माया
माया
माया
भरमार जगत में है विषयों की
भोगते जाओ, ख़त्म ना हों ये
परंतु मन को तृप्ति ना मिले
बढ़ती जाए रुचि भोगों में ।
मन, बुद्धि मुझसे करवाते
रोज वही कर्म, क्रिया वही
कहें आज सुख मिलेगा ज़्यादा
जीवन निकल गया ऐसे ही ।
पर क्या तृप्त हुआ कोई अब तक
चक्रवर्ती राजा, बलशाली
सबसे सब अतृप्त ही गए
अंत में हाथ थे सबके खाली ।
भोगों को भोगने के लिए
करते धर्म विरुद्ध आचरण
विवेक से बुद्धि को ना बाँधा
ना ही वश में कर पाए मन ।
पंच भूत से बना शरीर ये
आत्मा तो सच्चिदानंदन है
बंधे हुए अनित्य शरीर से
पर सोचो तो परमात्मा ही मैं ।
इसी शरीर के पोषण के लिए
करता पाप अज्ञान के कारण
इन प्रपंचों में फँस गया
ऐश्वर्या, ईर्षा, स्त्री और धन ।
जिस आनंद के लिए किया सब
कभी भी मिल ना पाया अंदर
प्रभु का भजन मैं कर ना पाया
वो तो हैं आनंद समुंदर ।
इतने पाप कर्म करके भी
क्या अब मैं पा सकूँ प्रभु को
क्या अब भी मोक्ष पा सकता
प्रभु दर्शन क्या मिलेगा मुझको ।
रिश्ते नाते, संबंधी और
जगत के सभी व्यवहार विचित्र
कोई भी अपना नहीं है
पिता, पुत्र, माता, स्त्री, मित्र ।
बस एक प्रभु ही हैं कृपालु
भेदभाव बिन प्यान करें जो
निस्वार्थ प्रेम उनको करे
निष्काम भक्ति पाए उनकी वो ।
पता नहीं अभिमान मेरे में
किस बात और किस यत्न का
अपने परिश्रम से पाया सब समझूँ
यही कारण मेरे पतन का ।
प्रभु कृपा से मिला है सब कुछ
जितनी शीघ्र इसे जान जाऊँ मैं
प्रभु मिलन उतना ही निकट है
शरणागति उनकी पाऊँ मैं ।
चित ईश्वर में कब लगेगा
और तन्मय कब होगा उनमें
मलिन हृदय होगा शुद्ध और
बसेंगे कब वो मेरे मन में ।
रंग मंच एक ये जगत है
कठपुतलियाँ हम सब प्रभु की
स्वाँग मिला है स्त्री, पुरुष का
चाहें जो वो, हम करें वैसे ही ।
पूरा जीवन इस माया ने ही
कर रखा उनसे विमुख है
जन्म - मृत्यु के चक्र से निकलूँ
बैठूँ तब उनके सन्मुख मैं ।
इसके लिए क्या कर्म करूँ
और करूँ मैं क्या साधना
पूजा पाठ, शास्त्र स्वाध्याय और
किसकी अब मैं करूँ आराधना ।
जगत की शिक्षा को पढ़ पढ़ कर
समझ रहा अपने को ज्ञानी
इस अज्ञान को नष्ट करो तुम
मैं तो लोभी, कपटी, अभिमानी ।
रोगी, भव बंधन से बंधा मैं
मेरा तुम उपचार करो प्रभु
प्रभु तुम तो आनंद समुंदर
मुझपर अब उपकार करो प्रभु ।
संसार ये सारा एक स्वप्न है
सब कुछ ये भगवान की माया
मायापति तार दो मुझको
तुम्हीं ने सबको पार लगाया ।
सभी कर्म, मनोरथ अपने
करता हूँ मैं तुझको अर्पण
शरीर, अंतकरण, आत्मा मेरी
प्रभु करूँ पूर्ण समर्पण ।
अजय सिंगला
