पुराने दोस्त
पुराने दोस्त
दोस्ती के नाम पे दुश्मन थे
जो पीठ पीछे सब कहते गए
कुछ खास आ गए उनकी बातों में
वो लोग दूरियां बनाकर रहते गए
अपनों में शामिल थे कभी वो भी
जो गलतफहमियों का शिकार हो गए
क्या खूब हम साथ में रहते थे पर
अब हम उनके लिए बेकार हो गए
जिनके इर्द गिर्द जिंदगी के किस्से थे
वो अब पास तक आते नहीं है
कुछ बातें हैं जो उनको खटकती है
पर वो लोग मुझे कभी बताते नहीं हैं
दुश्मनों से शिकायत करें तो क्या करें
मैं उन खास दोस्तों को दोष देती हूं
मन करता है कि फिर गले लगा लूं
पर फिर मैं खुद को रोक लेती हूं
गुस्सा इस बात का है कि उन्होंने
भरोसा करने से पहले सोचा क्यों नहीं
और सच में मेरी कोई बात बुरी लगी
तो मुझे आकर टोका क्यों नहीं
अब ना दोस्त चाहिए ना ही दुश्मन
क्योंकि ये अकेले जीने का जमाना है
मैं हमेशा से सच थीं और सच रहूंगी
ये बात अपनों और गैरों को बताना है
पहले से ज्यादा व्यस्त हूं लेकिन
दिल आज भी आजाद परिंदा हैं
नया दौर है और कुछ नए दोस्त हैं
पुराने लोग सिर्फ यादों में जिंदा हैं
