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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ

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मैं कौन हूँ 


क्या मैं एक नन्हा सा बालक

खेलता भाई बहनों के संग 

या पुत्र ममतामयी माँ का 

प्रेम लुटाता जिसका अंग अंग ।


सुंदर युवा हूँ मैं क्या ऐसा 

मित्रों संग जो करे हँसी ठिठोली 

प्रेम के रंग में रंगना चाहे सदा 

मीठी लगे जिसे प्यार की बोली ।


या मैं वो पति हूँ जिसकी 

पत्नी प्रेम से उसे खिलाए 

या वो पिता, अपने पुत्रों का 

पोषण जो करे, सही राह दिखाए ।


काल से वृद्ध हुआ क्या मैं हूँ 

सोच में पड़ा भूत, भविष्य की 

मृत्यु के भय से प्रभु को भजूँ, ताकि 

भावी जन्म में पाऊँ उत्तम गति ।


क्या बस यही सब कुछ ही हूँ मैं 

या एक परब्रह्म अविनाशी 

अंश सर्वव्यापी ईश्वर का या 

माया का जो प्रभु चरणों की दासी ।


स्वयं को अब तक ना समझ सका 

मुक्ति हो कैसे माया से जगत की 

पाना चाहता तुम परमपिता को पर 

ना जानूँ सही डगर भक्त की ।


कृपा आपकी सर्वसमर्थ है 

शरण आपकी दृढ़ लक्ष्य मेरा 

मोह माया, आसक्तियों ने पर है 

मेरे हृदय में डाला डेरा ।


प्रभो? मैं शरणागत तुम्हारी 

संसार भँवर से पार लगा दो 

संताप, भय सभी हर लो मेरे 

कृपानिधान, उनको भगा दो ।


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