया’ द्वारा किया जाता है, आत्मा को मुक्त करने के लिए, एक बांस के साथ जलती हुई खोपड़ी को छेदने या तोड़ने का अनुष्ठान भी किया जाता है, जैसा की मैंने पहले ही बताया है ।“ फिर उदयप्रताप ने एक-एक करके सारे गूढ़ रहस्य लोगों के सामने रख दिए । आगे बोलते हुए- "वे सभी जो दाह संस्कार में शामिल होते हैं, और मृत शरीर या श्मशान के धुएं के संपर्क में आते हैं, दाह संस्कार के बाद जल्द से जल्द स्नान करते हैं, क्योंकि दाह संस्कार को अशुद्ध और प्रदूषणकारी माना जाता है।“ उन्ही पुस्तकों से मैंने जाना की- “पहले दिन से दसवें दिन तक तिलांजलि व पिंडदान क्यों किये जाते हैं, विषम श्राद्ध को विषम दिन ही क्यों किये जाते है, नौवें दिन से उत्तर-क्रिया करने का क्या महत्त्व है, अस्थि-विसर्जन क्यों दसवें दिन किया जाता है, ग्यारहवें दिन पंचगव्य-होम की क्रिया क्या है, एकोदिष्टा-श्राद्ध, वसुगण-श्राद्ध और रुद्रगण-श्राद्ध की विशेषता क्या है, बारहवें दिन के सपिंडीकरण-श्राद्ध से पितृलोक का सम्मान कैसे मिलता है, तेरहवें दिन के पाथेय-श्राद्ध और निधन-शांति के अनुष्ठान से आत्मा कैसे पृथ्वी के सारे वातावरण को छोड़कर व अपने परिजनों से हर प्रकार का नाता तोड़कर, अनंत ब्रह्माण्ड में विलीन हो जाती है, तेरहवें दिन ही वैदिक मन्त्रों के जरिये वरुण देवता व मृत्युंजय की पूजा की जाती है । वैसे तो मृतक से बिछड़ कर हम दुखी होते हैं, लेकिन इस तेरहवें दिन की घटना जिसमे आत्मा का परमात्मा (अनंत ब्रह्माण्ड) से मिलाप होता है, उस पल को हम एक उत्सव की तरह मनाते हैं, अपनी ख़ुशी को व्यक्त करने के लिए हम लोगों को खाने का निमंत्रण देते हैं, मिष्ठान का वितरण करते हैं, जिसे ‘तेरही (तेरहवीं)’ कहते हैं।“ सांसें भरते हुए उदयप्रताप ने बोला- “ऐसा अनिवार्य नहीं है की आप, लोगों को तेरही पे बुलाएं। ये एक सुखकारी घटना है, जिसे एक उत्सव की भाँती मनाया जा सकता है लेकिन उत्सव का मतलब केवल भोजन से नहीं होता, आप किसी पर दबाव नहीं डाल सकते, जिसने श्राद्ध किया, उसकी श्रद्धा किसमे है, ये उसी को सोचने दीजिए, वो चाहे तो आपको भोजन कराये, दान-दक्षिणा दे या फिर केवल पानी ही पिला कर रह जाए, उसकी निंदा मत कीजिये। जब एक आत्मा, उसी अनंत ब्रह्माण्ड में वापस लौटती है, जहाँ से वो आयी थी, तो ये गमन क्रिया एक हर्ष का पल है, हम सभी जीव-धारियों के लिए, और इस पल को आप-हम किसी भी तरह से मना सकते हैं, ये जिम्मेदारी हम सभी की होती है ना की केवल एक इंसान की । दूसरा सक्षम है या नहीं, उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है, ये जानते हुए भी क्यों हम अनजान होकर केवल अपने स्वार्थ को ही देखते रहतें हैं? अगर हमारी बड़ी इच्छा है तेरही मनाने की तो, सभी गाँव के लोग शारीरिक व आर्थिक सहयोग करके इस प्रक्रिया को बनाये रख सकते हैं।“ पंचायत में बैठे सभी लोग बड़े ध्यान से उदयप्रताप की एक-एक बातें सुन रहे थे, जेठ की दुपहर में अकस्मात ही एक सन्नाटा सा छा गया । केवल दो लोगों की आवाजें ही सुनाई दे रहीं थीं, एक उदयप्रताप की और दूसरी, पेड़ पर बैठे उस काले कौवे की । अब जाकर लोगों को तेरहवीं की सही परिभाषा मालूम चल रही थी, अन्यथा लोग तो तेरही का मतलब केवल भोज ही समझते थे । निःसंदेह हमारे पुराणों, उपनिषदों व वेदों में जो भी लिखा है, उन सभी के पीछे वैज्ञानिक व आध्यात्मिक तथ्य जुड़े हुए हैं और साथ ही जुड़े हुए हैं हजारों वर्षों के अनुभव । इन अनुभवों व अनुसंधानों को शब्द-बद्ध कर जीवमात्र के कल्याण के लिए लिखित करने वाले हमारे महर्षि, ऋषि ब्रह्मज्ञानी ही थे । ये प्रथाएं, कर्म-काण्ड व क्रियाएं इस सकल ब्रह्माण्ड के भविष्य और जीवधारियों, वनस्पतियों व पंचतत्त्वों को अनुकूल रखने के लिए ही बनाये गए थे । आवयश्कता है तो केवल सही मार्गदर्शन की, प्रथाओं व क्रियाओं में छिपे रहस्यों को उजागर करने की । इन्हे आदत तभी बनाइये जब इनमे छुपी गूढ़ता से अवगत हों अन्यथा ये केवल बोझ मात्र रह जाएंगी, जैसे 'तेरही' असमर्थ व्यक्ति के लिए केवल एक बोझ बन कर रह गयी है । जो पढ़े-लिखे हैं व जिनका एक उठाया कदम इस समाज में नई क्रान्ति ला सकता है, वो भी इन रहस्यों को छिपाते फिरते हैं या फिर वो खुद ही नहीं जानते । एक साल पहले मै भी 'तेरहवीं ' के रहस्य को नहीं जानता था, यही सोचता था की ब्राह्मणो व जन-सामान्य को भोजन व मिष्ठान वितरण करने के बाद ही मरे हुए व्यक्ति की आत्मा को सदगति मिलेगी, उसे परमात्मा की प्राप्ति होगी लेकिन जब इस रहस्य से अवगत हुआ तब जाके जाना की असल में आत्मा की सदगति (अनंत ब्रह्माण्ड में विलीन होना, परमात्मा से मिलाप) की घटना हो जाने के उपरान्त अपने हर्ष व उल्लास को व्यक्त करने के लिए हम इसे एक उत्सव की तरह मनाते हैं और मिष्ठान वितरण करते हैं । यह सदगति की घटना तेरहवें दिन किये गए पूजा-पाठ, मंत्र-उच्चारण, वरुण देवता व महा-मृत्युंजय की पूजा के साथ ही संपन्न हो जाती है, बाद में आप भोजन वितरण करें या न करें, दान-दक्षिणा दें या न दें, आत्मा को कोई फर्क नहीं पड़ता । वैसे तो सब लोग बराबर होते हैं फिर भी हर समाज में एक अलग तरह की भिन्नता व्याप्त रहती है जैसे, कुछ अनपढ़ हैं तो कुछ पढ़े-लिखे, कुछ निर्धन हैं तो कुछ धनवान, कुछ दुर्बल व कुछ बलवान । जब एक अनपढ़, निर्धन या दुर्बल व्यक्ति कोई कदम उठाता है, या कोई क्रांति लाता है तो लोग उसे उतना महत्त्व नहीं देते, लेकिन अगर कोई पढ़ा-लिखा, धनवान या सबल व्यक्ति उसी कदम को उठाता है या क्रांति लाता है तो उसका देखी-देखा बाकी लोग भी समर्थन करते हैं । इसका अर्थ ये है की समाज को सही दिशा दिखाने की जिम्मेदारी दुर्बल की तुलना में एक सबल की ज्यादा होती है । समाज की बागडोर का एक बड़ा हिस्सा, संपन्न व्यक्ति को अपने हाथों में लेना चाहिए, और यही बात मेरे पिताजी ने मुझे बतायी थी । मनुष्य कर्म प्रधान होता है, इसके द्वारा किये गए कार्यों से ही वो जाना जाता है । हमारे द्वारा किये गए कर्म से ही इस समाज का और अंततः इस पूरे पर्यावरण का भविष्य निर्भर करता है । हमारे शास्त्रों में कहा गया है-

आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्र्चद्यौर्भूमिरापो हॄदयं यमश्र्च ।

अहश्र्च रात्रिश्र्च उभे च संध्ये धर्माऽपि जानाति नरस्य वॄत्तम् ।।

अर्थात, सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम (मृत्यु), भोर व संध्या और धर्म, साक्षी है कि मनुष्य क्या करता है ।

ये पिताजी की ही इच्छा थी की लोग तेरही का सही अर्थ समझें । उनकी तेरहवीं परसों है, अगर शास्त्रों की माने तो पिताजी की आत्मा यहीं-कहीं हमारे समीप ही होगी, बिना तेरहवीं की क्रिया द्वारा उनको सदगति नहीं मिलेगी, और मुझे पूरा विश्वास है की वो भी मेरे इस संकल्प से निश्चिंत होकर परमात्मा में विलीन हो जाएंगे । तेरहवीं की क्रियाएं परसों संपन्न की जाएंगी, जिन्हे इसमें भाग लेना हो वो आमंत्रित है ।“

काफी वाद-विवाद व तर्क के बाद पंचों व अन्य लोगों के पास उदयप्रताप के सवालों का जवाब नहीं था, वो अपने साथ उन पुस्तकों को भी साथ लाया था, जिनमे ये गूढ़ रहस्य वर्णित था । पंडितों के मुँह भी सिल गए । सभा समाप्त की गयी । कुछ लोग खुश थे की उनके पास तेरही का सही ज्ञान था वहीँ कुछ लोग दुखी भी थे क्योंकि अब लोगों के पास तेरही का सही ज्ञान था । कुछ लोग उत्साहित थे की आने वाली तेरही एक नए तरीके से मनाई जायेगी, वहीँ कुछ लोग हतोत्साहित भी थे क्योंकि आने वाली तेरही अब पुराने तरीके से नहीं मनाई जायेगी । खैर, जहाँ दीपक है वहीँ अँधेरा भी है । शाम को अलग-अलग जगहों पर कई लोगों का झुंड सा बना हुआ दिख रहा था, तेरही की ही बातें चल रही थीं । कुछ लोग यही सोच रहे थे की इस बार की पूरी-कचौड़ी और बुनिया डूब गयी । वहीँ कुछ लोग अभी भी आसरा लगाए हुए थे की कम से कम मिठाई तो मिलनी ही चाहिए । कुछ लोग उदयप्रताप व शहर के पढाई की बड़ाई भी कर रहे थे । लोग एक-दूसरे के मन की टोह भी ले रहे थे की कौन-कौन जमींदार की तेरही में जाने वाला है । पंच भी आपस में एक-दूसरे के घर जाकर तेरही के बारे में ही चर्चा कर रहे थे । उदयप्रताप के पिता, एक पंच थे, एक जमींदार थे और दिल से ईमानदार भी थे । ऊपर से जब पंचों को मालूम चला की ये उनकी इच्छा थी की लोग तेरही की सही परिभाषा समझें, तो पंचों ने आपस में निर्णय लिया की, तेरही उसी तरीके से मनाई जायेगी, जैसा वो चाहते थे । अगले दिन सुबह ही वो लोग उदयप्रताप से मिलने गए, और ये भी आश्वासन दिया की जैसा वो चाहता है वैसा ही करे, वो लोग उसके साथ हैं । उन्ही पंचों में से एक पंच जमींदार साहब के घनिष्ठ मित्र भी थे, सो उन्होंने अपने तरफ से मिष्ठान वितरण का प्रस्ताव भी रखा, उदयप्रताप मान गया । उसी शाम नरेंदर अपने हाथ में एक कटोरा गेहूं लेकर उदयप्रताप से मिलने आया, उसके साथ कुछ अन्य लोग भी थे, वो सब भी कुछ न कुछ ले आये थे । उदयप्रताप बहुत खुश हुआ, उसे यकीन हो चला था की लोग सही मायने में अब तेरही का सही मतलब जान गए हैं । उसने हॅसते हुए नरेंदर से कहा- ' लो भाई, तुमने जैसा कहा, मैंने कर दिया ।' नरेंदर को कुछ समझ में नहीं आया । उदयप्रताप ने उसे याद दिलाया की एक दिन उसने कहा था- 'अगर ये कदम आप लोग उठाओगे तो लोग नहीं बोलेंगे ।' नरेंदर ने अपना आभार प्रगट किया क्योंकि उसे यकीन था की अब आने वाले समय में गरीब इन तेरही के खर्चों से बच जाएगा व लोग अब ज्यादा ताने भी नहीं मारेंगे क्योंकि उनके सामने पहले से ही ये उदाहरण मौजूद रहेगा । उन लोगों ने उदयप्रताप को तेरही के लिए लाया हुआ अन्न देना चाहा, और कहा की ये अन्न हम मजबूरी वश नहीं बल्कि अपनी श्रद्धा से दे रहे हैं, इसलिए इसे ले लीजिये और वो चाहे तो इसे किसी को दान दे सकता है । उदयप्रताप मान गया । अगले दिन सुबह-सुबह पंडित जी पहुंच गए, तेरहवीं का अनुष्ठान शुरू हो गया, विधिवत तरीके से निर्धारित क्रियाएं शुरू कर दी गयीं । लगभग सारे रिश्तेदार, गाँव के लगभग सभी लोग व कुछ लोग दूसरे गाँव के भी थे । इस बार लोग तेरहवीं की क्रियाओं को बड़े ध्यान से देख रहे थे । पहले की गयी तेरहियों में भी एकत्रित होते थे, लेकिन ध्यान कहीं और होता था । इस बार उन्हें दो दिन पहले ही तेरही की सही परिभाषा से अवगत कराया गया था । कुछ लोग बीच-बीच में खुसर-फुसर भी कर रहे थे जैसे ये क्यों हो रहा है? ये मंत्र जाप किस भगवान के लिए है? मृत्युंजय मंत्र कब बोला जाएगा? वरुण देवता की पूजा कब होगी? इत्यादि । समापन के पश्चात मिष्ठान वितरण कराया गया । कुछ लोग भीड़ का फायदा उठा कर दो-तीन बार मिठाई लेने का प्रयास कर रहे थे । लोगों के अंदर एक तरह का संतोष था, क्योंकि उन्हें एहसास हो रहा था की आज एक पवित्र आत्मा वापस उसी अनंत सागर में विलीन हो गयी, जहाँ से वो इस धरती पर आयी थी । उसी परमात्मा में उन सभी लोगों के पूर्वजों की आत्माएं भी कभी विलुप्त हुई होंगी। पंडितों को पंचायत की तरफ से थोड़ी दान-दक्षिणा दे दी गयी । तेरही वाले दिन के बाद से वो काला कौवा फिर कभी भी नहीं दिखा । कुछ लोगों के मन में एक डर भी था की तेरही के अनुष्ठान में थोड़ा फेर-बदल किया गया है, लोगों व पंडितों को भोजन नहीं कराया गया, इसलिए कहीं जमींदार की आत्मा कोई प्रकोप न ला दे । कभी-कभी गाँव में कुछ लोग इस बात का तंज भी कसते थे की उदयप्रताप ने तेरही के पैसे बचा लिए । लोगों का क्या है, आप कम खाओगे तो भी बोलेंगे, और ज्यादा खाओगे तो भी । गुण व अवगुण दोनों का ही एक युग से दूसरे युग में स्थानांतरण होता है । ये तंज कसने की परंपरा हमें शायद त्रेतायुग से भेंट स्वरुप मिली होगी ।

दिन बीतते गए, नखत बदलते गए । प्रचंड गर्मी से उड़ती धूल को बरसात के काले बादलों ने फिर से मिट्टी में मिला दिया, पेड़ो ने सुखी पत्तियों को गिरा कर, हरियाली का घूँघट ओढ़ा । खेतों के केंचुए गीली मिट्टी में अपनी आकृति बनाने लगे, एक बार फिर से मेंढकों की पंचायत बैठी । ईश्वर की कृपा से इस साल अच्छी बारिश हुई । पिछले साल की दशा को ध्यान में रखते हुए, पंचायत ने बरसात शुरू होने से पहले ही नहर बंद करवा दी थी । फसल झूमने लगे । समय ने किसानों के चेहरों पे मुस्कान छिड़कते हुए अपने कदम एक मौसम आगे बढ़ा दिए, जाड़े की शुरुआत हो चुकी है । धान की कटाई का भी श्री गणेश हुआ । उदयप्रताप जो की किसी काम से शहर गया था, वापस आ गया है उसे भी तो खेतों की फसल कटवानी है । लगभग एक-डेढ़ महीने में सारा खेतों का काम निपट गया, एक खुशियाली की लहर दौड़ गयी । लोगों ने दशहरा और दिवाली धूम-धाम से मनाई, जमींदारों के गोदाम भर गए, लेकिन कुछ लोगों की कोठलियाँ अभी भी आधी खाली थीं, जैसे नरेंदर की । गाँव का एक छोटा हिस्सा जवान हो रहा था, कुछ गरीब घरों की बेटियों के हाथ पीले करने की चिंता लोगों के माथे पे अदृश्य रेखाओं की तरह उभर रहीं थीं । दूसरे गाँव के रिश्ते तो तैयार थे, बस बात खर्चे और दहेज़ पे आकर रूक जाती । कोई साइकिल मांगता तो कोई रेडिओ, ऊपर से शादी का खर्चा अलग । एक लड़की ब्याहने का खर्चा लगभग ग्यारह-बारह हज़ार का था । नरेंदर के साथ कई लोगों ने पंचों के सामने इस परेशानी को रखा । पंचों के ये पूछने पर की कितने का इंतजाम हो चुका है, लोगों ने अपनी बचत को गिनते हुए कहा- “एक अकेले के पास एक से दो हजार बस ।”, लेकिन एक शादी का खर्च पांच गुना से भी ज्यादा । इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा होने लगी, कुछ लोगों का मत था की २-३ साल रुक जाओ, बचत जब ज्यादा हो जायेगी तब सोचेंगे । वहीँ कुछ लोगों का मत था की जिनके पास जमीन है, वो उसे गिरवी रख के पैसों का इंतजाम कर सकते हैं । पंचों ने सब की बातें सुनी, फिर थोड़ा सोचकर अपनी राय देते हुए कहा की भले ही कन्यादान एक निजी कार्य हो लेकिन शादी-ब्याह को सामाजिक कार्य की दृष्टि से देखना चाहिए । क्योंकि जब एक गाँव से एक बेटी ब्याह कर के दूसरे गाँव जाती है, तो वो अपने चाल-चलन से केवल अपने परिवार की ही नहीं अपितु पूरे गाँव की मान-मर्यादा को दर्शाती है। अगर कोई भी ऊंच-नीच होती है तो बदनामी पूरे गाँव की होती है, इसी तरह बेटी के व्यवहार से नाम भी पूरे गाँव का होता है । ये एक सामाजिक कार्य है, क्योंकि इसमें सारा गाँव ही शामिल होता है । पंचों ने उदयप्रताप की तरफ इशारा किया । तेरहवीं करने के लिए उदयप्रताप ने जो तर्क पंचों व गाँव वालों के सामने रखे थे, उससे पंच काफी प्रभावित हुए थे, उन्हें इस बात का भी ज्ञान हुआ की समाज की सही परिभाषा क्या है, और समाज का दायित्व क्या है, ये समाज यथार्थ में क्यों बनाये गए थे, इससे मानवता को क्या लाभ ? उन्हें इस बात का भी यकीं हो गया था की समाज या समूह अगर किसी काम को मिल कर अंजाम देते हैं तो कोई भी काम सरल तरीके से संपन्न हो सकता है । अगर समाज की हर इकाई अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझे तो कभी किसी एक अकेले पर बोझ न आये । उदयप्रताप भी पंचों के मत से पूरी तरीके से सहमत था, उसने सुझाव दिया ‘सामूहिक विवाह’ का । उसने कहा की 'तेरहवीं ' की तरह ही शादी-ब्याह भी एक सामाजिक योगदान है । अगर व्यक्ति विशेष अपनी आर्थिक या शारीरिक दशा के कारण यह कार्य करने में सक्षम नहीं है तो उसका भार बाकी समाज को ही उठाना चाहिए, क्योंकि एक इकाई कमजोर होने का मतलब है उस पूरे समाज का कमजोर हो जाना । वो अक्सर शहर जाया करता था, वहां उसने देखा की शहर में कुछ ऐसे विवाह केंद्र बने हुए थे, जहाँ सामूहिक विवाह किये जाते थें , ये विवाह केंद्र वहाँ की सरकार व लोगों के दान पर निर्भर होते थे । अपने प्रस्ताव में उसने ये उपाय दिया की हर घर से मदद की जाए, जिससे जितना बन पड़े, दे सकता है, अपने सामर्थ्य के हिसाब से । अगर औसतन सत्तर रूपए भी हर एक घर से मिले तो कुल पांच हजार, बाकी लड़की के घर वालों ने भी बचत की है, फिर उसने पूछा कुल कितनी बेटियाँ होंगी ब्याहने के लिए? जवाब मिला ‘छह’ । सो वहां से औसतन हजार गुणे छह, मतलब छह हजार, कुल मिला कर हो गए दस-ग्यारह हजार । सामूहिक विवाह में एक साथ इन सभी लोगों का विवाह कर दिया जाए । इससे लोग अलग-अलग खर्चे से बचेंगे । सारे गाँव के लोगों और आस-पास के जितने भी गाँव हैं उन सभी को एक साथ निमंत्रण दिया जा सकता है । बाकी बचे पैसों से बेटी की भावी जिंदगी के लिए जरूरी सामान, उपहार या भेंट या फिर अपनी इच्छानुसार खर्च कर सकते हैं । इनमे से कुछ ऐसे लोग भी है जिनकी जमीने अभी भी गिरवी पड़ी हैं, वे उन पैसों से अपनी ज़मीन भी छुड़वा सकते हैं। उदयप्रताप ने नरेंदर व अन्य लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा। इस तरह से हर साल लोग सामूहिक विवाह करके अपने ऊपर आये भारी खर्चे से मुक्ति पा सकते हैं, व समाज की परिभाषा को सिद्ध कर सकते है । पंचों को उम्मीद थी की उदयप्रताप कुछ ऐसा ही सुझाव देगा। पंडितजी को इस सुझाव से थोड़ी आपत्ति हुई, सो वे पूरी तरीके से सहमत नहीं हुए शायद वो इसलिए की जो दान-दक्षिणा उन्हें हर बार शादियों में मिलती थी, अब केवल एक बार ही मिलेगी । कुछ और लोगों को भी आपत्ति हुई जिन्होने रामजतन की तेरही में योगदान दिया था । सभा का लगभग आधा हिस्सा इस प्रस्ताव से पूरी तरीके से सहमत नहीं था। पंचों ने भी सोचने का थोड़ा वक़्त माँगा या फिर कोई और रास्ता भी है ? लोगों को उदयप्रताप का प्रस्ताव सही लगा, कुछ लोग मना करना भी चाहते थे, लेकिन अपने घर की स्थिति को देख कर उन्हें भी यही रास्ता सही लगा । सभा के बाद अगले ५-६ दिनों तक लोग आपस में समूह बना कर उदयप्रताप के सुझाव पर बातें करते रहे, कुछ लोग मजाक भी उड़ा रहे थे की तेरही हो तो पैसा दो, शादी पड़े तो पैसा दो, कल को कहेंगे की फसल काटो तो पैसा दो, घर में आओ तो पैसा दो, खाना खाओ तो पैसा दो और सोने जाना है तो पेसा दो, उदयप्रताप को हो क्या गया है, हर जगह पैसे-पैसा दिखता है । वहीँ कुछ लोग अलग तंज कस रहे थे की तेरही की कचौड़ी तो डूबी ही थी, अब शादी-ब्याह की कचौड़ी भी डुबाने के चक्कर में पड़ा है । जहाँ साल में २-४ शादियों में न्योता मिलता था, अब केवल एक बार ही मिलेगा । दूसरी ओर गाँव का एक जिम्मेदार हिस्सा इस सुझाव पर हामी भर रहा था, वे लोग पूरी तरह से सहमत थे, वे प्रयास कर रहे थे की बाकी गाँव के लोग भी मंजूरी दें । पंचों ने आपस में सलाह करने के बाद इसी सुझाव पर अपना मत बनाया, उन लोगों ने पंडितजी को भी समझाया और आश्वासन दिलाया की उन्हें दान-पुण्य तो मिल ही जाएगा, आखिर उनका हक़ है । पूरे हफ्ते बस यही वाद-विवाद, संवाद चलता रहा । अंत में जाकर यही मत सब ने स्वीकारा, इसी में सारे समाज की भलाई है व यही समाज की परिभाषा भी है । खबरी के चलते आस-पड़ोस के गावों में भी खबर फ़ैल गयी । इस गाँव की तरह उन सभी गावों में हलचल मच गयी, लेकिन लोगों का ज्यादा हिस्सा इसके धनात्मक पहलुओं को देख रहा था ऊपर से ये कदम एक बड़े जमींदार की तरफ से उठाया गया था सो लोगों ने समर्थन किया । दो हफ़्तों के बाद की पंचायत में ये निर्णय ले लिया गया की एक भव्य सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाएगा, पंडित से पूछ कर मुहूरत निकला गया, लगभग दो महीने बाद, फरवरी महीने की ‘तेरह’ तारीख । जिन छः कन्याओं का विवाह हो रहा था उनमे नरेंदर की बेटी राधा भी थी । नरेंदर की तरह ही कई पिताओं की मुश्किलें आसान हो गयीं । वो लोग यही सोचते रहे की अगर हर साल हम सौ रूपए का योगदान दे तो झुकते हुए कन्धों को कितना बड़ा सहारा मिल जाता है । दिसंबर बीत गया, जनवरी में फिर से पंचायत हुई, जिसमे होने वाले सामूहिक विवाह की तैयारियों पे ही चर्चा होती रही, पंचों की तरफ से एक मास्टर जी को पैसा इकठ्ठा करने के लिए लगाया गया । बड़े जमींदारों ने बड़ी मदद की, सभी लोगों के योगदान से पांच-छह हजार रूपए, गेहूं व चावल इकट्ठा कर लिए गए । लोगों को साठ-सत्तर रूपए दान करने में दुःख नहीं हुआ क्योंकि उन्हें पता था आज वो किसी और के लिए दान कर रहे हैं, कल को उनके लिए भी दान किया जाएगा । हाँ, थोड़ा दुःख उन लोगों को जरूर हुआ जिनके घर में ब्याहने को लडकियां नहीं थी । सो उन लोगों ने शारीरिक रूप से अपना समर्थन दिया। अन्न रखने के लिए कई लोगों की कोठलियाँ इस्तेमाल की गयीं, जिनमे नरेंदर की कोठली भी थी । नरेंदर ने अपने कोठली की ओर झाँका, उसकी खाली पड़ी हुई कोठली अब पूरी भरी हुई थी, चलो थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन, अन्न से भरी कोठली के दर्शन तो हुए । नरेंदर के दान किये हुए एक कटोरी चावल का बोझ आज उतर गया । कई बार ये बात भी उठी की तेरहवीं को अलग तरह से करने की वजह से शादी में कहीं कोई विपदा न आ जाये । तब हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए उदयप्रताप ने समझाया की ५ साल पहले तेरहवीं पुराने तरीके से हुई थी लेकिन उसी साल भीषण बारिश हुई, खड़ी फसल खराब हो गयी, पिछले साल तेरहवीं अलग तरीके से हुई, फिर भी कोई कहर नहीं बरसा ? क्योंकि प्रकृति मनुष्यों द्वारा बनाये गए समाज के रीती-रिवाजों से परे है । प्रकृति की आपदा को अंधविश्वास से मत जोड़ो। प्रकृति अपने तरीके से अपने-आप को संतुलित करती है, इसकी इकाई केवल मनुष्य ही नहीं अपितु सूक्ष्म जीव से लेकर बड़े जीव तक सभी इसी के अंतर्गत आते हैं, यहाँ तक की निर्जीव पत्थर, पेड़-पौधे और पांच-तत्त्व भी इसी की देन है, अगर कहीं पर भी असंतुलन होगा तो ये खुद को संतुलित करेगी, भले ही वो घटना हम मनुष्यों के अनुकूल हो या प्रतिकूल ।

खेतों की मेढ़ों पर गिरी ओस की बूंदें ऐसी लगती हैं मानो गुजरती हुई रात ने बचे हुए मोतियों को माघ नक्षत्र से निकालकर हर जगह, हरी -हरी घास में छिड़क दिए हों। आग के चारो ओर बैठकर लोग आने वाली बरात की की चर्चाएं कर रहे हैं, कुछ लोग आग में बाजरा व आलू भूज कर खा रहे हैं, वहीँ कुछ लोग फरसा और खुरपी लेकर खेतों में आलू खोदने के लिए निकल पड़े हैं, मोती, झब्बा, जग्गा आदि धान के पियरे पर सिकुड़ कर बैठे हुए हैं । इस सामूहिक विवाह के लिए जिन लोगों ने समर्थन नहीं दिया था, अब वे भी अपनी तरफ से कुछ न कुछ योगदान दे रहे हैं, ये होने वाले कार्यक्रम का उत्साह ही तो है, जो पैसा कम पड़ा उसका इंतज़ाम उदयप्रताप ने कर दिया ।

समय ने एक दिन आगे बढ़कर तेरह तारीख में प्रवेश किया, आज फ़रवरी की तेरह तारीख है, बरात आ चुकी है, मंडप सजे हुए हैं, पंडित मंत्रोच्चारण कर रहे हैं, उधर गरमागरम पुड़िया, कचौड़ियां छन रहीं है। एक तरफ दहेज़ में देने के लिए साइकिलें व रेडियो रखे गए हैं वहीँ दूसरी ओर बरात वालों की तरफ से लायी गयीं साड़ियां, फल, फूल इत्यादि सामान। रिश्तेदार आपस में मिल रहे हैं, ठण्ड का असर है, बूढ़े लोग कम्बल ओढ़े हुए हैं, पंच लोग व उदयप्रताप भी देख-रेख का काम कर रहे हैं, मंडप के एक तरफ महिलाएं सोहर गा रहीं है, मोती, जग्गा, झब्बा अपना झुंड बना कर, हलुवाई के आस-पास चक्कर लगा रहे हैं। दिन में ही विवाह संपन्न कर दिया गया, अब भोजन आदि की व्यवस्था की जा रही है । बैठने के लिए पक्तियां बनाई गयीं, टाट व बोरे बिछा दिए गए हैं, दोने, पत्तल की थालियां व पानी पीने के लिए मिट्टी का पुरवा वितरण किया जा रहा है। एक पंक्ति में एक साथ लगभग साठ-सत्तर लोग बैठ सकते हैं, कुल मिला कर लगभग पांच-छह सौ लोगों ने भोजन किया। पूड़ी, कचौड़ी, दो रकम की सब्जी, चटनी और गुलाबजामुन । उन्ही पंक्तियों में से उस गाँव के किसी आदमी ने दूसरे से कहा- " तेरहवीं की पूड़ी तो नसीब हुई नहीं, अब यही मौका है, जी भर के खा लो, आखिर हमने भी तो इसमें पचास रूपए लगाए हैं", तभी दूसरा- "अरे ! ये भी तो तेरहवीं की ही पूड़ी है", पहले वाला- "वो कैसे ? दूसरा- "आज तारीख है तेरह, मतलब फ़रवरी की तेरहवीं है आज, इसलिए ये भी तेरहवीं की ही पूड़ी है, समझे ?" पूड़ी-पूड़ी, चटनी-चटनी, पानी-पानी, सब्जी-सब्जी की आवाजें निकालते हुए लोग भोजन का वितरण कर रहे थे, तभी कचौड़ी चाचा की आवाज़ आयी- “छः कचौड़ी अलग से बाँध दो।”

समाज शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है, 'सम' व 'अज' । सम का अर्थ, ‘समूह’ से है व अज का मतलब है, ‘साथ रहना’ । अर्थात समाज का शाब्दिक अर्थ है, ‘समूह में साथ रहना’। हमें अनिवार्य रू ।। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

प से समाज की परिभाषा को समझना चाहिए। यह परिवर्तनशील होता है। इसकी यह गतिशीलता ही इसके विकास का मूल है, लेकिन इसका परिवर्तन व विकास जीवमात्र के भले के लिए होना चाहिए।


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