स्वपन
स्वपन
स्वप्न
कहते हैं कि जगत स्वप्न है
और कहें स्वप्न तो झूठा
पर सब तो इसमें ही विचरें
तो क्या है स्वरूप सत्य का ?
कहते स्वप्न में सुख मिला जो
भोग भोगने से संसार के
और जो कष्ट भोगें हम वहाँ
दुख और भय जो भी मिलें ।
जग जाओ तो सब स्वप्न था
पूर्णत्य झूठा है सभी ये
परंतु जिस संसार में जगे
वो भी तो झूठा पहले से ।
तो फिर परम सत्य क्या है
क्या सत्य तब कुछ भी नहीं
सत्य - झूठ में झूल रहा मैं
समझ ना आए ये पहेली ।
कहते जो सत्य को जान ले
पा लिया ईश्वर को उसने
परंतु सत्य का पता ही नहीं
तब यत्न करूँ पाने का कैसे ।
ये भी कहते हैं जगत में
भगवान के सिवा कुछ भी नहीं
हम सब भी उसी का अंश हैं
खेल वो खेलें अपने से ही ।
सृजन और पालन करते हैं
सभी का संहार भी वो करें
हो रहा सब उनकी सत्ता से
मृत्यु से फिर क्यों हम डरें ।
जगत गुरु शंकर जी भोले
अर्धांगिनी पार्वती से बोले
“ उमा कहूँ मैं अनुभव अपना
सत हरि भजन, जगत सब सपना “ ।
अजय सिंगला
