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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

Classics

विडंबना

विडंबना

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विडम्बना 


वृद्ध पिता सत्तर साल के 

पुत्र, पत्नी ने निकाल दिया उन्हें 

घर से बाहर जा रहे जब 

पुत्र से विनती कर रहे ।


सोचें शायद रख ले वापस 

याचना कर गिड़गिड़ा रहे 

परंतु पुत्र को दया ना आई 

किवाड़ बंद कर दिया जोर से ।


धक्के खाते खाते पहुंचे 

आश्रम में, एक संत रहें जहाँ 

कहते थे कि सिद्ध बाबा हैं 

हर मुश्किल का समाधान वहाँ ।


दीन और दुखी स्वर में बोले 

छोड़ा उन्हीं ने, जिनको था पाला 

दर दर की ठोकर खा रहा 

जीवन घुप्प अंधेरा काला ।


संत कहें, ईश्वर कृपा ये 

वैराग्य मिला है बिन साधन के 

प्रभु की बड़ी आशीष है ये तो 

सभी बिछुड़ गए एक झटके में ।


भजन करो भगवान का तुम अब 

पा लोगे प्रभु को ऐसे 

किसी तरह का इसे दण्ड ना समझो 

मानो तुम अनुकंपा जैसे ।


रोने लगा वो वृद्ध वहाँ पर 

संत संबोधन करें शिष्यों को 

जिसको ये कोई शाप मान रहा 

वरदान है, कौन समझाए इसको ।


जो इससे पूछो क्या चाहता 

कहेगा घर वापस मिल जाए 

पत्नी, बच्चे प्यार करें मुझे 

वो सब ही मुझको हैं भाएं ।


वैराग्य हो सकता था जिससे 

उससे आसक्ति है पाई 

सुखी हो सकते, दुखी हो जिससे 

विवेक तो कुछ लगाओ भाई ।


हँसे संत, कहें शिष्यों से 

माया का ये खेल निराला 

ऐसी ही विडम्बना पल पल 

संसार तो है बस गड़बड़ झाला ।


अजय सिंगला


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