शिकवा
शिकवा
शिकवा तेरी मायूसी का छुपाता रहा हूँ सनम,
तन्हाईयां भरे दिल को मै समझा रहा हूंँ सनम।
मेरी हालत की दरकार तू करती ही नहीं कभी,
अब दर्द की आग में खाक बन रहा हूंँ सनम।
तेरे प्यार के ख्वाबों को मै देखता ही रह गया,
इस ख्वाबों का महल तूटता देख रहा हूंँ सनम।
तेरे मिलन से मेरी प्यार की बसंत खिल गई,
आज पतझड़ सी सुनसानी सह रहा हूंँ सनम।
जब से तू चली गई है तुझे ढुंढता रहा हूंँ मै,
शहर की गलियों में तुझे पुकार रहा हूँ सनम।
तेरा मेरा मिलना फिर से कभी होगा या नहीं,
फिर भी उम्मीदों के समंदर में डूब रहा हूंँ सनम।
शिकवा तो मेरे मन में बहुत भरे है ओ "मुरली",
जिंदगीभर तेरा ही इंतज़ार करता रहूंँगा सनम।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

