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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Thriller

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Thriller

भ्रम

भ्रम

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भ्रम की जाल में आज उलझ रहा हूंँ मै,
सामने सत्य है, धोखा खाता रहा हूंँ मैं।

नज़र से जो देखा, वही सच मान लिया,
अब मन के गहरे मंथन में डूब रहा हूंँ मैंं।

 बदलते वक्त के साथ खुल रहे है राज़,
अपने को दूर जाते हुए देख रहा हूंँ मैं।

 ख्वाबों की दुनिया में भटकता रहता था,
सच्चाई के गहरे रहस्य में खो गया हूंँ मैं। 

भ्रम ने हमेशा बांधकर रखा था मुझको,
खुद को अब भीतर में खोज रहा हूंँ मैं।

 सच्चाई की किरनें जब दिखाई देने लगी,
'मुरली' भ्रम की जाल को तोड़ रहा हूंँ मै।

 रचना'-धनजीभाई गढीया"मुरली" (जनागढ) 


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