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Kishan Negi

Romance Tragedy


4.0  

Kishan Negi

Romance Tragedy


पतझड़ के पत्ते

पतझड़ के पत्ते

1 min 240 1 min 240

जाड़ों की गुनगुनी धूप में नहाकर 

बसंत की शांत गुलाबी शाम को 

जब में अकेली होती हूँ, मुझे अंदाज़ा नहीं 

वो किस करवट मुझ पर गिरता है 

वही पुराने मिज़ाज़ में मचल कर 

 

मीलों दूर रहकर जो दर्द दिए हैं तुमने 

कैसे माफ़ कर दूँ मैं, प्रेम के गुनहगार हो तुम 

ये चाँद सितारे, ये रात की तन्हाईयाँ 

सिर्फ तुम्हारो ही याद दिलाती हैं 

तुम दोषी कैसे अगर तक़दीर को यही मंजूर था 


दिल के मरुस्थल के पल-पल टूटते किनारों में 

अभिलाषायें दम तोड़ रही है 

जाकर मनाती भी कैसे, जब तुम ही मुझसे 

रूठकर बनाने लगे लम्बे फासले 

पतझड़ के पत्तों को समेटूं भी तो कैसे।


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