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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

अहंकार की आग

अहंकार की आग

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जलता रहा है इंसान, अहंकार की आग में,
खो रहा है स्नेह-प्रेम, अहंकार की आग में।

शीश उंचा रखकर, कभी न देखा किसी को,
नफरत करता रहा है, अहंकार की आग में।

मधुर वाणी बोलकर, न कभी प्यार से देखा,
अकडकर चल रहा है, अहंकार की आग में।ऐ
 
गुरु ज्ञान मिला फिर भी, वो न समझ पाया,
अज्ञानता में डूब रहा है, अहंकार की आग में।

सब को मुठ्ठी में रखकर, जुल्म भी करता रहा,
इंसानियत भी भूल गया, अहंकार की आग में।

घमंड में चूर बनकर, विनम्र कभी न बन पाया,
'मुरली' खाक बन गया, अहंकार की आग में।

 स्व रचित रचना:-
धनजीभाई गढीया 'मुरली' (गुजरात-जुनागढ़)


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