STORYMIRROR

Ajay Singla

Classics

4  

Ajay Singla

Classics

स्वपन

स्वपन

1 min
5

स्वप्न 


कहते हैं कि जगत स्वप्न है

और कहें स्वप्न तो झूठा 

पर सब तो इसमें ही विचरें 

तो क्या है स्वरूप सत्य का ?


कहते स्वप्न में सुख मिला जो 

भोग भोगने से संसार के 

और जो कष्ट भोगें हम वहाँ 

दुख और भय जो भी मिलें ।


जग जाओ तो सब स्वप्न था 

पूर्णत्य झूठा है सभी ये 

परंतु जिस संसार में जगे

वो भी तो झूठा पहले से ।


तो फिर परम सत्य क्या है 

क्या सत्य तब कुछ भी नहीं 

सत्य - झूठ में झूल रहा मैं 

समझ ना आए ये पहेली ।


कहते जो सत्य को जान ले 

पा लिया ईश्वर को उसने 

परंतु सत्य का पता ही नहीं 

तब यत्न करूँ पाने का कैसे ।


ये भी कहते हैं जगत में 

भगवान के सिवा कुछ भी नहीं 

हम सब भी उसी का अंश हैं 

खेल वो खेलें अपने से ही ।


सृजन और पालन करते हैं 

सभी का संहार भी वो करें 

हो रहा सब उनकी सत्ता से 

मृत्यु से फिर क्यों हम डरें ।


जगत गुरु शंकर जी भोले 

अर्धांगिनी पार्वती से बोले 

“ उमा कहूँ मैं अनुभव अपना 

सत हरि भजन, जगत सब सपना “ ।


अजय सिंगला


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics