दुःख और सुख
दुःख और सुख
दुख और सुख
ढूँढ रहा कारण मैं दुख का
ऊपर से कुछ समझ ना आए
घर में सब सुविधा, विलास हैं
फिर भी दुख मुझे घेरता जाए ।
सोचूँ किस कारण दुखी हूँ
कोई भी तो कमी नहीं है
सब कुछ तो मिल गया जो चाहा
फिर अशांति मन में क्यों है ।
“ जगत दुख़ाल्यम “ कहें मुनि ज्ञानीं
सुख संसार में है नही कहीं
मिलता सुख धन में जो सोचो
परंतु धनी भी तो सुखी नहीं ।
मानो जो सुंदर स्त्री सुख देती
पर वह स्त्री जिस के पास है
वो भी तो सुख ढूँढ रहा है
फिर सुख का कहाँपर वास है ।
पद पाकर सुख मिलेगा मुझको
ऐसा भी मैंने सोचा था
राजा, मंत्री देखें हैं मैंने
दुख नहीं देखा जाता जिनका ।
करें आचरण दुख मिलता जिनसे
करते अभिलाषा फिर सुख की
पाप कर्म कर रहे हैं हर पल
चाहें कि आँच लगे ना दुख की ।
अंत में निष्कर्ष ये निकला
सुख दुख तो जुड़े एक दूजे से
दुख जाता, सुख मिलता है तब
जब सुख की लालसा छोड़ दें ।
अजय सिंगला
