द्वैत- अद्वैत
द्वैत- अद्वैत
द्वैत - अद्वैत
आदि में बस भगवान एक थे
खेल खेलूँ , इच्छा हुई उनकी
देवता, दानव, मनुष्य, जीव और
ब्रह्माण्ड बना लिया अपने से ही ।
ईश्वर की ही सत्ता जगत में
खेल खेल रहे अपने आप से
अपने आप से प्रश्न करें कभी
उसका उत्तर भी स्वयं दें ।
तुममें, मुझमें, सभी में प्रभु
अंश हम सब हैं उनका ही
हम सभी में विराजमान वो
तो फिर कौन निष्पाप कौन पापी ।
सब में तुम भगवान को देखो
तुम भी ब्रह्म और ब्रह्म मैं
एक प्रभु, ना कोई दूसरा
द्वैत नहीं कुछ, बस अद्वैत है ।
तुम्हारा अंश, तो मैं भी तुम ही
प्रभु मुझपर कृपा तुम कर दो
हृदय की छोटी सी प्याली मेरी
प्रेम के सागर से तुम भर दो ।
अजय सिंगला
