सूर को बेसूरा मत कर
सूर को बेसूरा मत कर
प्यारसे तूझको मना रहा हूं मै,
कभी तो मेरी बातें सूनाकर,
राई का पर्वत बना रही हो तुम,
कभी तो मेरे बारेमें सोचाकर।
तेरी आदतोंसे तंग हो गया हूं मै,
अब तो तमाशा बंध किया कर,
तुझसे बहोत नाराज हुआ हूं मै,
कभी तो मेरे प्यार को समजाकर।
ख्वाब सब पूरा कर रहा हूं मै,
कभी तो प्यारसे मुस्कुराया कर,
तेरे ही खयालोंमें डूबा रहेता हूं मै,
कभी तो मेरे दिलमें झांखाकर।
तेरे हंगामे से थक गया हूं मे,
कभी तो मधुर स्वर बहाया कर,
प्रेम संगीत का साधक हूं मुरली",
प्रेम के सूर को बेसूरा मत कर।
