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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

Inspirational

आत्मा की खोज

आत्मा की खोज

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आत्मा की खोज 


संसार भँवर में झूल रहा था 

सुख जगत में ढूंड रहा मैं 

मन, बुद्धि से सोचा जब, तो 

पाया ये तो स्वप्न, मिथ्या है ।


सुख को ढूँढ रहा बाहर मैं 

बहुत यत्न किए पर ना मिला वो 

एक ज्योति दिखी थी एक दिन 

झाँका जब अपने अंदर को ।


कभी घटे कभी बढ़े ये ज्योति 

लगे पदचिह्न जैसे हो सुख का 

अस्पष्ट कभी और कभी स्पष्ट दिखे 

मुझे ये अपनी और खींच रहा ।


पीछे पीछे चला मैं उसके 

मन,इन्द्रियों को करके वश में

कभी लगे कोई भ्रम तो नहीं 

परंतु आकर्षण एक अलग सा इसमें ।


लग रहा जिस की खोज में हूँ मैं 

शायद ये ज्योति उस और ले जाए 

परमानंद मुझको मिले वहाँ 

हृदय मेरा शीतल हो जाए ।


उन्हीं पदचिन्हों पर चलता हुआ 

गहरा घुस गया अपने अंदर 

पहुँच गया मैं अंतःकरण में 

दुख का लेश भी ना जहाँपर ।


सुन्दर जिस स्थान पर पहुँचा 

वहाँ देखा मैंने मुझको ही 

परमानंद में झूम रहा था 

समझ ना पाया ये पहेली ।


यहाँ दुखी मैं, वहाँ मैं सुखी 

मैं ये हूँ या मैं वही हूँ 

अशांत यहाँ पर शांत वहाँपर 

यहाँ ग़लत मैं, वहाँ सही हूँ ।


ऐसी स्थिति ही पाना चाहता था 

क्या ऐसा पहले से ही मैं 

द्रष्टा बनकर देख रहा जिसे 

मेरी ही तो आत्मा है ।


ढूँढना शायद कुछ भी नहीं है 

ना ही साधन करना है कोई 

बस मान लेना है कि मैं 

जीवात्मा, शरीर मैं नहीं ।


अजय सिंगला


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