श्रीकृष्णावतरण
श्रीकृष्णावतरण
परम ब्रह्म भुवि आ गए, करने जग उद्धार।
भाद्र कृष्ण की अष्टमी, प्रकटे जगदाधार।
अति मुदित देवकी हुई, पुत्र बने जगदीश।
दिव्य भास प्रसरित हुआ, मथुरा कारागार॥१॥
दिव्य चतुर्भुज रूप है, शोभित आयुध चार ।
पांचजन्य चक्राब्ज गदा, देते तेज अपार ।
हेमकांति उज्ज्वल लसे, माथे मुकुट अनूप।
प्रकटे जग को तारने ,शाश्वत पालनहार॥२॥
जगन्नाथ को देखकर, उपजा हिय में हर्ष ।
भूल गए सब यातना, कैसे बीते वर्ष ।
राह दिखाए देव जी, मग अनुसरते देव।
शिशु लख सुंदर गोद में, करते देव विमर्श॥३॥
आज्ञा से हरि की चले, धरकर शिशु को सूप।
सुरगण सब हर्षित भए, लखकर अद्भुत रूप।
मथुरा तट यमुना मिली, जिसका उग्र प्रवाह।
शीश सूप जल में बढ़े, अहिपति छत्र अनूप॥४॥
यमुना जल बढ़ने लगा, मानो लेगा प्राण ।
भय जाना तब तात का, करने भय से त्राण।
चरण बढ़ाया नीर में, यमुना छोड़ा मार्ग ।
गोकुल पहुँचे देव जी, डूबे थे आघ्राण॥५॥
नंद की दारा जसुमति, थी गोकुल की आन।
जन्म सुता को कब दिया, नहीं हुआ यह ज्ञान।
संग सुता को ले लिया, सुत जसुमति के पास।
बंदीगृह वसुदेव जी, आए यदुकुल शान॥६॥
गोदी आई कन्यका, बंद हुए सब द्वारा ।
रुदन सुना जब जात का, जागे पहरेदार।
कंस भवन में तब गए, कहने को वे वृत्त।
अट्टहास कर आ गया, अपनी कारागार॥७॥
छीना जातक गोद से, क्या सचमुच तू काल?
काल मुझे तू जान ले, मारूँगा तत्काल ।
कन्या छूटी हाथ से, पहुँची घन के मध्य ।
देख चतुर्भुज शक्ति को, भ्रमित कंस का भाल॥८॥
बोली देवी व्योम से, सुन पापी हे कंस!
तेरा काल तो आ गया, जगत है जिसका अंश।
अनाचार से भर लिया, सकल पाप का कुंभ ।
अंत बने अब सोहते, जग के मानस हंस॥९॥
