सुंदर
सुंदर
सुंदर
जीवन में सुन्दरता क्या है
मन में एक ये प्रश्न था आया
क्या हृदय के अंदर का भाव ये
या बस बाहरी देह और काया ।
चर अचर जीवों में सभी
भासती ये सुंदरता कैसे
सुंदर लगे पर्वत की चोटी
पशु, पक्षी भी सुंदर वैसे ।
सुंदरता पर ये सथाई नहीं
आज जो सुंदर, कल करूप है
समय के साथ जो बदल रहा है
सुन्दर ना उसका सरूप है ।
अपनी और मिष्ठान है खींचे
कुछ दिन पर जब पड़े रहें वो
दुर्गंध उनसे आने लगती है
कोई भी ना खा सकता उनको ।
और शुरू में ही खा लें उसे
उदर उसे है मल बनाए
और जो उल्टी हो जाए तो
आँखों से भी ना देखी जाए ।
वस्तु तो वही है परंतु
कभी सुंदर और कभी असुंदर
गुण, रूप स्थाई ना जिसके
वो वस्तु कैसे फिर सुंदर ।
तीस साल पहले जो मैं था
और अब जब पचपन का हो गया
क्या पहले सुन्दर था या अब
इसका निर्णय कौन करेगा ।
अंदर से अब भी वही हूँ
अपने को कुरूप ना मानूँ
सफेद बाल, मुरझाई काया
त्वचा के तुच्छ विकार मैं जानूँ ।
सुंदरता क्या आयु से है
या ये रंग रूप से हो रही
मेरी बेटी और बेटा मेरा
माँ माने सबसे सुंदर वही ।
गोरा रंग किसी को भाए
साँवला सुंदर लगे किसी को
सुंदरता की परिभाषा एक ना
एक कसौटी लगे ना इसको ।
प्रभु की कठिन तपस्या करके
लाखों मुनि कुरूप हो गए
जब भगवान का दर्शन पाया
प्रभु का ही स्वरूप हो गए ।
वस्तु जो भगवान को लग गई
बने सुंदर प्रसाद प्रभु का
बुद्धि जुड़ी हुई जो प्रभु से
सुंदरता में ना सानी कोई उसका ।
संसार में सुंदरता ना स्थाई
सुंदरता असत्य है वो तो
सुंदर तो बस एक प्रभु हैं
सदा सर्वदा सुंदर ही रहें वो ।
अजय सिंगला
