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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

Classics

संघर्ष

संघर्ष

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संघर्ष 


कल आया था दूर देश मैं 

रहे वहाँ है बेटा मेरा 

भाग दौड़ करता दिन भर वो 

जगत की माया ने उसे घेरा ।


सुबह उसकी होती बारह बजे 

थोड़ा कुछ खाकर निकल जाता वो 

मस्तिष्क में हर समय काम चल रहा 

खाना ना जानूँ कब खाता वो ।


रात को जब वापिस है आता 

बारह या एक बजे ही 

बासी खाना करता गरम है 

फ्रीज़र में पड़ा हो जो भी ।


जब वो मुझसे बात है करता 

तब भी काम दिमाग़ में उसके 

कभी कभी तो ये लगता क्या 

सुन भी रहा वो मेरी बातें ।


उसके लिए जिंदगी है यही 

लगता तो है वो ख़ुश इसीमें 

पर ना जाने मेरा मन ये 

क्यों कहता नीरस जीवन ये ।


प्रन्तु देखूँ जब जीवन अपना 

उसमें भी संघर्ष बड़े हैं 

हर दिन एक नई परेशानी 

झंझट मुंह बाएँ खड़े हैं ।


सबका संघर्ष है अपना अपना 

कुछ चीजें अपने देश में अच्छीं 

गुण और दोष तो सभी जगह हैं 

जिंदगी अपनी अपनी सबकी ।


संसार के जंजाल में पड़े 

शायद हम सब भी ऐसे ही 

शांति ढूँढ रहे हैं हर पल 

कोई रास्ता दिख रहा नहीं ।


शायद जगत की यही रीत है 

शांति यहाँ मिलती ही नहीं 

ऐसा पथ जिसकी मंजिल सकून है 

हे प्रभु दिखाओ अब तुम ही ।


अजय सिंगला


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