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राहुल द्विवेदी 'स्मित'

Classics


4.9  

राहुल द्विवेदी 'स्मित'

Classics


अध्याय : १ अर्जुनविषादयोग

अध्याय : १ अर्जुनविषादयोग

8 mins 440 8 mins 440

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युद्धभूमि में गूँज रही थी, रणभेरी चहुँओर ।

अंधे राजा के सम्मुख थे, संजय विकल विभोर ।

कुरुक्षेत्र में दिव्यदृष्टि से, झाँक-झाँक तत्काल ।

सुना रहे राजा को संजय, आँखों देखा हाल ।।

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बोल उठे धृतराष्ट्र सहज ही, संजय से व्याकुल होकर ।

चिंता, उत्सुकता, संशय के, वशीभूत संयम खोकर ।

"हे संजय ! कुरुक्षेत्र गये सब, युद्ध चाहने वालों ने ।

क्या-क्या किया पाण्डुपुत्रों ने, और हमारे लालों ने ।।" ०१।।


संजय बोले - "दुर्योधन ने, पाण्डव सेना को देखा ।

व्यूहाकृति, मजबूत, व्यवस्थित, मानव सेना को देखा ।

जाकर शीघ्र द्रोण के सम्मुख, मन भावों को खोल उठे ।

युद्धकुशल, आचार्य श्रेष्ठ से, दुर्योधन यों बोल उठे ।।०२।।


"हे आचार्य ! पाण्डुपुत्र जो, सेना लेकर आते हैं ।

शिष्य आपके द्रुपदपुत्र हैं, धृष्टद्युम्न कहलाते हैं ।

उनके द्वारा खड़ी की गई, व्यूहाकृत उस सेना को ।

जरा देखिए गुरुवर ऐसी, अति विस्तृत उस सेना को ।।"०३।।


भरे हुए हैं वीर अनेकों, श्रेष्ठ धनुर्धर सेना में ।

शूरवीर अर्जुन के जैसे, भीम बराबर सेना में ।

सात्यकि और विराट सरीखे, द्रुपद सरीखे महारथी ।

धृष्टकेतु, पुरुजित से योद्धा, चेकितान से धर्मपथी ।।०४-०५।।


काशिराज बलवान यहाँ हैं, कुन्तिभोज आलोकित हैं ।

युधामन्यु, युतमौजा शोभित, शैव्य श्रेष्ठ भी शोभित हैं ।

युवा सुभद्रासुत की ताकत, कम बतलाना ठीक नहीं ।

और द्रोपदी पुत्रों को भी, सौम्य जताना ठीक नहीं ।।०५-०६।।


ब्राह्मणश्रेष्ठ ! हमारी सेना, पर भी दृष्टि डालिये तो ।

कौन प्रमुख योद्धा हैं इसमें, उनको जरा जानिये तो ।

वह पाण्डव सेना का बल था, कौरव बल दिखलाता हूँ ।

जो-जो सेनापति सेना के, उनका नाम बताता हूँ ।।०७।।


भीष्म पितामह और आप गुरु, पाण्डव दल पर भारी हैं ।

युद्धविजेता की उपमा के, कृपाचार्य अधिकारी हैं ।

कर्ण, विकर्ण सरीखे योद्धा, अश्वत्थामा हिम्मत हैं ।

सोमदत्त सुत भूरिश्रवा भी, इस सेना की ताकत हैं ।।०८।।


गुरुवर! देखो, हैं असंख्य, जो वीर हमारे साथ खड़े ।

अस्त्र-शस्त्र से सभी सुसज्जित, युद्धकुशल, बांके, तगड़े ।

यदि मैं कह दूँ तो जीवन से, मोह त्याग देते हैं सब ।

दुश्मन दल के हँसते-हँसते, प्राण छीन लेते हैं सब ।।०९।।


भीष्म पितामह के हाथों से, कौरव सेना रक्षित है ।

युद्धकुशल वीरों से शोभित, हर प्रकार से अविजित है ।

वहीं भीम के हाथों रक्षित, उस सेना में भी दम है ।

युद्ध जीतने में वह सेना, अति प्रवीण है, सक्षम है ।।१०।।


सभी मोर्चों पर आ सारे, डट जायें फिर ठानें हम ।

प्रथम चाल इस महासमर की, बस इतनी सी जानें हम।

आज युद्ध की नीति यही है, यही समय का कहना है ।

भीष्म पितामह की रक्षा में, सबको तत्पर रहना है ।।"११।।


समय आ चुका है अब रण में, दो-दो हाथ दिखाने का ।

एक महाभारत के स्वर्णिम, सम्वादों को गाने का ।

जैसे कोई सिंह शत्रु को, देख गर्जना करता है ।

दूर-दूर तक भय, विस्मय के, भाव अचानक भरता है ।।१२।।


वैसे ही वह कौरव दल का, वृद्ध शेर गुर्राया है ।

भीष्म पितामह ने यों ऊँचे स्वर में शंख बजाया है ।

जिसको सुनकर दुर्योधन के, मन में हर्ष अपार उठा ।

फड़क उड़ी मजबूत भुजाएँ, हृदय सिंधु में ज्वार उठा ।।१२।।


दशों दिशाएँ गूँज उठीं फिर, ढोल, मृदंग, नगाड़ों से ।

शंख बजे, नरसिंघे गूँजे, गूँजा गगन दहाड़ों से ।

एक साथ ध्वनि ऐसी गूँजी, उठा भयंकर कोलाहल ।

धरा, गगन, पाताल लोक तक, गूँज उठी है सृष्टि सकल ।।१३।।


श्रेष्ठ श्वेत अश्वों से सज्जित, रथ पर श्री मधुसूदन हैं ।

उनके साथ धनुर्धर अर्जुन, शक्तिपुंज हैं, सोहन हैं।

दोनों ही ने शंख बजाकर, एक अलौकिक नाद किया ।

जैसे धर्म, न्याय, सुचिता का, सुंदरतम अनुवाद किया ।।१४।।


पाञ्चजन्य को बजा कृष्ण ने, वातावरण पुनीत किया ।

अर्जुन ने भी देवदत्त का, पावन सा संगीत दिया ।

और भयानक कर्मों वाले, भीमसेन ने तान भरी ।

पौण्ड्र शंख को बजा सहज ही, महायुद्ध में जान भरी ।।१५।।


कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने यदि, अनंतविजय का नाद किया ।

तो सुघोष को बजा नकुल ने, उत्साहित आह्लाद किया ।

मणिपुष्पक वह शंख जिसे, सहदेव बजाते दिखते हैं ।

समरक्षेत्र के कर्मयुद्ध में, अलख जगाते दिखते हैं ।।१६।।


श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज भी, और शिखंडी महारथी ।

धृष्टद्युम्न, सात्यिक, विराट भी, द्रुपद सरीखे सत्यपथी ।

सभी द्रोपदी पुत्र, युवा अभिमन्यु आदि रणधीरों ने ।

अपने अपने शंख बजाये, वहाँ उपस्थित वीरों ने ।।१७-१८।।


ऐसी उठी भयंकर ध्वनियाँ, धरती से अम्बर गूँजे ।

लाखों पर्वत टूटे जैसे, ज्यों असंख्य सागर गूँजे ।

उस ध्वनि ने कौरव खेमे में, सबके हृदय विदीर्ण किये ।

साहस डोला, हिम्मत टूटी, ऐसे स्वर उत्कीर्ण किये ।।१९।।


हे राजन ! कपिध्वज अर्जुन ने, कौरव कुल पर ध्यान दिया ।

धनुष उठाकर मन ही मन में, लक्ष्य हेतु संधान किया ।

और कृष्ण से बोले अर्जुन, "हे अच्युत ! अब वेग भरें ।

रथ दोनों सेनाओं के ही, ठीक मध्य मे खड़ा करें ।।२०-२१।।


देख नहीं लेता जब तक मैं, सभी विपक्षी वीरों को ।

युद्ध क्षेत्र में डटे, युद्ध के अभिलाषी रणधीरों को ।

और न तय कर लूँ मैं किनसे, लड़ना योग्य, यथोचित है ।

तब तक रथ को वहीं रोकिए, यहीं ठीक, समयोचित है ।।२२।।


दुर्योधन दुर्बुद्धि हेतु जो, राजा लड़ने आये हैं ।

युद्धभूमि में हो अधीर जो, युद्ध हेतु अकुलाए हैं ।

युद्ध रूप व्यापार हेतु जिन-जिन से मुझको लड़ना है ।

उन सारे राजाओं का ही, मुझे निरीक्षण करना है ।।"२३।।


संजय बोले- "वासुदेव ने, अर्जुन के अनुसार किया ।

भीष्म-द्रोण के सम्मुख लाकर, रथ को अपने रोक दिया ।

मध्य खड़ा है अर्जुन का रथ, दोनों ही सेनाओं के ।

सम्मुख दूर-दूर से आये, युध्द हेतु राजाओं के ।।२४-२५।।


जग संचालक, सृष्टि नियंता, जगती के पालन कर्ता ।

शोक विनाशक, कष्ट निवारक, बोल उठे यों दुखहर्ता ।

"पार्थ ! युद्ध के लिए डटे हैं, जो कौरव उनको देखो ।

मानवता के जो बैरी हैं, एक दृष्टि सबको देखो ।।"२५।।


पृथापुत्र अर्जुन ने सहसा, देखा उन सेनाओं को ।

चाचा-ताऊ, पुत्र, भाइयों, दादा, परदादाओं को ।

विव्हल अर्जुन देख चकित हैं, युद्धभूमि के चित्रों को ।

गुरुओं, मामाओं, पौत्रों को, मित्रों, ससुरों, सुहृदयों को ।।२६-२७।।


देख उपस्थित बन्धुजनों को, अर्जुन भावविभोर हुए ।

करुणा ने उस विकट समय में, सहज हृदय के छोर छुए ।

जहाँ काल विकराल खड़ा है, सहज काल का मुख खोले ।

वहीं शोक संयुक्त भाव से, कुंती-सुत सहसा बोले ।।२७-२८।।


"हे कृष्ण ! युद्ध हित युद्ध क्षेत्र में, डटे हुए इन स्वजनों को ।

देख शिथिल हो रहे अंग हैं, सम्मुख मेरे अपनों को ।

सूख रहा है मुख ये मेरा, इस शरीर मे कम्पन है ।

रोम-रोम से अनुभव होता, रोमांचित सा यह तन है ।।२८-२९।।


हाथों से गाण्डीव फिसलता, और शिथिलता आती है ।

जाने क्या है जो यह मेरी, त्वचा जली सी जाती है ।

भ्रमित-भ्रमित सा मन है मेरा, है विवेक का अर्थ नहीं ।

अतः खड़े रहने में भी मैं, जैसे आज समर्थ नहीं ।।३०।।


हे केशव ! लक्षण भी सारे, यों हो रहे प्रतीत मुझे ।

किसी दशा में देखूँ इनको, दिखते हैं विपरीत मुझे ।

आज युध्द कर किसी भाँति भी, पाऊँ पुण्य प्रयाण नहीं ।

स्वजनों की हत्या में मुझको, दिखता है कल्याण नहीं ।।३१।।


हे कृष्ण ! विजय की चाह न मुझको, नहीं राज्य की चाह मुझे ।

नहीं चाहिए मर्त्य लोक में, क्षणिक सुखों की राह मुझे ।

हमको ऐसे राज्य हेतु भी, कहिए भला प्रयोजन क्या ?

हे गोविंद ! सभी लाभों से, जीवन हेतु प्रलोभन क्या ??३२।।


राज्य, भोग, सुख की अभिलाषा, जिन स्वजनों के लिए मुझे ।

हैं अभीष्ठ ये सारी चीजें, जिन अपनों के लिए मुझे ।

धन, जीवन की आस त्याग वे, समरांगण में आये हैं ।

डटे हुए हैं मेरे सम्मुख, युद्ध हेतु अकुलाए हैं ।।३३।।


गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के, उसी भाँति हैं पौत्र, ससुर ।

दादे-मामे और अन्य भी, सम्बन्धी हैं युद्धातुर ।

हे मधुसूदन ! उनके हाथों, मारे जाने पर भी क्या ?

तीन लोक का राज्य सहज ही, खोने-पाने पर भी क्या ??३४।।


तीनों लोक निछावर इनपर, क्या पृथ्वी की बात करें ।

इन हाथों में शक्ति नहीं है, जो इनपर आघात करें ।

कुछ भी हो मैं शस्त्र उठाकर, इन्हें मार ना पाऊँगा ।

सब कुछ खोकर, इनके हाथों, भले सहज मर जाऊँगा ।।३५।।


मुझे बतायें आज जनार्दन !, क्या प्रसन्नता पायेंगे ।

वध करके धृतराष्ट्र सुतों का, आखिर क्या पा जायेंगे ।

ये आततायी हैं इनको, मारा भी यदि जायेगा ।

तो भी पाप लगेगा हमको, मन को सदा सतायेगा ।।३६।।


हे माधव ! इस हेतु स्वयं को, योग्य नहीं मैं पाता हूँ ।

स्वजन, बांधवों की हत्या से, इसीलिए घबराता हूँ ।

कटे हुए पौधे में जैसे, सुख का फूल न खिलता है ।

वैसे ही अपने कुटुंब को, मार कहां सुख मिलता है ।।३७।।


भ्रष्टचित्त ये लोग लोभ से, यद्यपि सत्य न जान रहे ।

कुल विनाश से प्राप्त दोष को, आज नहीं पहचान रहे ।

मित्रों से विरोध करने में, पाप नहीं ये देख रहे ।

कहीं देखना इन्हें चाहिए, किन्तु कहीं ये देख रहे ।।३८।।


सुनें जनार्दन ! तो भी हम ये, सोचें और विचार करें ।

कुल विनाश से उठे दोष से, परिचित हम, यह ध्यान धरें ।

पाप, पाप है और पाप का, बहिष्कार न्यायोचित है ।

 इस पाप कर्म से बचने का, चिंतन भी समयोचित है ।।३९।।


कुल विनाश से सनातनी कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं ।

और धर्म के मिटने से कुल-कर्म भ्रष्ट हो जाते हैं ।

हर युग का संदेश यहीं है, यहीं समय दोहराता है ।

धर्म नष्ट होने पर कुल में, और पाप बढ़ जाता है ।।४०।।


हे कृष्ण ! पाप अति बढ़ने से, ऐसी स्थितियाँ आती हैं ।

मर्यादा को त्याग नारियाँ, अति दूषित हो जाती हैं ।

हे वार्ष्णेय ! जब-जब भी स्त्री, यों दूषित हो जाती है ।

तब-तब नियति वर्णसंकर का, उद्भव लेकर आती है ।।४१।।


वर्णसंकर कुलघातियों तथा, कुल को नरक दिलाते हैं ।

जो लुप्त पिण्ड, जल क्रिया कभी, प्राप्त नहीं कर पाते हैं ।

अर्थात श्राद्ध, तर्पण से वंचित, जो पुरखे रह जाते हैं ।

इनके वे सभी पितर भी तो, सहज अधोगति पाते हैं ।।४२।।


इन सभी वर्णसंकरकारक, दोषों ही से कर्म नहीं ।

सब कुलघातियों, पातकों के, बचते कुल के धर्म नहीं ।

नष्ट सनातन कुल-जाति-धर्म, हो जाते हैं निश्चित है ।

जिस भाँति सूख जाते पौधे, जिनकी जड़ ही विच्छित है ।।४३।।


अहे जनार्दन ! इस पृथ्वी पर, हम यह सुनते आये हैं ।

काल चक्र ने भी प्रसंग ये, कई बार दोहराये हैं ।

जिनका कुल-धर्म नष्ट होता है, उनको दुखद समास मिला ।

अनिश्चितकाल के लिए उनको, नर्क लोक में वास मिला ।।४४।।


हा ! शोक ! बुद्धिधारी हम हैं, अति ज्ञानी कहलाये हैं ।

फिर भी इस महापाप के हित, तत्पर हैं, अकुलाये हैं ।

जो राज्य और सुख लोभ हेतु, अति व्याकुल हैं, उन्मत हैं ।

इस युद्ध भूमि में स्वजनों का, वध करने को उद्धत हैं ।।४५।।


हो शस्त्ररहित, उस वैरी दल का, यदि न सामना करने पर ।

शस्त्र लिए धृतराष्ट्र सुतों के, हाथों रण में मरने पर ।

इस जीवन का लगता मुझको, भावी सुखद प्रयाण मुझे ।

उनका मुझे मारने में भी, दिखता है कल्याण मुझे ।।४६।।"


संजय बोले - " रण में ऐसा, कहकर विह्वल अर्जुन ने ।

शोक भरे मन से व्याकुल हो, सहसा निश्छल अर्जुन ने ।

बाण सहित अपने हाथों से, निज धन्वा भी त्याग दिया ।

अपने रथ के पश्च भाग में, बैठ सहज निःस्वास किया ।।४७।।"

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युद्ध भूमि में जब स्वजनों को, देखा हुए अधीर ।

विह्वल होकर मधुसूदन से, बोले अर्जुन वीर ।

कृष्ण और अर्जुन दोनों के, बीच हुए सम्वाद ।

प्रथम भाग में पूर्ण हुए अब, आगे इसके बाद ।।

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------राहुल द्विवेदी 'स्मित'


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