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Goldi Mishra

Drama Tragedy

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Goldi Mishra

Drama Tragedy

स्वलेख

स्वलेख

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स्वलेख 

भीड़ में खुद को तलाशना,
खुद से रूठ कर खुद ही खुद को मनाना,
कदम पड़े हैं जहाँ,
रास्ते ठहरे हैं वहां,
ना जाने किस ओर निकल आए,
यहां लहरों से रूठे किनारे नज़र आए,

कभी ना हारने का हौसला,
कभी खुद से ही हार जाना,
आज से दूर किसी कल में,
बेघर सा कोई अजनबियों में,
पहेलियों-सा यह जीवन,
हर उत्तर में नया प्रश्न,


अंधेरे से डरकर उजाले की चाह,
उजाले में फिर सायों की तलाश,
हर रोज़ समेटी है सपनों की गिरहें,
हर रात टूटती विश्वासों की सिलवटें,

समझौते की उम्र लिखी हथेली पर,
ख़्वाहिशें दब गईं ज़िम्मेदारियों के साये में,
अपनी ही अनुभूति से द्वंद्व,
अंत को लिखने की बेचैनी में हो जैसे लेखक,

कोई शिकायत नहीं,
यह संदर्भ रहित लेख है,
हर शब्द मेरा, हर भाव मेरा,
यही तो मेरा स्वलेख है,

– गोल्डी मिश्रा 



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