उस सुबह की याद
उस सुबह की याद
दूर कहीं जब दिन उगता है,
चिड़िया चहचहायें,
सुरमई भोर का उजाला फूटे,
जो धीरे- धीरे गुलाबी बन जाये,
तो मन गुनगुना उठता है
सुबह का दृश्य मनोरम
ताजगी भर देता है
नये सपने बुन देता है।
पर यहॉं आज इस महानगरी में,
न भोर का धुँधलका,
न चिड़ियों की चहचहाहटें।
दूर तक फैली बस,
बल्बों की रोशनियॉं,
रात के सन्नाटे के स्वर को तोड़तीं
श्वानों की आवाज़ें,
या सीटी की आवाज़ें।
ट्रेन की गड़गड़ाहट,
प्लेन की आवाज़ें,
कारों की घरघराहट,
ठण्डी हवा के झोंके,
यहॉं न पता चल पायेगा
भोर के उजाले का,
नियोन की, वेपर लैम्प की रोशनी
बस धीमी पड़ती जायेंगी।
जिस उषा की प्रतीक्षा में,
बैठी हो तुम,
वह यहॉं न होगी।
बस दिन का उजाला ही होगा,
जो टिमटिमाती रोशनियों को ढक देगा।
स्कूटर, ट्रक, बस की आवाजें
आवाजें ही आवाज़ें
कितनी आवाजें !
मेरा एकान्त यहॉं कहॉं होगा ?
मैं एकाकी
इस सब से दूर
अपनें ख्यालों में खोई
अपने में डूबी सी
इसमें लिप्त न हो पाऊँगी
खोजती रहूँगी
अपनी उस सुबह को।
जो कभी खुले मैदान में
नदी किनारे,
धीरे से उठता देखा था
सिंदूरी घेरा वह,
उषा की मॉंग की लाली वह,
मार्तण्ड का बाल रूप वह,
अँशुमाली का अरुण मुख वह,
फूटती सुबह की मादक अरुणिमा।
