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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Action Thriller

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Action Thriller

मुखौटा

मुखौटा

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सब इंसान के चेहरे पे नज़र आता है एक मुखौटा,
ज़ूठ की जय जयकार, जटिल बन गया है मुखौटा।

होंठों पर अल्फाज़ है सुंदर, हाथ में छुपा है खंजर,
एतबार करना मुश्किल है, चेहरे पे लगा है मुखोटा।

स्नेहभरे रिश्तों में भी, खुद को ढुंढता रहा है इंसान,
वक्त के साथ इंसान बदला, चेहरे पे लगा है मुखौटा।

दिखावे के अच्छे कर्म करे, चले शतरंज़ की चाल,
जहां देखो वहां षड्यंत्र है, चेहरे पर लगा है मुखौटा।

खुदा को भी छोडते नहीं, मतलब से झुकाया शीश,
कैसे कयामत होगी खुदा की, चेहरे पे लगा है मुखौटा।

सबको मुठ्ठी में रखकर, इंसान कर रहा जुल्म-सितम, मलिन मन हम कैसे पहचाने, चेहरे पे लगा है मुखौटा।

"मुरली" मन मंथन कर रहा है, मायूस हुआ है दिल,
क्या करे? किस को कहे? कौन हटाएगा ये मुखौटा।

 रचना:-धनजीभाई गढीया "मुरली" (जुनागढ़-गुजरात)


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