लालच
लालच
हर एक इंसान को दौलत की आज लालच है,
सुकून छिन गया है, बस जीत का ही लालच है।
जो प्राप्त हुआ है, उस से जरा भी संतोष नहीं,
न जाने क्यों उसको दिन रात नई लालच है।
किसी के दर्द से कोई मतलब नहीं रहा अब तो,
हर इंसान को सिर्फ अपने फ़ायदे की लालच है।
वो रिश्ते टूट गए, जिनमें आज प्यार ज़िंदा नहीं,
फिर भी कई दिलों को ज़ायदाद का लालच है।
नज़र कभी झुकी नहीं सच के मुक़ाम पर लेकिन,
आज सब को यहाँ झूठे अहंकार का लालच है।
जो अमीर है फिर भी खुशियाँ बाँट सकता नहीं,
'मुरली' फ़क़ीर वो है जिसको हर घड़ी लालच है।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
