बेटी को पालना मुश्किल है
बेटी को पालना मुश्किल है
एक बड़ा परिवार है, उसमें बेटा है और बेटी है
दोनों ही समाज के हिसाब से पाले जाते हैं
जब बेटा आता है, तो वारिस के नाम पर सब दिया जाता है
जब बेटी आती है, तो जिम्मेदारी के नाम पर घर से निकाल दिया जाता है
बेटा निकम्मा हो, तो चलता है क्योंकि उसके पास या तो घर का व्यापार है या फिर उसके माँ-बाप ही उसका परिवार है
जब शादी होती है बेटे की, तो बहू और फिर बच्चों के साथ जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं
काबिल बेटा है, तो पालता है परिवार को, माँ-बाप को पर अगर निकम्मा बेटा हो,
तो माँ-बाप बेटे के साथ बेटे की जिम्मेदारियों को भी उठाने में तैयार हो जाते हैं
और वो बेटे को पालने के साथ बेटे के बेटे को भी गर्व से पालते हैं।
पर पता नहीं क्यों, बेटी को उसे गर्व से पाला नहीं जा सकता
या तो वह समाज के बोझ से, या फिर अपने परिवार के बोझ तले बनकर रहती हैं जहां बेटी को घर पर कभी नहीं रख सकते
अगर समय पर शादी ना हुई, तो वह बोझ है और उसे ज्यादा समय तक पाला नहीं जा सकता
अगर बिन ब्याही बेटी घर पर है, तो जिम्मेदारी उठाने लायक होना चाहिए
अगर ब्याही बेटी बहुत दिन तक घर पर है, तो उसे उसके ससुराल जल्दी भेज देना चाहिए
क्योंकि बेटी तो एक ही है, पर वो एक परिवार के बराबर का बोझ लेकर पैदा होती है
यही तो जहर है इस समाज में, और इस समाज द्वारा बनाए हुए परिवार में,
जहाँ निकम्मे बेटे को और बेटे के पूरे परिवार को भी घर बैठ कर खिलाया जा सकता है
पर बिन ब्याही बेटी या ब्याहने के बाद ज्यादा दिन तक घर पर टिकी हुई बेटी को ज्यादा दिन तक पालना नामुमकिन है
