संघर्ष
संघर्ष
संघर्ष
कल आया था दूर देश मैं
रहे वहाँ है बेटा मेरा
भाग दौड़ करता दिन भर वो
जगत की माया ने उसे घेरा ।
सुबह उसकी होती बारह बजे
थोड़ा कुछ खाकर निकल जाता वो
मस्तिष्क में हर समय काम चल रहा
खाना ना जानूँ कब खाता वो ।
रात को जब वापिस है आता
बारह या एक बजे ही
बासी खाना करता गरम है
फ्रीज़र में पड़ा हो जो भी ।
जब वो मुझसे बात है करता
तब भी काम दिमाग़ में उसके
कभी कभी तो ये लगता क्या
सुन भी रहा वो मेरी बातें ।
उसके लिए जिंदगी है यही
लगता तो है वो ख़ुश इसीमें
पर ना जाने मेरा मन ये
क्यों कहता नीरस जीवन ये ।
प्रन्तु देखूँ जब जीवन अपना
उसमें भी संघर्ष बड़े हैं
हर दिन एक नई परेशानी
झंझट मुंह बाएँ खड़े हैं ।
सबका संघर्ष है अपना अपना
कुछ चीजें अपने देश में अच्छीं
गुण और दोष तो सभी जगह हैं
जिंदगी अपनी अपनी सबकी ।
संसार के जंजाल में पड़े
शायद हम सब भी ऐसे ही
शांति ढूँढ रहे हैं हर पल
कोई रास्ता दिख रहा नहीं ।
शायद जगत की यही रीत है
शांति यहाँ मिलती ही नहीं
ऐसा पथ जिसकी मंजिल सकून है
हे प्रभु दिखाओ अब तुम ही ।
अजय सिंगला
