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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत - २३२ ;युगलगीत

श्रीमद्भागवत - २३२ ;युगलगीत

4 mins 140 4 mins 140


श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

प्रतिदिन कृष्ण वन में जाते थे 

चला जाता था गोपियों का चित भी 

उनके चले जाने से।


श्री कृष्ण का चिंतन करती रहें 

वाणी से लीलाओं का गान करें 

कृष्ण के बारे में कहतीं 

गोपियाँ सभी आपस में।


अरी सखी, श्यामसुन्दर नटनागर 

तान छेड़ते जब बांसुरी की वे 

सिद्ध पत्नियां पतियों के साथ में 

आ जातीं सब आकाश में।


अत्यंत चकित, विस्मित हो जातीं 

दशा देखकर फिर अपने चित की 

अपने पतियों के साथ रहने से 

थोड़ी लज्जा भी उनको आती।


परन्तु क्षणभर में ही उनका 

चित नारायण में बिंध जाता 

और विवश हो जातीं मन में 

शरीर उनका अचेत हो जाता।


अरे गोपियों, नन्दनन्दन हमारे 

कितने सुंदर हैं, और जब वे हँसते 

हार का रूप धारण कर लेतीं 

उनकी ये हास्य रेखाएं।


शुभ्र मोती सी चमकने लगतीं 

हास्य की ये किरणें जो 

उस हार में, लटक रहा है 

वक्षस्थल पर जो, शोभायमान हो।


जब वो बांसुरी बजाते 

दुखी जनों को सुख देने को 

झुण्ड के झुण्ड बैल, हरिण के 

पास आ जाते उनके वो।


दोनों कान खड़े करके अपने 

खड़े वो हो जाते हैं ऐसे 

मानो सब के सब सो गए हों 

शांत चित हो बांसुरी की धुन में।


हे सखी, नन्द के लाडले जब 

सिर पर मोर का मुकुट बांधते 

और बांसुरी से गोओं का 

नाम लेते गोपों के साथ में।


नदियों की गति रुक जाती उस समय 

चाहतीं वे कि वायु उठाकर 

चरणधूलि ले आये प्रियतम की 

और निहाल हों हम उसको पाकर।


परन्तु स्त्रियां वो नदियां भी 

मन्दभागिनी हमारी तरह ही 

कृष्ण के आलिंगन से जैसे हम कांपती 

वे भी प्रेम से कांपें वैसे ही।


जैसे देवता नारायण का गान करें 

कृष्ण का गान करें ग्वालबाल ये 

वृन्दावन में विहार करें जब कृष्ण 

आनन्दित हों सब वृक्ष लताएं।


फूल फलों से लद जातीं वो 

धरती छूने लगती डालियाँ 

मानो वो प्रणाम कर रहीं कृष्ण को 

रोम रोम खिल जाता उनका।


अरी सखी, जितनी भी वस्तुएं 

देखने योग्य इस संसार में 

या संसार के बाहर भी हैं 

सबसे सुंदर कृष्ण हैं उनमें।


केसर की खोर फब्ती है 

सांवले ललाट पर उनके 

सुन्दरता बढाती उनकी 

वनमाला जो लटके गले में।


उसमे पिरोयी तुलसी की दिव्य गंध 

और मधु के मतवाले हो भोरें 

बड़े मनोहर और ऊँचे स्वर में 

गुंजार करते रहते वे।


श्यामसुंदर भोरों के स्वर में 

स्वर मिलाकर बांसुरी बजाते 

आत्ममगन हो जाते हंस भी 

मुनिजनमोहन संगीत सुनकर ये।


विवश हो वे आ बैठते 

कृष्ण के पास, और आँखें मूंदकर 

उनकी आराधना करने लगते हैं 

अपने चित को एकाग्र कर।


व्रजदेवियो, श्यामसुंदर हमारे 

कुण्डल बनाकर जब पुष्पों के 

कानों में धारण करते हैं और 

बंसी बजाते संग बलराम के।


गरजते श्याम मेघ उस समय 

बांसुरी की तान के साथ में 

देखें जब कि धाम लगा कृष्ण का 

उनके ऊपर छाया कर देते।


नन्ही नन्ही फुहियों के रूप में 

बरसने लगते हैं ऐसे 

भगवान् पर दिव्य पुष्पों की 

वर्षा हो रही हो जैसे।


कभी कभी बादलों में छुपकर 

देवता भी हैं पुष्प बरसाते 

कृष्ण को देख देखकर 

पूजा करते और प्रसन्न हो जाते।


सती शिरोमणि यशोदा ये तुम्हारा 

सुंदर कुंवर, ग्वालबालों के 

साथ खेलने में निपुण है 

प्यारा सबका, चतुर भी है ये।


देखो किसी से सीखा नहीं 

उन्होंने बांसुरी बजाना, फिर भी 

राग, रागनियां उन्होंने 

निकाल लीं अनेकों प्रकार कीं।


लाल लाल अधरों पर अपने 

बांसुरी रखकर वो स्वर निकालते 

ब्रह्मा, शंकर, इंद्र आदि भी 

उन स्वरों को पहचान न पाते।


इतना मोहित हो जाते वे 

तल्लीन हो चित वंशीध्वनि में 

सब कुछ छोड़ अपना वे 

तन्मय हो जाते उसी में।


अरी वीर ! चरणकमल जो उनके 

चिन्ह सुंदर सुंदर हैं उसमें 

विचित्र बड़े वो, ध्वजा, वज्र,

कमल और अंकुश आदि के।


व्रजभूमि खुद जाती जब 

गोओं के चलने पर, खुरों से 

उसकी पीड़ा मिटाते श्री कृष्ण 

अपने सुकुमार चरणों से।


श्यामसुंदर, गजराज के समान 

चलते मंद मंद गति से 

सुख देते हैं पृथ्वी को 

बांसुरी बजाते रहते वे।


वंशीध्वनि उनकी, उनकी चाल ये 

और विलासभरी चितवन उनकी 

प्रेम के मिलन की आकांक्षा को 

हमारे ह्रदय में बढ़ा देती।


उस समय इतनी मुग्ध और 

इतनी मोहित हम हो जातीं 

कि मानो हम जड़ वृक्ष हों 

हिल डुल तक नहीं पातीं।


बहुत ही भली मालूम हो 

मणियों की माला उनके गले में 

मधुर मधुर गंध तुलसी की 

बहुत ही प्यारी लगती उन्हें।


इसलिए तुलसी की माला को 

सदा धारण किये रहते वे 

हरिनियाँ भी मोहित हो जातीं 

उनकी बांसुरी के स्वर से।


दौड़ी आतीं वो उनके पास 

और घेरे रहतीं उन्हें वो 

नंदरानी यशोदा जी वास्तव में 

आप बड़ी ही पुन्यकीर्ति हो।


तभी तो ऐसे पुत्र मिले तुम्हे 

बड़े प्रेमी, चित से कोमल जो 

तरह तरह के हास परिहास से 

सुख देते प्रेमी सखाओं को।


अरी सखी, श्यामसुंदर हमारे 

व्रज की गोओं को बड़ा प्रेम करें 

देखो, सायंकाल हो चला 

उनको लेकर वे आते हीं होंगे।


इतनी देर क्यों हो रही उनको 

ब्रह्मा और शंकर रास्ते में ही 

उनकी वंदना जो करने लगते 

देरी हुई होगी इसी लिए ही।


बांसुरी बजाते गोओं के पीछे 

अब बस वे आते ही होंगे 

ग्वालबाल गान करते हुए 

आ रहे होंगे उनके पीछे।


देखो सखी, वो आ गए हैं 

वनमाला पर बड़ी धुल पड गयी 

दिन भर जंगल में घूमकर 

थक गए होंगे कृष्ण भी।


फिर भी अपनी इस शोभा से 

आँखों को हमारे सुख दे रहे 

सखी, देखो कैसी सुंदर हैं 

कुछ चढ़ी हुई मदभरी आँखें।


कुछ कुछ ललाई लिए हुए 

कैसी भली जान पड़ती हैं 

गले में वनमाला लहरा रही 

कानों में सोने के कुण्डल हैं।


अब वे सखा ग्वालबालों को 

सम्मान करके विदा कर रहे 

गजराज समान मदभरी चल से 

आ रहे हमारी ही और वे।


हमारे समीप वो चले आ रहे 

दिन भर का असह विरहताप मिटाने 

गोपियों का मन लगा रहता कृष्ण में 

कृष्णमयी सब हो गयी थीं वे।


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