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पतंग और रिश्ते

पतंग और रिश्ते

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यूँ तो उड़ती है,

हजारों पतंगे आसमान में।

कुछ ही होती हैं,

जो जुड़ी रहती हैं अपनी डोर से।


वो झेलती है,

हवाओं के खतरनाक थपेड़े।

दूसरी पतंगों से,

होता है कठिन मुकाबला।


अपने ही तो है,

जो काटते हैं, अपनों को ही।

काट देते है ऐसे,

जड़ ही हो जाती है खत्म उनकी।


हो जाती है बेसहारा,

खाती फिरती है ठोकरें दर-दर की।

लूट ली जाती है,

बीच राह में टूट पड़ते हैं भूखे भेड़िए।


हमें अगर जीना है,

न करो अपनों से मुकाबला कभी भी।

न करो ईर्ष्या और द्वेष,

मिल कर रहों अपनों के साथ जुड़ कर।


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