विडंबना
विडंबना
विडम्बना
वृद्ध पिता सत्तर साल के
पुत्र, पत्नी ने निकाल दिया उन्हें
घर से बाहर जा रहे जब
पुत्र से विनती कर रहे ।
सोचें शायद रख ले वापस
याचना कर गिड़गिड़ा रहे
परंतु पुत्र को दया ना आई
किवाड़ बंद कर दिया जोर से ।
धक्के खाते खाते पहुंचे
आश्रम में, एक संत रहें जहाँ
कहते थे कि सिद्ध बाबा हैं
हर मुश्किल का समाधान वहाँ ।
दीन और दुखी स्वर में बोले
छोड़ा उन्हीं ने, जिनको था पाला
दर दर की ठोकर खा रहा
जीवन घुप्प अंधेरा काला ।
संत कहें, ईश्वर कृपा ये
वैराग्य मिला है बिन साधन के
प्रभु की बड़ी आशीष है ये तो
सभी बिछुड़ गए एक झटके में ।
भजन करो भगवान का तुम अब
पा लोगे प्रभु को ऐसे
किसी तरह का इसे दण्ड ना समझो
मानो तुम अनुकंपा जैसे ।
रोने लगा वो वृद्ध वहाँ पर
संत संबोधन करें शिष्यों को
जिसको ये कोई शाप मान रहा
वरदान है, कौन समझाए इसको ।
जो इससे पूछो क्या चाहता
कहेगा घर वापस मिल जाए
पत्नी, बच्चे प्यार करें मुझे
वो सब ही मुझको हैं भाएं ।
वैराग्य हो सकता था जिससे
उससे आसक्ति है पाई
सुखी हो सकते, दुखी हो जिससे
विवेक तो कुछ लगाओ भाई ।
हँसे संत, कहें शिष्यों से
माया का ये खेल निराला
ऐसी ही विडम्बना पल पल
संसार तो है बस गड़बड़ झाला ।
अजय सिंगला
