STORYMIRROR

Sonam Kewat

Tragedy Thriller

4  

Sonam Kewat

Tragedy Thriller

मैं त्याग दूंगी

मैं त्याग दूंगी

1 min
41

मैंने देखा था दादी को अपने आँचल में

कुछ सिक्कों को बांधे हुए

जो हमेशा रखती थी गांठ लगाकर

जो गांठ कभी छूटती नहीं थी

बस उसी तरह मैंने भी अपने आँचल में 

कुछ गांठ लगाए रखा हैं


जिस गांठ में मां की दुलार, पिता की फटकार

पति की धुत्कार और लोगों के तानो का वार हैं 

इस आँचल के गांठ में बहुत कुछ है

जो मैं किसी को दिखाना नहीं चाहती

कभी-कभी तो इन गांठों को 

ढीली छोड़ देने का मन करता है

और कभी-कभी मन करता है एक झटके में

तोड़ दूं बंधन सारे और त्याग दूं


मैं ये भी जानती हूं कि 

मैं एक झटके में सब त्याग दूंगी

पर अभी मुझे इंतजार है 

सिर्फ उस वक्त का इंतजार

शायद सही वक्त का इंतजार

और मैं उस समय तक इंतजार करूंगी

मैं इंतजार करूंगी सबके जाने का

शायद इतनी दूर जाने का कि 

जहां पर किसी की पुकार ना पहुंचे

जहां पर कोई पुकारना चाहे 

तो भी उसकी आवाज न पहुंचे

और तब तक मैं इंतजार करूंगी

और इंतजार के बाद मैं सब त्याग दूंगी

मैं त्याग दूंगी मां का आंचल

मैं त्याग दूंगी पिता का प्यार

मैं त्याग दूंगी पति का मोह

मैं त्याग दूंगी बच्चे का लोभ

और इस त्याग के बाद 

मैं सिर्फ मैं रहूंगी






विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy