मज़हबी इंसानियत
मज़हबी इंसानियत
मज़हबी इंसानियत
कतरा कतरा बिखरी इंसानियत,
मैं मिटा दूंगी रंग संतरी,
तुम भी राख कर देना हर चादर हरी,
सियासी चूल्हे पर चढ़ी एक नई सियासत,
मज़हबी चोला पहने दिखी इंसानियत,
ज़मीं जहां राष्ट्रीयता के परचम थे कभी,
टुकड़ों में बिखरी है वही सरजमीं
तनाव, आद्रता और शिकन,
खून से हो रहा अखबार का चित्रण,
मैं न मुजबिर को जानूँ,
न मैं ऋतुराज को जानू,
दोनों ओर है उन्मुक्त गगन मैं बस यहीं जानू
किसने देदी मुझे परिभाषा तिलक और हिजाब की,
उसने क्यूं न लिखी एक नज़म इंसानियत की,
खाली बिल्कुल होकर,
खुद को मजहबी रास्तों से दूर कर,
नहीं मैं किसी मजहब का अगर यही जग चाहे,
मैं किस ईश्वर को मानू मुझे कोई बता दे,
गुजरेगी जरूर ये खून से सनी झीले मक्के और मदीने से,
पहुंचेगी चींखें मंदिर की हर मूर्त तक,
चुप ईश्वर है आज,
चीख रहा हर मजहब आज,
कितनी सस्ती बिक रही है सांसे सरे बाज़ार,
खामोश है धर्म के पुजारी और सियासी हकदार,
– गोल्डी मिश्रा
