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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

Inspirational

माया

माया

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माया 


भरमार जगत में है विषयों की 

भोगते जाओ, ख़त्म ना हों ये 

परंतु मन को तृप्ति ना मिले 

बढ़ती जाए रुचि भोगों में ।


मन, बुद्धि मुझसे करवाते 

रोज वही कर्म, क्रिया वही 

कहें आज सुख मिलेगा ज़्यादा 

जीवन निकल गया ऐसे ही ।


पर क्या तृप्त हुआ कोई अब तक 

चक्रवर्ती राजा, बलशाली 

सबसे सब अतृप्त ही गए 

अंत में हाथ थे सबके खाली ।


भोगों को भोगने के लिए 

करते धर्म विरुद्ध आचरण 

विवेक से बुद्धि को ना बाँधा 

ना ही वश में कर पाए मन ।


पंच भूत से बना शरीर ये 

आत्मा तो सच्चिदानंदन है 

बंधे हुए अनित्य शरीर से 

पर सोचो तो परमात्मा ही मैं ।


इसी शरीर के पोषण के लिए 

करता पाप अज्ञान के कारण 

इन प्रपंचों में फँस गया 

ऐश्वर्या, ईर्षा, स्त्री और धन ।


जिस आनंद के लिए किया सब 

कभी भी मिल ना पाया अंदर 

प्रभु का भजन मैं कर ना पाया 

वो तो हैं आनंद समुंदर ।


इतने पाप कर्म करके भी 

क्या अब मैं पा सकूँ प्रभु को 

क्या अब भी मोक्ष पा सकता 

प्रभु दर्शन क्या मिलेगा मुझको ।


रिश्ते नाते, संबंधी और 

जगत के सभी व्यवहार विचित्र 

कोई भी अपना नहीं है 

पिता, पुत्र, माता, स्त्री, मित्र ।


बस एक प्रभु ही हैं कृपालु 

भेदभाव बिन प्यान करें जो 

निस्वार्थ प्रेम उनको करे 

निष्काम भक्ति पाए उनकी वो ।


पता नहीं अभिमान मेरे में 

किस बात और किस यत्न का 

अपने परिश्रम से पाया सब समझूँ 

यही कारण मेरे पतन का ।


प्रभु कृपा से मिला है सब कुछ 

जितनी शीघ्र इसे जान जाऊँ मैं 

प्रभु मिलन उतना ही निकट है 

शरणागति उनकी पाऊँ मैं ।


चित ईश्वर में कब लगेगा 

और तन्मय कब होगा उनमें 

मलिन हृदय होगा शुद्ध और 

बसेंगे कब वो मेरे मन में ।


रंग मंच एक ये जगत है 

कठपुतलियाँ हम सब प्रभु की 

स्वाँग मिला है स्त्री, पुरुष का 

चाहें जो वो, हम करें वैसे ही ।


पूरा जीवन इस माया ने ही 

कर रखा उनसे विमुख है 

जन्म - मृत्यु के चक्र से निकलूँ 

बैठूँ तब उनके  सन्मुख मैं ।


इसके लिए क्या कर्म करूँ 

और करूँ मैं क्या साधना 

पूजा पाठ, शास्त्र स्वाध्याय और 

किसकी अब मैं करूँ आराधना ।


जगत की शिक्षा को पढ़ पढ़ कर 

समझ रहा अपने को ज्ञानी 

इस अज्ञान को नष्ट करो तुम 

मैं तो लोभी, कपटी, अभिमानी ।


रोगी, भव बंधन से बंधा मैं 

मेरा तुम उपचार करो प्रभु 

प्रभु तुम तो आनंद समुंदर 

मुझपर अब उपकार करो प्रभु ।


संसार ये सारा एक स्वप्न है

सब कुछ ये भगवान की माया 

मायापति तार दो मुझको 

तुम्हीं ने सबको पार लगाया ।


सभी कर्म, मनोरथ अपने 

करता हूँ मैं तुझको अर्पण 

शरीर, अंतकरण, आत्मा मेरी 

प्रभु करूँ पूर्ण समर्पण ।


अजय सिंगला


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