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Goldi Mishra

Tragedy Inspirational

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Goldi Mishra

Tragedy Inspirational

मुल्क

मुल्क

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सरहद पर बैठा एक लेखक ये कह रहा है,

दोनों ओर एक ही रंग की रात है एक ही रंग का है सवेरा,।।

लकीर ने दो मुल्कों को बांट दिया,

सरहद ने बांटी ज़मीन पर आसमान ना बट सका,

विभाजन एक त्रासदी था,

खून से सनी उन दस्तानों की चीख था,

बांट दिए मुहल्ले और गलियारे पर कला कोई ना बांट सका,

गीत और राग को कहां कोई सरहद में रख सका,।।


सरहद पर बैठा एक लेखक ये कह रहा है,

दोनों ओर एक ही रंग की रात है एक ही रंग का है सवेरा,।।

इस ओर भी गूंजती है रागिनी,

नाचती है उस ओर भी बरखा की धुन पर मोरनी,

नीर भी है एक सा सुख दुख भी एक से,

रंग भी ना परख सके ये भेद लिबास के,

उस ओर भी मीठी है चाशनी,

इस ओर भी ओढ़नी में समाई है सादगी,।।


सरहद पर बैठा एक लेखक ये कह रहा है,

दोनों ओर एक ही रंग की रात है एक ही रंग का है सवेरा,।।

साहित्य ना कैद रह सका किसी रेखा किसी सरहद में,

कलम कहां कर सकी भेद कवि की जात में,

मैं देखता हूं इस ओर भी हैं होंठों पर एक सी मुस्कुराहटें,

मैंने देखा उस ओर भी है एक जैसी रवायतें,

इस ओर भी खनकती हैं चूड़ियाँ,

उस ओर भी श्रृंगार पर खिल रही है सतरंगी चुनरियां,।।


सरहद पर बैठा एक लेखक ये कह रहा है,

दोनों ओर एक ही रंग की रात है एक ही रंग का है सवेरा,।।

सोचता हूं लिखूं आज विभाजन की दास्तां,

देखता हूं मैं की बिलखने लगा है पन्ना पन्ना,

मेरा ना कोई मज़हब ना मेरा कोई मुल्क था,

इन आंखों से मैंने इस जमीन को बंटते देखा था,

इसी सरहद पर मैंने सूरज को ढलते देखा,

दोनों ओर अंधेरे की काली चादर को फैलते देखा,।।



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