दर्पण
दर्पण
हर एक इंसान के चेहरे का सच बोलता है दर्पण,
नज़र से छुपी हुई बात को सामने लाता है दर्पण।
धमंड़ अगर आँख में आए तो जरुर सोच लेना तुम,
जिंदगी की सभी हक़ीक़तों से हमें जोड़ता है दर्पण।
दुनिया में अलग अलग चेहरे ले कर घुमते है लोग,
मगर नकली चेहरे के राज़ को खोल देता है दर्पण।
कभी खुशी की चमक है तो कभी ग़मों की लकीर,
हर इंसान के चेहरे के भाव अक्सर पढ़ता है दर्पण।
न कोई झूठ, न चालाकी, न धोखा खा है उसको ड़र,
कायम सत्य हकिकत को ही सामने लाता है दर्पण।
ख़ुद को अपने दिल में ढुंढो यह कह रहा है 'मुरली',
तुम्हारे चेहरे का असली रंग तुम्हे दिखायेगा दर्पण।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
