द्वन्द
द्वन्द
द्वन्द
मेरी द्वन्द और मेरी दुविधा
पीड़ा देते मन को मेरे
इनसे मैं छुटकारा चाहता
मुझको व्यथित करें साँझ सवेरे ।
ना जाने ये कब आए और
जानूँ ना ये क्यों आए
ये भी ना जानू मैं कि सभी
सत्य हैं या फिर झूठ हैं ये ।
दिन ढल जाता, रात हो जाती
फिर सुबह होती नई
मेरे हृदय में बैठे रहते हैं
जाते ना ये और कहीं ।
दिन रात मैं सोचता रहता
कब इनसे छूटूँगा मैं
भजन करूँ और राम नाम जपूँ
ये ही बस मेरे बस में है ।
बहुत समय अब बीत गया है
प्रभु तुम ही कुछ कृपा करो
तुम्हें समर्पण करूँ स्वयं को
संताप मेरे सब तुम हर लो ।
अजय सिंगला
