ये कैसा बंधन है?
ये कैसा बंधन है?
ना हमसे कुछ कहते हैं, न हम उनसे कुछ कहते हैं,
फिर भी खामोशी इश्क के अफसाने बहते रहते हैं।
न जाने यह कैसा रिश्ता है, न कोई नाम है उसका,
फिर भी इश्क के धागे मे हम हर पल जुड़े रहते हैं।
न दूरी हमे रोक पाती है, न तो मजबूरी मिटा पाते है,
एक-दूजे के दिलों में हम दिन रात धड़कतें रहते हैं।
न शिकवा है, न कोई ग़म है, न कोई आरज़ू बाकी,
इश्क के इस सफ़र में हम हरपल उजाला फैलाते हैं।
कभी वो याद बनकर रात की तन्हाइयों में आती है,
तो आँखों में छुपे हुए जज़्बात मोती बनके बहते हैं।
"मुरली" ये कैसा बंधन है, न समझ पाई ये दुनिया,
न मिलते हैं, न बिछड़ते हैं, फिर भी दिल में रहते हैं।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

