अगले जन्म mein
अगले जन्म mein
अगले जन्म में ….
इस बार मानुष तन पायो
बनना चाहूँ क्या अगले जन्म में
और भी कुछ सुन्दर बनूँ मैं
ये इच्छा है मेरे मन में ।
हरी घास तालाब किनारे
पवन झुलाए झूला जिसको
बारिश की मदमस्त फुहारें
माटी की सुगंध दें मुझको ।
या बन जाऊँ नीर नदी का
बहता रहूँ सदा उसके संग
सागर के पानी में मिलकर
हो जाऊँ गहरा नीला रंग ।
पक्षी बन उड़ूँ नील गगन में
सुन्दर सतरंगी मेरी छटा
एक मधुर गीत छेड़ दूँ
आकाश में जब छाए काली घटा ।
बारिश की एक बूँद बनूँ तो
छल छल कल कल गिरूँ आकाश से
सीप के मुख में गिरकर मैं
निकलूँ फिर एक मोती बनके ।
काली घटा बन सूर्य को ढक लूँ
गरजूँ और चमकूँ बिजली सी
तर कर दूँ पृथ्वी को जल से
आग़ाज़ करूँ वर्षा ऋतु की ।
समंदर की लहरें बनकर मैं
बच्चों के मन को भरमाऊँ
आपस में ही टकराऊँ फिर
तीर पे आकर लीन हो जाऊँ ।
हरिण बन जंगल में दौड़ूँ
मस्त रहूँ अपनी ही धुन में
झुंड बनाकर चरूँ घास मैं
स्वच्छंद विचरूँ सघन एक वन में ।
अगर प्रभु कृपा करें तो
आऊँ सुन्दर वृक्ष मैं बनकर
फल और फूल से लदा रहूँ सदा
पक्षी घर बनाएँ मुझपर ।
कैलाश पर्वत की चोटी बन जाऊँ
रहें जहाँ शंकर त्रिपुरारी
भय ना कोई ना कष्ट वहाँपर
नंदी सदा करते रखवारी ।
क्या मेरे भाग्य में है कि
वृंदावन की रज बन जाऊँ
मस्तक पर शोभायमान हो
भक्तों का तिलक कहलाऊँ ।
पुष्प बनकर खिलूँ कमल का
एक अभिलाषा मेरी ये है
हरि भजन सुनता हुआ सदा
चरणों में प्रभु के पड़ा रहूँ मैं ।
कहते हैं प्रभु कण कण में हैं
आऊँगा जिस भी रूप में
उनका ही एक अंश रहूँगा
सृष्टि-चक्र यही युगों युगों से ।
अजय सिंगला
