STORYMIRROR

Dr Manisha Sharma

Tragedy

3  

Dr Manisha Sharma

Tragedy

वटवृक्ष

वटवृक्ष

1 min
292

बरसों से सड़क के बीचोंबीच शान से खड़ा

वो वटवृक्ष

नवयुग के विस्तार की बलि चढ़ाया जाने वाला था


और उसकी बाहों में पली बढ़ी

वो अनगिनत सोनचिरैया

घूम घूम कर कलरव कर

मानो लड़ रहीं थीं उसे बचाने को


पर ख़ंजर उसके सीने में घोंप दिया गया

उन्हीं के हाथों

जिनके कुनबे बैठे थे ना जाने कितनी बार

उसकी छाया में


वो वटवृक्ष गिर पड़ा

इसलिये नहीं कि ख़ंजर नुकीले थे

इसलिए कि वटवृक्ष मान चुका था हार

इंसानी रिश्तों की मानिंद।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy