STORYMIRROR

Goldi Mishra

Tragedy

4  

Goldi Mishra

Tragedy

मर्द

मर्द

2 mins
260


मर्दानगी कहीं तुम्हारी महज़ एक सवाल ना बन जाए

औरत को कुचल कर कहां मर्द तुम कहलाए,

खैरात में नहीं मिलती आज़ादी इस समाज में,

हम औरतों ने कमाई है आज़ादी इस समाज से,

पर्दे को भूल जब हम अपनी तकदीर ख़ुद लिख रहे हैं,

ना जाने क्यूं कुछ मर्द इस हौसले को देख राख हो रहें हैं,


इस पितृसत्तात्मक समाज ने सदैव हमे ही संभलना सिखाया,

एक सवाल हैं,आखिर क्यों नहीं मर्द को सही नज़रिए का पाठ पढ़ाया,

हमे पर्दा रखने को कहा,

और एक मर्द को एक औरत को सरेराह बेपर्दा करने का हक दे दिया,

एक लड़की का देर रात घर से बाहर रहना गलत,

फिर क्यूं लड़को के देर रात सैर सपाटो पर नही कोई दिक्कत,


अपनी आवाज़ में ज़रा नर्मी रखो तुम लड़की हो,

औरत को तेज़ आवाज़ में दबा कर रखो तुम पति हो,

ये कैसी मर्दानगी जो औरत को दबा कर रखने में हैं,

ये कैसे मर्द हैं समाज के जो लड़की को झुलसता देख कर चुप हैं,

समाज में शायद हमें जगह मिले न मिले,

पर इन मर्दों की गालियों में हम सदैव समहित थे,


ना थमे हैं अत्याचार,

ना शायद थमेंगे,

ना जानें कब खुले आसमान हमारे हिस्से होगें,

ना जाने कब ये मर्द,मर्द होने की सही परिभाषा समझेंगे,

क्या हैं वास्तव में मर्दानगी ,

क्या औरत के पंख काट कर उसे पिंजरे का कर देने में हैं मर्दानगी,

दुआ है मेरी इस समाज में एक लड़की ना जन्मे,

महज़ पुरुष हो इस समाज में और युग का अंत देखे।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy