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Ajay Singla

Inspirational

4  

Ajay Singla

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कर्म फल

कर्म फल

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4

कर्म फल 


पहला जन्म या आख़िरी मेरा 

मुझको कुछ भी पता नहीं 

या बीच का जन्म है कोई 

उसकी माया, सर्वज्ञ वही ।


पिछले जन्मों में पुण्य किए जो 

और पाप जो किये वहाँ 

सुख दुख जो संसार में मिला 

उन्ही का फल हूँ भुक्त रहा ।


ये जीवन छोटा सा अंश है 

लंबा बहुत है सफ़र मेरा 

युगों से, कल्पों से यहीं पर 

कर्मभूमि मेरी यही धरा ।


ना जानूँ कितने जन्म हो गए 

क्या क्या बनकर मैं आया 

पशु, पक्षी, देवता, राक्षस 

मनुष्य जन्म अब है पाया ।


सोचूँ अब इस मनुष्य जन्म में 

क्या सुंदर कर सकता मैं 

क्या इतनी बुद्धि मेरे में 

क्या मेरे बस में कुछ है ।


या फिर जो प्रारब्ध है मेरा 

वैसा ही होगा हर पल 

सबका सब तय है पहले से 

आने वाला, बीता हुआ कल ।


पर गीता में श्री कृष्ण कहें 

कर्म तो करना होगा तुमको 

स्वतंत्र तुम कर्म के लिए 

उसके फल की इच्छा छोड़ दो ।


मेरा ही अंश हो तुम तो 

आत्मा में बैठा तुम्हारी 

अपने आपको आत्मा मानो 

ना समझो तुम नर या नारी ।


कर्म करो, समर्पण कर दो 

जो भी तुम करते जीवन में 

परमानंद प्राप्त कर लोगे 

प्रीति ऐसी करो जब मुझमें ।


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