STORYMIRROR

Ajay Singla

Classics

3  

Ajay Singla

Classics

द्वन्द

द्वन्द

1 min
2

द्वन्द 


मेरी द्वन्द और मेरी दुविधा 

पीड़ा देते मन को मेरे 

इनसे मैं छुटकारा चाहता 

मुझको व्यथित करें साँझ सवेरे ।


ना जाने ये कब आए और 

जानूँ ना ये क्यों आए 

ये भी ना जानू मैं कि सभी 

सत्य हैं या फिर झूठ हैं ये ।


दिन ढल जाता, रात हो जाती 

फिर सुबह होती नई 

मेरे हृदय में बैठे रहते हैं 

जाते ना ये और कहीं ।


दिन रात मैं सोचता रहता 

कब इनसे छूटूँगा मैं 

भजन करूँ और राम नाम जपूँ 

ये ही बस मेरे बस में है ।


बहुत समय अब बीत गया है 

प्रभु तुम ही कुछ कृपा करो 

तुम्हें समर्पण करूँ स्वयं को 

संताप मेरे सब तुम हर लो ।


अजय सिंगला


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics