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AVINASH KUMAR

Romance Tragedy

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AVINASH KUMAR

Romance Tragedy

मैं किस रूप में पाऊँ तुमको

मैं किस रूप में पाऊँ तुमको

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मैं तुम्हें तुम्हारे वास्तविक रूप में नहीं पा सकता

हाँ मगर जिसने तुम्हें पाया है वो भी नहीं बता सकता

कि तुम्हारे रूप में इस धरा के अलग अलग गुण हैं

और वो सारे रूप तुम्हें वास्तव में दिखाने में निपुण हैं

तो मैं किस रूप में पाऊँ तुमको


मैं तुम्हें पवन की तरह छू लूँ क्या

तुम्हारे ख़्याल का एक झूला बनाकर उसपर झुलूँ क्या

कभी कभी जब तुम गुज़रती हो मेरे चेहरे को चूम कर

मुझे लगता है तुम हो और मैं देखता हूँ पीछे घूम कर

तुम तो नहीं मिलती मुझे मगर जाने क्यूँ महक जाता हूँ

मैं उस पवन के छूते ही एक पंछी सा चहक जाता हूँ

इसी तरह से उड़ती रहना तुम मेरे पास मेरा मन बनकर

तुम यूँ ही मिलती रहना मुझे पवन बनकर


या फिर मैं तुम्हें फूल की तरह चुरा लूँ

तुम्हारी महक को मैं अपनी रूह में महका लूँ

तुमसे ख़ुद को अपना कहलवाने का हक़ लूँ

या फिर अपनी ही लिखी हुई किताब में तुम्हें रख लूँ

तुम जब भी हँसती होगी तो सच में फूल खिलते होंगे

हम दोनों किसी की प्रेम कहानी में अब भी मिलते होंगे

तो यूँ ही संग चलती रहना कहानियों का सुकूँ बनकर

इसी तरह तुम मुझसे मिलती रहना खुशबू बनकर


तुम्हें नदी की तरह भी देख सकता हूँ मैं

तुम्हें हृदय में गंगा के पानी की तरह रखता हूँ मैं

तुमने सालों तक मुझे अपने प्रेम से भिगाया है

ये शब्दों का हुनर तुम्हारे प्रेम ने ही मुझे सिखाया है

एक नदी की तरह तुममें मैंने अपनी छवि पाई है

मैंने हर रात तेरी बहती यादों के किनारे बिताई है

तो यूँ मेरे साथ रहना मेरी यादों की कड़ी बनकर

इसी तरह तुम मुझसे मिलती रहना नदी बनकर


मगर जब मैंने जीवन को देखा एक हिसाब की तरह

इन सब के बाद तुम नज़र आईं एक किताब की तरह

जीवन भर साथ देती हैं किताबें इसलिए अच्छी होतीं हैं

जागती भी हैं मेरे साथ और मेरे सीने पर सर रख कर सोतीं हैं

मैं देर तक एक पन्ने पर रह सकता हूँ आगे भी बढ़ सकता हूँ

मैं उसको पन्ने पलट पलट कर कई बार पढ़ सकता हूँ

तो जब तक तुम कुछ नया न लिखो ख़ुद में सिमट कर 

मैं तुम्हें यूँ ही मिलता रहूँगा पन्ने पलट पलट कर....



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