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Ajay Singla

Thriller

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Ajay Singla

Thriller

अगले जन्म mein

अगले जन्म mein

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अगले जन्म में ….


इस बार मानुष तन पायो 

बनना चाहूँ क्या अगले जन्म में 

और भी कुछ सुन्दर बनूँ मैं 

ये इच्छा है मेरे मन में ।


हरी घास तालाब किनारे 

पवन झुलाए झूला जिसको 

बारिश की मदमस्त फुहारें 

माटी की सुगंध दें मुझको ।


या बन जाऊँ नीर नदी का 

बहता रहूँ सदा उसके संग 

सागर के पानी में मिलकर 

हो जाऊँ गहरा नीला रंग ।


पक्षी बन उड़ूँ नील गगन में 

सुन्दर सतरंगी मेरी छटा 

एक मधुर गीत छेड़ दूँ 

आकाश में जब छाए काली घटा ।


बारिश की एक बूँद बनूँ तो 

छल छल कल कल गिरूँ आकाश से 

सीप के मुख में गिरकर मैं 

निकलूँ फिर एक मोती बनके ।


काली घटा बन सूर्य को ढक लूँ 

गरजूँ और चमकूँ बिजली सी 

तर कर दूँ पृथ्वी को जल से 

आग़ाज़ करूँ वर्षा ऋतु की ।


समंदर की लहरें बनकर मैं 

बच्चों के मन को भरमाऊँ 

आपस में ही टकराऊँ फिर

तीर पे आकर लीन हो जाऊँ ।


हरिण बन जंगल में दौड़ूँ 

मस्त रहूँ अपनी ही धुन में 

झुंड बनाकर चरूँ घास मैं 

स्वच्छंद विचरूँ सघन एक वन में ।


अगर प्रभु कृपा करें तो

आऊँ सुन्दर वृक्ष मैं बनकर 

फल और फूल से लदा रहूँ सदा 

पक्षी घर बनाएँ मुझपर ।


कैलाश पर्वत की चोटी बन जाऊँ 

रहें जहाँ शंकर त्रिपुरारी 

भय ना कोई ना कष्ट वहाँपर 

नंदी सदा करते रखवारी ।


क्या मेरे भाग्य में है कि 

वृंदावन की रज बन जाऊँ 

मस्तक पर शोभायमान हो 

भक्तों का तिलक कहलाऊँ ।


पुष्प बनकर खिलूँ कमल का 

एक अभिलाषा मेरी ये है 

हरि भजन सुनता हुआ सदा 

चरणों में प्रभु के पड़ा रहूँ मैं ।


कहते हैं प्रभु कण कण में हैं 

आऊँगा जिस भी रूप में 

उनका ही एक अंश रहूँगा 

सृष्टि-चक्र यही युगों युगों से ।


अजय सिंगला


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