कर्म फल
कर्म फल
कर्म फल
पहला जन्म या आख़िरी मेरा
मुझको कुछ भी पता नहीं
या बीच का जन्म है कोई
उसकी माया, सर्वज्ञ वही ।
पिछले जन्मों में पुण्य किए जो
और पाप जो किये वहाँ
सुख दुख जो संसार में मिला
उन्ही का फल हूँ भुक्त रहा ।
ये जीवन छोटा सा अंश है
लंबा बहुत है सफ़र मेरा
युगों से, कल्पों से यहीं पर
कर्मभूमि मेरी यही धरा ।
ना जानूँ कितने जन्म हो गए
क्या क्या बनकर मैं आया
पशु, पक्षी, देवता, राक्षस
मनुष्य जन्म अब है पाया ।
सोचूँ अब इस मनुष्य जन्म में
क्या सुंदर कर सकता मैं
क्या इतनी बुद्धि मेरे में
क्या मेरे बस में कुछ है ।
या फिर जो प्रारब्ध है मेरा
वैसा ही होगा हर पल
सबका सब तय है पहले से
आने वाला, बीता हुआ कल ।
पर गीता में श्री कृष्ण कहें
कर्म तो करना होगा तुमको
स्वतंत्र तुम कर्म के लिए
उसके फल की इच्छा छोड़ दो ।
मेरा ही अंश हो तुम तो
आत्मा में बैठा तुम्हारी
अपने आपको आत्मा मानो
ना समझो तुम नर या नारी ।
कर्म करो, समर्पण कर दो
जो भी तुम करते जीवन में
परमानंद प्राप्त कर लोगे
प्रीति ऐसी करो जब मुझमें ।
