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Ajay Singla

Classics

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श्रीमद्भागवत - १९३; भरतवंश का वर्णन, राजा रन्तिदेव की कथा

श्रीमद्भागवत - १९३; भरतवंश का वर्णन, राजा रन्तिदेव की कथा

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित

मन्यु वितथ ( भरद्वाज ) का पुत्र था

मन्यु के पांच पुत्र हुए

बृहत्क्षत्र, जय, महावीर्य, नर और गर्ग नाम उनका।


नर का पुत्र था संकृति 

दो पुत्र हुए संकृति के

एक का नाम गुरु था

दूसरे रन्तिदेव नाम के।


परीक्षित, निर्मल यश रन्तिदेव का

गाया जाता है लोक परलोक में

देववश प्राप्त हो जाती वास्तु जो

उपभोग करते वो बिना उद्योग के।


दिनोदिन पूंजी घटती जाती उनकी

मिलता जो दूसरों को दे देते

स्वयं वे भूखे रहते और

संग्रह -परिग्रह, ममता से रहित थे।


बड़े ही धैर्यशाली वे

कुटुम्भ के साथ दुःख भोग रहे थे

एक बार तो पानी पीने को भी न मिला

अड़तालीस दिन ऐसे ही बीत गए।


उन्चासवें दिन प्रातः काल ही

कुछ घी, खीर, हलवा और जल मिला

भूख और प्यास के मारे

परिवार उनका संकट में था।


परन्तु ज्यों ही उन लोगों ने

भोजन करना चाहा, त्यों ही

एक ब्राह्मण अतिथि के रूप में

पहुँच गया उनके पास वहीं।


सब में भगवान का दर्शन करें राजा

अतएव उन्होंने बड़ी श्रद्धा से

ब्राह्मण को भोजन कराया

उसी अन्न में से, जो मिला था उन्हें।


ब्राह्मण देवता भोजन कर चले गए

बचे अन्न को आपस में बाँट लिया

भोजन करना चाहा था, उसी समय

दूसरा शूद्र अतिथि आ गया।


भगवान का स्मरण करते हुए

कुछ भाग बचे हुए अन्न का

शूद्र के रूप में आये

अतिथि को उन्होंने खिला दिया।


शूद्र जब खा पीकर चला गया

तब एक और अतिथि आ गया

कुत्तों को वो साथ लिए था

आकर रन्तिदेव से उसने कहा।


राजन, मैं और मेरे कुत्ते ये

भूखे हैं, बहुत दिनों से

याचना करने लगा वो

हमें कुछ खाने को दीजिये।


रन्तिदेव ने आदर भाव से

बचा हुआ सब उसे दे दिया

कुत्तों के स्वामी के रूप में

अपने प्रभु को नमस्कार किया।


अब केवल जल ही बचा था

एक मनुष्य के पीने भर का

आपस में बाँट पीना वो चाह रहे

तभी एक चांडाल आ पहुंचा।


उसने कहा, मैं अत्यंत नीच हूँ

जल पिला दीजिये आप मुझे

उसकी करुणापूर्ण वाणी से

रन्तिदेव दया से संतप्त हो गए।


ये अमृत वचन कहते कि 

भगवान से चाहता मैं परमगति नहीं

मोक्ष की भी कामना न करूं 

चाहता हूँ मैं बस यही।


कि सम्पूर्ण प्राणियों के दुःख सहन करूँ

उनके हृदय में स्थित हो

जिससे कि किसी भी प्राणी को

किसी तरह का भी दुःख न हो।


जल दे देने से इस प्राणी के

जीवन की रक्षा हो गयी

अब मैं सुखी हो गया और मेरी

भूख प्यास की पीड़ा जाती रही।


ऐसा कहकर रन्तिदेव ने

बचा हुआ जल दे दिया उसे

परीक्षित ये अतिथि वास्तव में

भगवान की माया के रूप थे।


परीक्षा पूरी होने पर वहां

ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रकट हुए

रन्तिदेव ने चरणों में पड़कर

नमस्कार किया था उन्हें।


कुछ भी नहीं चाहिए था उन्हें 

इसलिए माँगा नहीं था कुछ भी

मन को तन्मय किया वासुदेव में

भगवान के सिवा कुछ इच्छा भी नहीं।


रन्तिदेव के अनुयायी भी उनके

संग के प्रभाव से योगी हो गए

और परम भक्त बन गए

भगवान के आश्रित होकर वे।


मन्युपुत्र गर्ग से शिनि और

शिनि से गार्ग्य का जन्म हुआ

यद्यपि गार्ग्य क्षत्रिय थे

फिर भी उनसे ब्राह्मणवंश चला।


महावीर्य का पुत्र दुरितक्षय 

उसके तीन पुत्र हुए थे

त्रय्यारुणि, कवी और पुष्करारुणि 

ये तीनों भी ब्राह्मण हो गए।


बृहत्क्षत्र का पुत्र हुआ हस्ति

हस्तिनापुर बसाया था उसी ने

अजमीढ़, द्विमीढ़ और पुरुमीढ़

हस्ति के ये तीन पुत्र थे।


प्रियमेघ अदि ब्राह्मण हुए

अजमीढ़ के पुत्रों में

बृहदिषु नाम का एक और

पुत्र भी था इन्हीं अजमीढ़ के।


बृहदिषु का पुत्र बृहद्धनु हुआ

उसका बृहत्काय, उसका जयद्रथ हुआ

जयद्रथ का पुत्र विशाद और

सेनजीत पुत्र विशाद का।


रुचिराशव , दृढहनु, काश्य और वत्स

चार पुत्र ये सेनजीत के

रुचिराशव का पुत्र पार था

पार के पुत्र पृथुसेन थे।


पार का दूसरा पुत्र नीप था

सौ पुत्र हुए थे उसके

 ( छाया ) शुक की कन्या कृत्वी ने

विवाह किया था इसी नीप से।


उसके ब्रह्मदत्त नामक पुत्र हुआ

ब्रह्मदत्त बड़ा योगी था

अपनी पत्नी सरस्वती के गर्भ से

विष्वक्सेन को उसने उत्पन्न किया।


योगशास्त्र की रक्षा की थी

विष्वक्सेन ने जैगीषव्य के उपदेश से

विश्वसेन के उदकस्वान, उनके भल्लाद

बृहदिषु के ये सब वंशज हुए।


द्विमीढ़ का पुत्र था यवीनर 

उसका कृतिमान, उसका सत्यधृति था

सत्यकृति का दृढ़नेमी और

दृढ़नेमी का सुपाशर्व हुआ।


सुपाशर्व का सुमति, उसके संतिमान

कृति का जनम संतिमान से

योग विद्या फिर उसने

प्राप्त करके हिरण्यनाभ से।


प्राच्स्मास नामक ऋचाओं की 

छ संहिताएं कही थी उन्होंने

कृति का पुत्र नीप था

अग्रायुध हुआ नीप से।


अगरयुद्ध का क्षेम्य, उसका सुवीर

सुवीर का संजय, उसका बहुरथ था

देवमीढ़ के भाई पुरुमीढ़ के

हुई कोई भी संतान न।


अजमीढ़ की पत्नी नलिनी से नील हुआ

नील का शांति, सुशांती उसका

सुशांति का पुरु, पुरु का अर्क 

भमरयाशव अर्क का पुत्र था।


मुदगल, यवीनर, बृहदिषु, काम्पिल्य और संजय 

पांच पुत्र थे भमरयाशव के

उसने कहा' ये मेरे पुत्र

पांच देशों का शासन करेंगे।


ये समर्थ ( पांच आलम ) हैं

इसलिए प्रसिद्द हुए पांचाल नाम से

 मोदगल नामक ब्राह्मण गोत्र की

प्रवृति हुई इनमें से मुदगल से।


मुदगल से जुड़वां संतान हुई

पुत्र का नाम दिवोदास था उनमें

कन्या का नाम अहल्या

विवाह हुआ महर्षि गौतम से।


गौतम के पुत्र शतानन्द थे

शतावर का पुत्र सत्यघृति हुआ

अत्यंत निपुण वह धनुर्विद्या में

शारद्वान पुत्र सत्यघृति का।


उर्वशी को देखने से एक दिन

मूँज के एक झाड़ पर 

शारद्वान का वीर्य गिर गया

जिससे एक पुत्री और हुआ एक पुत्र।


महाराज शन्तनु वहां पर

शिकार खेलने के लिए गए थे

उनकी नजर पड़ी थी उनपर

दयावश उनको साथ ले गए।


उनमें से पुत्र कृपाचार्य हुए

और जो कन्या उनमें थी

उसका नाम कृपी हुआ और

 द्रोणाचार्य की वो पत्नी हुईं।



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