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Kalpna Yadav

Abstract Tragedy Classics

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Kalpna Yadav

Abstract Tragedy Classics

पथिक

पथिक

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201

पथिक जो चला जा रहा है

जीवन की राह में अकेला

दुःखों को सीने मेें दबाए

अतीत को कंधे पेे लटकाए


पाँव में टूटे रिश्तों से कंंकड़

चुभते हैं और दिल दुखाएँ

बने हैैं साथी उसकी राह के

वो जो चला जा रहा है 


भारी कदमों से सिर झुकाए 

मिलते हैं मुसाफिर हर कदम पर

पर मिलता नहीं कोई हमसफ़र 

जो चले उसके साथ तब तक

कि जीवन की शाम ढल न जाए।  


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