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Ajay Singla

Classics Inspirational

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Ajay Singla

Classics Inspirational

मन,बुद्धि और मैं

मन,बुद्धि और मैं

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मन, बुद्धि और मैं 


चक्षु देख रहे विषय को 

मन सोचे ये भोग मैं पाऊँ 

बुद्धि ने सवीकृति दे दी उसे 

पग से उस भोग तक जाऊं ।


हस्त मिठाई मुख में डाले 

जिह्वा स्वाद से उसको खाए 

चंचल मन, इंद्रियाँ मेरी 

विषयों की ओर खींचती जाएँ ।


क्या मन तृप्त होता भोग कर 

या तृष्णा इससे बढ़े है 

कामना ख़त्म नहीं होती कभी

विषय, भोग सभी और खड़े हैं ।


नेत्र कहें सुंदरता देखूँ 

कर्ण मधुर संगीत सुने हैं 

प्रिय गन्ध सूंघे नासिका 

जिह्वा चखे सरस रस जिसमें है ।


त्वचा स्पर्श चाहे मख़मल सा 

स्त्री संग जननेंद्रि चाहे 

ख़ान पान उदर में पच कर 

मल त्याग होता गुदा से ।


चित चिंतन संसार का करे 

अहंकार दृढ़ होता जाए 

ज्ञानेंद्री, कर्मेन्द्रियाँ, अन्तःकरण 

माया सदैव इनको भरमाए ।


परंतु क्या मैं ये तीनों ही 

या इनसे भिन्न हूँ कुछ मैं 

मेरी आत्मा अंश प्रभु का 

ये सब तो बस प्रकृति हैं ।


और जो मैं आत्मा हूँ तो 

परमात्मा से मैं पृथक नहीं 

द्रष्टा बनकर देखूँ सब कुछ 

सब कुछ प्रभु हैं, और ना कुछ कहीं।


ईश्वर के सिवा सब मिथ्या है 

सब असत्य और सब अनित्य 

सत्य तो बस जगदीश्वर हैं 

वो अनंत और वो ही नित्य ।


“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या”है 

ज्ञानी लोग ऐसा हैं कहते 

प्रभु प्रेम, मोक्ष जो चाहें 

हरि चिंतन में मग्न वो रहते ।


अजय सिंगला


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