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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Fantasy


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

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अकाय (समापन अंक)

अकाय (समापन अंक)

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अब प्रतिदिन सत्यम जबतक गाय और बछिया खुले में बांधी रहती उनको निहारते रहता । यह सावधानी जरूर बरतता की खबरी की नजर उसपर न पड़े । उसको उस तांत्रिक पर बहुत गुस्सा आता जिसके चलते वह अपनी बछिया माँ से नहीं मिल पा रहा था। उसकी इच्छा होती जाकर माँ के गले लिपट कर उसे प्यार करे। माँ को भले ही समझ नहीं है कि मैं उसका बेटा हूँ लेकिन मुझे तो उतना ही आनंद आता । बछिया जब गोबर और मूत्र से गंदी होती तो वह मन मसोस कर राह जाता कि यदि मैं वहाँ होता तो माँ को एक सेकंड के लिए भी गंदगी में नहीं रहने देता ।मेरी माँ कितनी सफाई पसंद थी। वैसे राधा के घर मे माँ को खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी, उसका पूरा ख्याल भी रखा जा रहा है।यदि उनलोगों को यह ज्ञात हो जाए कि यह सत्यम की माँ है तो उसकी देख रेख विशेष हो जाएगी। राधा जब भी बछिया के पास आती उसको बहुत प्यार करती, उसको सहलाती,उसका चुम्बन लेती। राधा ने बछिया के फोटो को अपने व्हाट्सप्प के डीपी में लगा रखा है।

दुष्यंत बाबू अपने हाथ से रोज उन पाँच गढ़ो में पानी भरते थे। आज उन्होंने जब देखा कि बीच वाले वर्गाकार गढ़े का पानी सुख गया है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। चिमटा बाबा ने कहा था बीच के गढ़े का पानी सूखते ही मुझे सूचित करना। उन्होने तुरन्त बाबा को फोन लगा दिया। उधर से बाबा ने फोन उठाते ही कहा "तुम जो बताना चाहते हो मुझे मालूम है । बीच वाले गढ़े का पानी सूख गया । यही बात है न !"

दुष्यंत बाबू - एकदम यही बताने के लिए फोन किया था ।लेकिन आपको यह सूचना कैसे मिली ? क्योंकि मैंने अभी अभी ढक्कन हटाकर देखा और आपको फोन किया।

चिमटा बाबा ने हँसते हुए कहा तुमको ढक्कन हटाने पर पाता चला मुझे तो उसी वक्त ज्ञात हो गया जब वह घटना घटी। तुम्हारे घर के चप्पे चप्पे पर मेरी दृष्टि लगी हुई है। मेरे खबरी मुझे पल पल की सूचना देते रहते हैं। तुम्हारी पत्नी को अब कलश के लुढ़कने की खनखन झनझन नहीं सुनाई देती होगी। मैं परसो तुम्हारे घर पर आता हूँ क्योंकि उसी रोज अमवस्या है । अपना काम उसी दिन पूर्ण सिद्ध होगा। फिर तुम्हारा कष्ट हमेशा के लिए दूर हो जाएगा। तुमको अपनी पत्नी के स्वास्थ में बदलाव दिख रहा है कि नहीं ?

दुष्यंत बाबू - उम्मीद से बेहतर, हमने तो इस सुधार की आशा ही छोड़ दी थी ।आपकी कृपा मात्र से बिना देखे यह चमत्कार हो गया। मैं आपको लेने के लिए आश्रम में गाड़ी भेज देता हूँ।

चिमटा बाबा - उसकी कोई आवश्यकता नहीं। मैं अपनी गाड़ी से आ जाऊँगा । मैं जिस कमरे मे रुकूँगा उसके फर्श को गाय के गोबर से लेप कर देना और गोमूत्र का छिड़काव पूरे घर मे कर देना। गोमूत्र शुद्धरूप से बछिया का होना चाहिए। तुमको तो उसके लिए अब बाहर भी नहीं जाना पड़ेगा । अब तो यह व्यवस्था तुम्हारे घर में ही है।

दुष्यंत - जी बाबा, आपके आशीर्वाद से हाल ही में मेरी गाय ने बछिया को जन्म दिया है।

बाबा ने यह कहकर फोन रख दिया कि "परसो मिलते हैं। माँ चंडिका तुम्हारा कल्याण करें।"

दुष्यंत बाबू ने यह शुभ समाचार अपनी धर्मपत्नी को बताया। बाबा के कृपा से उनको मानसिक और शारीरिक कष्ट से बहुत राहत मिली थी, वो व्यक्तिगत रूप से उनके चरणों में माथा टेक कर आभार व्यक्त करना चाहती थी।घर मे हलचल तेज हो गयी। चिमटा बाबा के स्वागत की तैयारी शुरु हो गयी।उनके चमत्कारी प्रभाव को सभी ने साक्षात महसूस किया था। अतः उनसे मिलने की उत्सुकता सब मे थी।

रोज की तरह सत्यम अपनी बछिया माँ को उछल कूद करते देख रहा था। उसको अपनी मजबूरी पर तरस आ रही थी। माँ की आत्मा नए खोल में अपने आप मे मस्त थी और वह अकाय रूप में उससे मिलने को तड़प रहा था। विधाता ने क्या व्यवस्था बना रखी है ।जो भी करोगे वो भरोगे लेकिन तुमको ज्ञात नहीं रहेगा कि कब का चुकता कर रहे हो। वह सोंचने लगा यदि मेरी माँ की आत्मा को यह मालूम हो जाए की मेरी दशा क्या है तो उसकी सारी मस्ती काफूर हो जाएगी। इसका मतलब दुःख का कारण अवस्था नहीं, अवस्था की जानकारी और व्यवस्था न कर पाने की असमर्थता का एहसास है। लेकिन यह सर्वथा उचित नहीं है। हम दुःख में तो यह सोंचने लगते हैं "मैं ही क्यों ?" लेकिन जब खुश होते हैं, सब मनोकुल होता है, आनंद की अनुभूति होती है, तो यह नहीं सोचते "मैं ही क्यों?" यह "क्यों" ही बीज प्रश्न है जिसका उत्तर आपको उतीर्ण कर देगा या अनगिनत क्यों का सिलसिला खड़ा हो जाएगा। अतीत पर अफसोस और भविष्य से डर वर्तमान को अशांत कर देता है। अतः जीवन को समझने के बजाए जीने का प्रयास करना करना चाहिए। बाकी की यात्रा की दूरी और दशा का तनाव व्यर्थ है। इसका यथावत रूप में आनंद लेना चाहिए - बीते को बदल नहीं सकते और होनी तो होनी है।

करीब बारह बजे एक इनोवा गाड़ी दुष्यंत बाबू के गेट पर रुकी। उसमे से गेरुआ वस्त्रधारी दो व्यक्ति बाहर निकले।उसमे से एक आदमी के चेहरे पर बिशेष तेज थी । दूसरा व्यक्ति हावभाव से उसका सहायक लग रहा था। तबतक रवि भी आ चुका था। दोनो ने अनुमान लगाया यही वो तांत्रिक होना चाहिए जिसने इस घर को चौकी मारा है। मुख्य साधु को देखते ही रवि बोला "अरे! यह तो चिमटा बाबा हैं। वही मैं सोच रहा था इतना कड़क बंधन किसने किया है !"

सत्यम ने रवि से पूछा कि क्या आप चिमटा बाबा को जानते हैं? रवि ने हाँ में सिर हिलाया और कहा वो बहुत ही सिद्ध तांत्रिक हैं। लोग कहते हैं उनके आश्रम में भूत-प्रेत झाड़ू लगाते हैं। बहुत सारे लोग दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं जिनको दूसरे को कष्ट देने में आनंद आता है । वैसी दुष्टात्मा के लिए चिमटा बाबा साक्षात काल हैं। एक केस के सिलसिले में छानबीन करते हुए इनके आश्रम में भी जाने का मौका मिला था। उसी समय इनको करीब से जानने का मौका मिला था। उनकी सिद्धि की बात एक तरफ, लेकिन व्यक्ति बहुत ही अच्छे हैं और यथाशक्ति सबकी मदद करते हैं । उनकी नजरों से तुम बचकर रहना। तुम पर यदि उनकी नजर पड गयी तो हो सकता है तुमको अपने वश में कर लें । वैसे भी चिमटा बाबा अपने आश्रम से बाहर एक दो रात से ज्यादा नहीं रुकते हैं। अब मैं इस इलाके में तभी आऊंगा जब चिमटा बाबा प्रस्थान कर जाएंगे। और तुम भी सचेत रहना ।

चिमटा बाबा का भव्य स्वागत हुआ और उनको ठहरने के लिए गेस्ट रुम को विशेष रूप से तैयार किया गया था। जिस जगह पर वो तांत्रिक अनुष्ठान करते हैं उस घर का बना अन्न नहीं खाते हैं।केवल फल और दूध ही लेंगे। लेकिन उनके सहयोगी मुक्तानंद जी का ऐसा कोई परहेज नहीं था। दोपहर को विश्राम करने के बाद चिमटा बाबा ने पूरे घर का मुआयना किया । फिर दरवाजे पर लटके प्रेतरोधक पोटली को हटा दिया। रात को नव बजे से चिमटा बाबा ने उस रूम में पूजा शुरू कर दिया जिसमें कलश रखा हुआ था और अखंड ज्योति जल रही थी। उन्होंने एक बिशेष ज्यामितीय आकर का हवन कुंड बनवाया ।ऐसा लग रहा था एक संबाहु त्रिभुज के ऊपर दूसरा संबाहु त्रिभुज उलटकर रखा हो।उसके छह सिरे पर हरी निम्बू के ऊपर हल्दी, सिंदूर और काली तिल रखा हुआ था। कुंड में अग्नि प्रज्वलित करने के लिए अखंड ज्योति से अग्निशिखा लेकर उसे बुझा दिया गया। कलश में से एक लोटा पानी निकाल कर अलग रख लिया गया था।शेष कलश के जल से राधा की माँ को स्नान करके वहां बैठना था।

अनुष्ठान शुरू होने बाद किसी को भी उधर आने की मनाही थी। उस कमरे में सिर्फ दुष्यंत बाबू उनकी पत्नी और चिमटा बाबा एवं उनके सहयोगी ही थे। दुष्यंत बाबू और उनकी पत्नी को उन्होंने कहा यहाँ पर कुछ भी भयानक या अजीबोगरीब दिखा तो डरने की आवश्यकता नहीं है। आपलोग अपने आसन से उठना मत, आपलोगों को कुछ भी नहीं होगा।

पूजा प्रारम्भ हुई । चिमटा बाबा आँख बंद करके कुछ बुदबुदा रहे थे ।बीच बीच में उनके इशारे पर तीनों लोग अपने पास रखी हवन सामग्री उस कुंड में डाल रहे थे। लगभग तीन घंटे बाद वहाँ रखी प्रत्येक वस्तु हिलने लगी ।लग रहा था जैसे भूकम्प आ गया हो। बाबा जोर से मंत्र पढ़ रहे थे और मुक्तानंद जी ने इन दोनों को इसारा किया कि हिम्मत रखो डरने की जरूरत नहीं है । बाबा हैं न !

थोड़ी देर बाद जहाँ पहले कलश था वो जगह ऊपर उठने लगी ।लगने लगा जैसे जमीन को चोट लगी हो और टेटन निकल गया हो। धीरे धीरे टेटन बढ़ता गया और फट गया। उसके बाद जो दिखा उससे दुष्यन्त दंपति के होश उड़ गए।

जमीन के अंदर से एक पीतल का घड़ा धीरे धीरे बाहर निकल रहा था और कमरे का तापमान सर्द होते जा रहा था। जब घड़ा पूरी तरह बाहर आया तो उससे लिपटा एक पाँच फन वाला नाग बाहर आया। बाहर आते ही नाग ने फन खोल दिया और वहां बैठे सभी व्यक्ति को घूरने लगा। उसकी लपलपाती जीभ और शी शी के आवाज से सबके अंदर कंपकंपी होने लगी चिमटा बाबा को छोड़कर।उनका आँख अभी भी बंद था और मंत्रोचार जारी था। थोड़ी देर में उन्होंने नेत्र खोल और नागराज से आँख मिलाकर कुछ बुदबुदाया। उनसे नजर मिलते ही नाग एकदम शांत हो गया। उनका इसारा पाते ही वह घड़ा पर से उतरकर हवनकुंड के पास आ गया। वहीं कुंडली मारकर और फन उठाकर बैठ गया। इतने विशाल और भयंकर नाग को अपने इतने करीब देखकर राधा के माता-पिता का शरीर पसीने से लथपथ हो गया। उनका तो मानो खून ही सुख गया हो और हिलने डुलने की क्षमता भी खत्म हो गयी हो। लेकिन चिमटा बाबा अविचलित उसके आँख में आँख डालकर जैसे उससे संवाद कर रहे हों। फिर उसके फन पर सफेद तिल डाला और अपने कमंडल से पानी लेकर उसके ऊपर छिड़का। उसके बाद वह डरावना नाग रेंगता हुआ उनके पैरों में लोट गया । मानो उनको नमस्कार कर रहा हो। उन्होंने उसके फन को सहलाया जैसे उसको आशीर्वाद दे रहे हों । उसके बाद प्लेट में रखी पांच सुपारी को उसके पांचों फन पर स्पर्श कराकर अपने माथे से लगाया और वापस प्लेट में रख दिया।उस प्लेट को जब उन्होंने उसके सामने बढ़ाया तो नाग ने उसको चाटा और शांत बैठ गया। उसके बाद चिमटा बाबा ध्यानमग्न हो गए ।थोड़ी देर बाद नाग को बोला इस स्त्री को मुक्त करो और उस घडे का ढक्कन खोलकर मुक्त करो फिर मैं तुम्हारी बात को मान्य करूँगा। नाग वहाँ से चलकर राधा के माँ के बाएं पैर से रेंगते हुए सर पर गया और दाहिने पैर से रेंगकर उतर गया। इस प्रक्रिया के दौरान राधा की माँ को लगभग काठ मार गया। नाग वहाँ से चलकर घड़ा के पास पहुँचा और उसके ढक्कन को खोलकर पलट दिया। वह घड़ा हीरे जवाहरात और स्वर्णमुद्रा से भरा था जो उस कमरे में बिखर गया। उस अकूट धनराशि को देखकर सभी की आँखे फटी की फटी रह गई। किसी को अपनी आँख पर भरोसा नहीं हो रहा था।फिर वह नाग उसके ऊपर से रेंगता हुआ आकर चिमटा बाबा के चरणों मे लोट गया।चिमटा बाबा ने उसके फन को अपने हाथ से सहलाया और चिमटा को उसके पूरे शरीर पर घुमाते हुए पूछा अपनी इच्छा बताओ। नाग उनके गोद में सर रख कर पड़ा रहा।चिमटा बाबा आँख बंद करके उसके फन को सहलाते रहे।फिर उन्होंने कहा "तुम्हारे सामने दो विकल्प है । मेरे साथ आश्रम में चलो तुमको वहाँ उचित स्थान देकर स्थापित कर दूँगा या चाहो तो इस योनि से मुक्ति भी दिला सकता हूँ।"

वह नाग अपना फन निकालकर उनके चरणों में बार बार रगड़ने लगा।मानो उनसे मुक्ति का आग्रह कर रहा हो। फिर चिमटा बाबा ने अपने थैले से एक चीती कौड़ी निकाला और उसके फन से घुमाकर हवा में उछाल दिया और वह चीती कौड़ी उपर हवा में गायब हो गया। फिर उन्होंने बड़े प्यार से नाग को उठाया और उस कुंड में ऐसे छोड़ा जैसे उसकी आहुति दे रहे हों।वह विशालकाय नाग उस छोटे से हवन कुंड में समा गया। दुष्यंत दंपति को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो राह था कि इतना बड़ा नाग उस छोटे से हवनकुंड में कहाँ समा गया। उसके बाद फिर चिमटा बाबा ध्यानमग्न हो गए। इसके बाद उनके शिष्य मुक्तानंद जी ने राधा की माँ और पिता जी को वहाँ से प्रस्थान करने को कहा।

दुष्यंत जी ने उत्सुकतावश उनसे पूछा कि "यह सब हिरे जवाहरात और स्वर्ण मुद्राऐं वास्तविक हैं या भ्रम है?"

मुक्तानंद ने कहा "यह सारी संपत्ति एक वास्तविकता है और उसको बाबा अपने तंत्र साधना से परिशुद्ध करके व्यवहार में लाने योग्य बना रहे हैं ताकि भविष्य में यह सब जिसके पास रहे उसका अनिष्ट ना हो। बाबा को यहाँ पर एकांतध्यान में छोड़कर हमलोग बाहर चलते हैं।अब यहाँ पर जो कुछ भी होगा उसको तंत्रसाधक ही झेल सकता है। यह आम मानवीय के बस की बात नहीं है। हमलोग बाहर से इस कमरे पर ताला जड़ देंगे। बाबा का जब आदेश होगा तब हम अंदर प्रवेश करेंगे।"

बाबा के चमत्कार का साक्षात दर्शन कर चुके दुष्यंत बाबू ने बिना कोई और प्रश्न किए मुक्तानंद के साथ बाहर बाहर निकल गए और उस कमरे के दरवाजे पर ताला लगा दिया गया।

उधर प्रेतरोधक पोटली के हटते ही छिपकिली वहां से गायब हो गयी। वह खबरी कौआ भी कहीं नजर नहीं आ रहा था। यह देख अकाय सत्यम अपनी बछिया माँ से गले मिलने की उत्सुकता और लोभ के चलते घर के अंदर प्रवेश करने से खुद को नहीं रोक पाया।वह बिना किसी अवरोध के घर के अंदर दाखिल हो गया। उसने अपनी बछिया माँ को बहुत लाड़ प्यार किया। फिर यह जानने की इच्छा से उस कमरे के पास पहुँच गया जिसमे चिमटा बाबा अपना अनुष्ठान कर रहे थे। उसने बाहर से वो सबकुछ देखा जो वहाँ पर हुआ।यह सब उसके लिए अकल्पनीय था। जब वह जिंदा था तो सुना था की किसी किसी को जमीन में गड़ा खजाना मिल गया और वह रातों रात अमीर हो गया । लेकिन कभी भी इस तरह की घटना का वह चश्मदीद नहीं था या किसी प्रमाणिक व्यक्ति से मिला नहीं था। उसने अपनी माँ के जुबानी सुना था कि उसकी नानी की चाची को चांदी के सिक्के से भरा गगरा मिला था। उसपर यकीन तो नहीं होता था लेकिन माँ के नाना और उनके भाई की आर्थिक स्थिति के अंतर को देखकर लगता था कि ऐसा कुछ हुआ होगा। लेकिन इस घटना को देखकर यकीन हो गया कि यह संभव है। अकाय रूप में अबतक उसने जो अनुभव किया है उससे उसको यह भरोसा हो गया कि दृश्य दुनिया से अदृश्य दुनिया ज्यादा रहस्यमयी और रोमांचकारी है।

वह ध्यानमग्न चिमटा बाबा को छुपकर निहार रहा था।कुछ देर बाद जब बाबा ध्यानमुद्रा से बाहर आए तो बेचैन दिख रहे थे। उन्होंने चारो तरफ नजर घुमाया लेकिन कुछ नजर नहीं आया। लेकिन उनको एक अनजान भूतात्मा की उपस्थिति का भान हुआ। यह उनके लिए चिंता का बिषय था ।क्योंकि उन्होंने घर में प्रवेश करने के बाद सभी नकारात्मक शक्तियों का संधान कर लिया था। यह कैसे बचा रह गया और कौन है? उसकी मंशा क्या है ?

उन्होंने पुनः ध्यान लगाया और तुरंत अकाय सत्यम से उनका संपर्क स्थापित हो गया। उन्होंने उसको कहा तुम यहाँ से बचकर भागने का प्रयास मत करना। तुम अपना परिचय दो और यहाँ आने का उद्देश्य बताना। मेरे से किसी भी प्रकार की चालाकी करने की कोशिश मत करना। सत्यम वहाँ से चुपके से निकलने का सोंचा लेकिन वह टस से मस नहीं हो पाया। उसको यह समझ मे आ गया कि चिमटा बाबा के गिरफ्त से निकलना आसान नहीं है। इसलिए उसने अपना पूर्ण परिचय और उद्देश्य बता दिया।

चिमटा बाबा को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह यमदूत के सीधे संपर्क में है और जब चाहे किसी के भी शरीर मे अपनी मर्जी से प्रवेश कर सकता है। चिमटा बाबा के लिए यह आत्मा कमरे में बिखरे हीरे जवाहरात से भी कीमती है। उन्होंने कहा तुम स्वयं मेरे सामने आ जावो यदि मैंने तुझे ढूंढ लिया तो तुमको भारी पड़ सकता है। मैंने तुमसे संपर्क स्थापित कर लिया है तो तुम तक पहुँच भी सकता हूँ।

यह मानसिक संवाद चल रहा था लेकिन चिमटा बाबा उसको लोकेट नहीं कर पा रहे थे । यह बात उनको परेशान कर रही थी । इधर सत्यम सोंच रहा था कि इस संकट की घड़ी में उसको यमदूत को बुलाना चाहिए या नहीं।यदि उनको बुलाया तो उनका चिमटा बाबा से अनावश्यक टकराव हो सकता है। चिमटा बाबा अपनी जगह पर सही हैं और लोगों का कल्याण कर रहे हैं। लेकिन गलत तो मैं भी नहीं हूँ। आखिर उनका गुलाम बनकर रहना भी कोई समझदारी नहीं होगी। उसके चारों तरफ एक असह्य ऊर्जा का घेरा बनता जा रहा था। उस ऊर्जा पुंज से खुद को बचा पाना उसको कठिन लग रहा था। उन ऊर्जा तरंगों को संभवतः चिमटा बाबा ही भेज रहे थे। तभी उसके सामने यमदूत प्रगट हो गए। सत्यम ने उनका आह्वान नहीं किया था। उसको सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि आज पहली बार वो बिना बुलाए स्वयं उपस्थित हुए थे। उसने उनको प्रणाम किया । यमराज ने प्रत्युत्तर में उसको कहा कि अब तुम्हारी आत्मा का यहाँ से प्रस्थान का समय हो गया है। तुम्हारा बुलावा आ गया है।

उसने चिमटा बाबा वाली बात उनको बताया।यमदूत ने कहा तुम उसकी चिंता मत करो । उनकी आत्मा के भी प्रस्थान का समय तत्काल ही है। फिर उन्होंने अपने बाएं हाथ पर लगे डिस्प्ले यंत्र पर कुछ वर्चुअल बटन को दबाया और सत्यम की आत्म ट्रांसमिट हो गयी ।उसके तत्पश्चात चिमटा बाबा की आत्मा को भी यमदूत ने ट्रांसमिट कर दिया।

जब सुबह के नव बजे तक मुक्तानंद को कोई संदेश नहीं मिला तो उन्होंने दुष्यंत जी से ताला खोलने को कहा। अंदर हीरे जवाहरात और स्वर्णमुद्राएँ बिखरी पड़ी थीं और चिमटा बाबा का निष्प्राण शरीर जमीन पर लुढ़का पड़ा था।


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