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Goldi Mishra

Drama Tragedy

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Goldi Mishra

Drama Tragedy

उधारी

उधारी

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उधारी 

काम पड़े है कई,
गीत पूरे करने है कई,
न जाने चित किस ओर लगा,
पल में रागिनी पल में सहर हो गया,
अभी ना भाये ये रंग,
कभी जो मेरे थे रंग,
आज से दूर मैं कल की खोज में,
संयम को थामे मैं अपनी ही तलाश में,
पहेली वो अधूरी छोड़ दी,
गलियों में न जाने मैंने कौनसी याद खो दी,
अंधाधुन एक सफ़र हो मानो,
इस भीड़ से दूर जा रूठा कोई पीर हो मानो,
कोई शहरी चकाचौंध से भागो हो मानो,
सिलवटें ये शिकन अब हर रोज़ की है,
हार और जीत जीवन बस यही है,
समझने की आस लिए बेसमझ बन चले है,
उचित अनुचित के विवाद में मौन हो चले है,
अंतिम भले ही इच्छा हर रख दी,
एक आस है बस की सवेर फिर होगी,
रात हमने अपनी गिरवी रख दी,
सब्र हर कर अब जिज्ञासा को चुप्पी दे दी,

– गोल्डी मिश्रा 





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